श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥ अमुक फल मिले, यह ( लालची ) हेतु ( मनमें ) रखकर काम करनेवाला न हो; और कर्म न करनेकाभी तू आग्रह न कर । । [ इस श्लोकके चारों चरण परस्पर एक दूसरेके अर्थके पूरक हैं। इस । कारण अतिव्याप्ति न होकर कर्मयोगका सारा रहस्य थोड़ेमें उत्तम रीतिसे । बतला दिया गया है । और तो क्या, यह कहनेमेंभी कोई हानि नहीं, कि ये चारों । चरण कर्मयोगकी चतुःसूत्रीही हैं। यह पहले कह दिया है, कि "कर्म करने मात्रका । तेरा अधिकार है।" परन्तु इसपर यह शंका होती है, कि, कर्मका फल तो कर्मसेही । संयुक्त होनेके कारण " जिसका पेड़, उसीका फल" इस न्यायसे जो कर्म करनेका । अधिकारी है, वही फलकाभी अधिकारी होगा। अतएव इस शंकाको दूर करनेके । निमित्त दूसरे चरणमें स्पष्ट कह दिया है, कि " फलमें तेरा अधिकार नहीं है।" । फिर इससे निष्पन्न होनेवाला तीसरा यह सिद्धान्त बतलाया है, कि " मनमें । फलाशा रखकर कर्म करनेवाला मत हो।" ('कर्मफलहेतुः' = कर्मफले हेतुर्यस्य । स कर्मफलहेतुः, ऐसा बहुव्रीहि समास होता है; ), परंतु कर्म और उसका फल । दोनों संलग्न होते हैं, इस कारण यदि कोई ऐसा सिद्धान्त प्रतिपादन करने लगे, । कि फलाशाके साथ साथ फलकोभी छोड़ही देना चाहिये, तो उसेभी सच न । माननेके लिये अंतमें स्पष्ट उपदेश किया है, कि " फलाशाको तो छोड़ दे, पर । इसके साथही कर्म न करनेका अर्थात् कर्म छोड़नेका आग्रह न कर।" सारांश, । "कर्म कर" कहनेसे यह अर्थ तो नहीं होता कि "फलकी आशाको रख" और । "फलकी आशाको छोड़" कहनेसे यह अर्थ नहीं हो जाता कि "कर्मोंको छोड़ । दे" अतएव इस श्लोकका यह अर्थ है, कि फलाशा छोड़कर कर्त्तव्य-कर्म अवश्य । करना चाहिये; किंतु न तो कर्मकी आसक्तिमें फँसें और न कर्मही छोड़ें - । "त्यागो न युक्त इह कर्मसु नापि रागः" (योग. ५. ५. ५४) । और यह । दिखलाकर कि फल मिलनेकी बात अपने वशमें नहीं है; किंतु उसके लिये और । अनेक बातोंकी अनुकूलता आवश्यक है; अठारहवें अध्यायमें फिर यही अर्थ । औरभी दृढ़ किया गया है (गीता १८. १४-१६; गीतारहस्य प्र. ५, पृ. ११५; । प्र. १२)। अब कर्मयोगका यह स्पष्ट लक्षण बतलाते हैं, कि इसेही योग अथवा । कर्मयोग कहते हैं-] ( ४८ ) हे धनंजय ! आसक्ति छोड़कर, और कर्मकी सिद्धि हो या असिद्धि, दोनोंको समानही मानकर, 'योगस्थ' हो करके कर्म कर; ( कर्मके सिद्ध होने या निष्फल होनेमें रहनेवाली) समताकी (मनो-)वृत्तिकोही (कर्म-)योग कहते हैं।