श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६४१ § § कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥ | शुकानुप्रश्नके विवेचनसे गीताके दृष्टान्तका स्वारस्य ज्ञात हो जायगा; और | यह दीख पड़ेगा, कि हमने इस श्लोकका ऊपर जो अर्थ किया है, वही सरल और | ठीक है। परंतु, चाहे इस कारणसे हो, कि ऐसे अर्थसे वेदोंमें कुछ गौणता आ जाती | है; अथवा इस सांप्रदायिक सिद्धान्तकी ओर दृष्टि देनेसे हो, कि ज्ञानमेंही समस्त | कर्मोंका समावेश रहनेके कारण ज्ञानीको कर्म करनेकी ज़रूरत नहीं। गीताके | टीकाकार इस श्लोकके पदोंका अन्वय कुछ निराले ढंगसे लगाते हैं। वे इस | श्लोकके पहले चरणमें 'तावान्' और दूसरे चरणमें 'यावान्' पदोंको अध्याहृत | मानकर ऐसा अर्थ लगाते हैं - "उदपाने यावानर्थः तावानेव सर्वतः सम्प्लुतोदके | यथा सम्पद्यते तथा यावान् सर्वेषु वेदेषु अर्थः तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य | सम्पद्यते" - अर्थात् स्नान-पान आदि कर्मोंके लिये कुएँका जितना उपयोग | होता है, उतनाही बड़े तालाबकाभी (सर्वतः सम्प्लुतोदके) हो सकता है; | उसी प्रकार वेदोंका जितनाभी उपयोग है, उतना सब, ज्ञानी पुरुषको | ज्ञानसे हो सकता है। परंतु इस अन्वयमें पहली श्लोकपंक्तिमें 'तावान्' और | दूसरी पंक्तिमें 'यावान्' इन दो पदोंके अध्याहार कर लेनेकी आवश्यकता पड़नेके | कारण, हमने इस अन्वय और अर्थको स्वीकृत नहीं किया। हमारा अन्वय | और अर्थ किसीभी पदके, अध्याहार किये बिनाही लग जाता है; और पूर्वके | श्लोकसे सिद्ध होता है, कि उसमें प्रतिपादित वेदोंके कोरे अर्थात् ज्ञानव्यतिरिक्त | कर्मकांडका गौणत्वही इस स्थलपर विवक्षित है। अब ज्ञानी पुरुषको यज्ञयाग | आदि कर्मोंकी कोई आवश्यकता न रह जानेसे, कुछ लोग जो यह अनुमान किया | करते हैं, कि इन कर्मोंको ज्ञानी पुरुष न करे, बिलकुल छोड़ दे - यह बात गीताको | संमत नहीं है। क्योंकि, यद्यपि इन कर्मोंका फल ज्ञानी पुरुषको अभीष्ट नहीं | होता, तथापि फलके लिये न सही; तोभी यज्ञयाग आदि कर्मोंको, अपना शास्त्र- | विहित कर्तव्य समझकर, वह कभी छोड़ नहीं सकता - अठारहवें अध्यायमें | भगवान्ने अपना निश्चित मत स्पष्ट कह दिया है, कि फलाशा न रहे, तोभी | अन्यान्य निष्काम कर्मोंके समान यज्ञयाग आदि कर्मभी ज्ञानी पुरुषको निःसंग- | बुद्धिसे करनेही चाहिये (पिछले श्लोकपर और गीता ३. १९ पर हमारी जो | टिप्पणी है, उसे देखो)। यही निष्कामविषयक अर्थ अब अगले श्लोकमें व्यक्त | कर दिखलाते हैं - ] (४७) कर्म करने मात्रका तेरा अधिकार है; फल (मिलना या न मिलना) कभीभी तेरे अधिकार अर्थात् ताबेमें नहीं; (इसलिये मेरे कर्मका) गी. र. ४१