श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६३९ यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥ । विषयमें यहां उपदेश किया गया है। किंतु इस बातपर फिरभी ध्यान देना । चाहिये, कि आत्मनिष्ठ होनेका अर्थ सब कर्मोंको स्वरूपतः एकदम छोड़ देना । नहीं है। ऊपरके श्लोकमें वैदिक काम्य कर्मोंकी जो निंदा की गई है, या जो । न्यूनता दिखलाई गई है, वह कर्मोंकी नहीं; बल्कि उन कर्मोंके विषयमें जो । काम्य-बुद्धि होती है, उसकी है। यदि यह काम्य-बुद्धि मनमें न हो, तो फिर । यज्ञयाग किसीभी प्रकारसे मोक्षके लिये प्रतिबंधक नहीं होते (गीतार. पृ. २९५- । २९७) । आगे अठारहवें अध्यायके आरंभमें भगवानने अपना यह निश्चित । और उत्तम मत बतलाया है, कि मीमांसकोंके इन्हीं यज्ञयाग आदि कर्मोंको । फलाशा और संग छोड़कर चित्तकी शुद्धि और लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना । चाहिये (गीता १८. ६) ) । गीताकी इन दो स्थानोंकी बातोंको एकत्र करनेसे । यह प्रकट हो जाता है, कि इस अध्यायके श्लोकमें मीमांसकोंके कर्मकांडकी जो । न्यूनता दिखलाई गई है, वह उसकी काम्य-बुद्धिको उद्देश्य करके है, केवल । क्रियाके लिये नहीं है। इसी अभिप्रायको मनमें लाकर भागवतमेंभी कहा है :- वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसंगोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः ॥ । वेदोक्त कर्मोंकी वेदमें जो फलश्रुति कही गयी है, वह रोचनार्थ है अर्थात् । इसीलिये है, कि कर्ताको ये कर्म अच्छे लगें । अतएव इन कर्मोंको उस फल-प्राप्तिके । लिये न करें, किंतु निःसंग-बुद्धिसे अर्थात् फलकी आशा छोड़कर ईश्वरार्पण-बुद्धिसे । करें; जो पुरुष ऐसा करता है, उसे नैष्कर्म्यसे प्राप्त होनेवाली सिद्धि मिलती । है” (भाग. ११. ३. ४६) । सारांश, यद्यपि, वेदोंमें कहा है, कि अमुक अमुक । कारणोंके निमित्त यज्ञ करें, तथापि उसमें न भूलकर केवल इसीलिये यज्ञ करें । कि वे यष्टव्य हैं। अर्थात् यज्ञ करना हमारा कर्तव्य है; काम्य-बुद्धिको तो छोड़ । दें, पर यज्ञको न छोड़ें (गीता १५. ११) ; और उसी प्रकार अन्यान्य कर्मभी । किया करें - यह गीताके उपदेशका सार है; और यही अर्थ अगले श्लोकमें । व्यक्त किया गया है । ] (४६) चारों ओर पानीकी बाढ आ जाने पर कुएँका जितना अर्थ या प्रयोजन रह जाता है (अर्थात् कुछभी काम नहीं रहता), उतनाही प्रयोजन ज्ञान-प्राप्त ब्राह्मणको सब (कर्मकांडात्मक) वेदका रहता है (अर्थात् सिर्फ काम्य-कर्मरूपी वैदिक कर्मकांडकी उसे कुछ आवश्यकता नहीं रहती। । [इस श्लोकके फलितार्थके संबंधमें मतभेद नहीं है। पर टीकाकारोंने