श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६४३ दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥ (४९) क्योकि हे धनजय ! बुद्धिके (साम्य-) योगकी अपेक्षा (बाह्य) कर्म बहुतही कनिष्ठ है। अतएव इस साम्य-बुद्धिकी शरणमें जा। फलहेतुक अर्थात् फलपर दृष्टि रखकर काम करनेवाले लोग कृपण अर्थात् दीन या निचले दर्जेके हैं। (५०) जो (साम्य-) बुद्धिसे युक्त हो जाय, वह इस लोकमें पाप और पुण्य, दोनोंसे अलिप्त रहता है, अतएव योगका आश्रय कर । (पाप-पुण्यसे बचकर) कर्म करनेकी चतुराईकोही (कुशलता या युक्ति) कर्मयोग कहते हैं। [इन श्लोकोंमें कर्मयोगका जो लक्षण बतलाया ह, वह महत्त्वका है; इस संबंधमें गीतारहस्यके तीसरे प्रकरणमें (पृ. ५६-६४) जो विवेचन किया गया है, उसे देखो। पर उसमेंभी कर्मयोगका जो तत्त्व- "कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है"-४९ वें श्लोकमें बतलाया है, वह अत्यंत महत्त्वका है। 'बुद्धि' शब्दके पीछे 'व्यवसायात्मिका' विशेषण नहीं है, इसलिये इस श्लोकमें उसका अर्थ 'वासना' या 'समझ' होना चाहिये। कुछ लोग बुद्धिका अर्थ 'ज्ञान' करके इस श्लोकका ऐसा अर्थ करना चाहते हैं, कि ज्ञानीकी अपेक्षा कर्म हलके दर्जेका है; परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। क्योकि, पीछे ४८ वें श्लोकमें समत्वका लक्षण बतलाया है, और ४९ वें तथा अगले श्लोकमेंभी वही वर्णित है, इस कारण यहाँ बुद्धिका अर्थ समत्व-बुद्धिही करना चाहिये। किसीभी कर्मकी भलाई-बुराई कर्मपर अवलंबित नहीं होती; कर्म एकही क्यों न हो, पर करनेवालेकी भली वा बुरी बुद्धिके अनुसार वह शुभ अथवा अशुभ हुआ करता है; अतः कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ है; इत्यादि नीतिके तत्त्वोंका विचार गीतारहस्यके चौथे, बारहवें और पंद्रहवें प्रकरणमें (पृ. ८८, ३८३-३८४; ४७७-४८०) किया गया है; इस कारण यहाँ और अधिक चर्चा नहीं करते। ४१ वे श्लोकमें बतलायाही है, कि वासनात्मक बुद्धिको सम और शुद्ध रखनेके लिये कार्य-अकार्यका निर्णय करनेवाली व्यवसायात्मका बुद्धि पहले स्थिर हो जानी चाहिये। इसलिये 'साम्य- बुद्धि' - इस शब्दसेही स्थिर व्यवसायात्मका बुद्धि, और शुद्ध वासना (वासनात्मक बुद्धि) इन दोनोंकाभी बोध हो जाता है। यह साम्य-बुद्धिही, शुद्ध आचरण अथवा कर्मयोगकी जड़ है, इसलिये ३९ वें श्लोकमें भगवानने पहले जो यह कहा है, कि कर्म करनेकीभी कर्मकी बाधा न लगनेवाली युक्ति अथवा योग तुझे बतलाता हूँ; उसीके अनुसार इस श्लोकमें कहा है, कि "कर्म करते समय बुद्धिको