श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥ यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥ श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥ | स्थिर, पवित्र, सम और शुद्ध रखनाही " वह 'युक्ति' या 'कौशल्य' है, और | इसीको 'योग' कहते हैं - इस प्रकार योग शब्दकी दो वार व्याख्या की गई है । | ५० वें श्लोकके “योगः कर्मसु कौशलम् ” इस पदका इस प्रकार सरल अर्थ | लगनेपरभी, कुछ लोगोंने ऐसी खीचातानीसे अर्थ लगानेका प्रयत्न किया है, | कि “ कर्मसु योगः कौशलम् ” – कर्ममें जो योग है, उसको कौशल कहते हैं। पर | 'कौशल' शब्दकी व्याख्या करनेका यहाँ कोई प्रयोजन नही है, 'योग' शब्दका | लक्षण बतलानाही अभीष्ट है, इसलिये यह अर्थ सच्चा नहीं माना जा सकता । | इसके अतिरिक्त जब कि “कर्मसु कौशलम्” ऐसा सरल अन्वय लग सकता है, | तब 'कर्मसुयोगः' ऐसा औंधासीधा अन्वय करनाभी ठीक नहीं है । अब बतलाते | हैं, कि इस प्रकार साम्य-बुद्धिसे समस्त कर्म करते रहनेसे व्यवहारका लोप नहीं | होता और पूर्ण सिद्धि अथवा मोक्ष प्राप्त हुए बिना नहीं रहता – ] (५१) (समत्व-) बुद्धिसे युक्त (जो) ज्ञानी पुरुष कर्मफलका त्याग करते हैं, (वे) जन्मके बंधसे मुक्त होकर (परमेश्वरके) दुःखरहित पदको जा पहुँचते हैं। (५२) जब तेरी बुद्धि मोहके गंदले आवरणसे पार हो जायगी, तब उन बातोंसे तू विरक्त हो जायगा, जो सुनी हैं और सुननेकी हैं। | [अर्थात् तुझे अधिक कुछ सुननेकी इच्छा न होगी । क्योंकि इन बातोंके | सुननेसे मिलनेवाला फल तुझे पहलेही प्राप्त हो चुका होगा । 'निर्वेद' शब्दका | उपयोग प्रायः संसारी प्रपंचसे उकताहट या वैराग्यके लिये किया जाता है। इस | श्लोकमें उसका सामान्य अर्थ 'ऊब जाना' या 'चाह न रहना' ही है । अगले | श्लोकसे दीख पड़ेगा, कि यह उकताहट, विशेष करके पीछे बतलाये हुए, त्रैगुण्य- | विषयक श्रौत-कर्मोंके संबंधमें है।] (५३) (नाना प्रकारके) वेदवाक्योंसे घबड़ाई हुई तेरी बुद्धि जब समाधिवृत्तिमें स्थिर और निश्चल होगी, तब (यह साम्य-बुद्धिरूप) योग तुझे प्राप्त होगा । [सारांश, द्वितीय अध्यायके ४४ वें श्लोकके कथनानुसार, लोग जो वेद- | वाक्यकी फलश्रुतिमें भूले हुए हैं, और जो लोग किसी विशेष फलकी प्राप्तिके