भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 685

६४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसके शब्दोंकी नाहक खींचातानी की है। 'सर्वतः सम्प्लुतोदके' यह सप्तम्यन्त सामासिक पद है। परंतु इसे निरी सप्तमी या उदपानका विशेषणभी न समझ कर 'सति सप्तमी' मान लेनेसे, "सर्वतः सम्प्लुतोदके सति उदपाने यावानर्थः (न स्वल्पमपि प्रयोजनं विद्यते) तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषुः अर्थः" इस प्रकार किसीभी बाहरके पदको अध्याहृत मानना नहीं पड़ता, सरल अन्वय लग जाता है, और उसका यह सरल अर्थभी हो जाता है, कि "चारों ओर पानीही पानी होनेपर (पीनेके लिये कहींभी बिना प्रयत्नके यथेष्ट पानी मिलने लगनेपर) जिस प्रकार कुएँको कोईभी नहीं पूछता, उसी प्रकार ज्ञान- प्राप्त पुरुषको यज्ञ-याग आदि केवल वैदिक कर्मका कुछभी उपयोग नहीं रहता।" क्योंकि, वैदिक कर्म केवल स्वर्ग-प्राप्तिके लियेही नहीं, बल्कि अंतमें मोक्षसाधक ज्ञान-प्राप्तिके लिये करना होता है; और इस पुरुषको तो ज्ञान-प्राप्ति पहलेही हो जाती है. इस कारण उसे वैदिक कर्म करके कोई नई वस्तु पानेके लिये शेष रह नहीं जाती। इसी हेतुसे, आगे तीसरे अध्यायमें (गीता ३. १७) कहा है, कि "जो ज्ञानी हो गया, उसे इस जगत्‌मे कर्तव्य शेष नहीं रहता।" बड़े भारी तालाब या नदी पर अनायासही, जितना चाहिये उतना, निर्मल पानी पीनेकी सुविधा होनेपर कुएँकी ओर कौन झाँकेगा? ऐसे समय कोईभी कुएँकी अपेक्षा नहीं रखता। सनत्सुजातीयके अंतिम अध्यायमें (मभा. उद्योग. ४५. २६) यही श्लोक कुछ थोड़े-से शब्दोंके हेरफेरसे आया है। माधवाचार्यने इस श्लोककी टीकामें वैसाही अर्थ किया है, जैसा कि हमने ऊपर किया है; एवं शुकानुप्रश्नमें ज्ञान और कर्मके तारतम्यका विवेचन करते समय साफ़ कह दिया है- "न ते (ज्ञानिनः) कर्म प्रशमन्ति कूपं नद्यां पिबन्निव" - नदीपर जिसे पानी मिलता है, वह जिस प्रकार कुएँकी परवाह नहीं करता उसी प्रकार 'ते' अर्थात् ज्ञानी पुरुष कर्मकी कुछ परवाह नहीं करते (मभा. शां. २४०. १०)। ऐसेही पांडव- गीताके सतहवे श्लोकमें कुएँका दृष्टान्त यों दिया है- जो वासुदेवको छोड़कर दूसरे देवताकी उपासना करता है, वह- "तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं वाञ्छति दुर्मतिः" - भागीरथी तटपर पीनेके लिये पानी मिलने परभी, कुएँ की इच्छा करनेवाले प्यासे पुरुषके समान मूर्ख है। यह दृष्टान्त केवल वैदिक ग्रंथोमेंही नहीं है, प्रत्युत पालिके बौद्ध ग्रंथोंमेंभी उसके प्रयोग है। यह सिद्धान्त बौद्ध धर्मकोभी मान्य है, कि जिस पुरुषने अपनी तृष्णा समूल नष्ट कर डाली हो उसे आगे और कुछ प्राप्त करनेके लिये नहीं रह जाता; और इस सिद्धान्तको बतलाते हुए उदान नामक पाली ग्रंथके (७. ९) इस श्लोकमें यह दृष्टान्त दिया है- "कि कयिरा उदपानेन आपा चे सव्वदा सियुम" - सर्वदा पानी मिलने योग्य हो जानेमे कुएँको लेकर क्या करना है? आजकल बड़े-बड़े शहरोंमें यह देखाभी जाता है, कि घरमें नल हो जानेसे फिर कोई कुएँकी परवाह नही करता। इससे और विशेष कर