भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 683

६३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥ दौड़सी मचाये रहती है, इस कारण उन्हें स्वर्गका आवागमन नसीब हो जाने परभी मोक्ष नहीं मिलता। मोक्षकी प्राप्तिके लिये बुद्धि-इंद्रियको स्थिर या एकाग्र रखना चाहिये। आगे छठे अध्यायमें विचार किया गया है, कि उसको एकाग्र किस प्रकार करना चाहिये। अभी तो इतनाही कहते हैं कि - ] ( ४५ ) हे अर्जुन ! ( कर्मकांडात्मक ) वेद ( इस रीतिसे ) त्रैगुण्यकी बातोंसे भरे पड़े हैं, इसलिये तू निस्त्रैगुण्य अर्थात् त्रिगुणोंसे अतीत, नित्यसत्त्वस्थ और सुखदुःख आदि द्वंद्वोंसे अलिप्त हो, एवं योगक्षेम आदि स्वार्थोंमें न पड़कर आत्मनिष्ठ हो ! [ सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंसे मिश्रित प्रकृतिकी सृष्टिको त्रैगुण्य कहते हैं। यह बात गीतारहस्य ( पृ. २३१-२५७ ) में स्पष्ट कर दिखलाई गई है, कि सृष्टि, सुख-दुख आदि अथवा जन्म-मरण आदि विनाशवान् द्वंद्वोंसे भरी हुई है; और सत्य ब्रह्म उसके परे है। इसी अध्यायके ४३ वें श्लोकमें, कहा है, कि प्रकृतिके अर्थात् मायाके इस संसारके सुखोंकी प्राप्तिके लिये मीमांसक- मार्गवाले लोग श्रौत, यज्ञ-याग आदि क्रिया करते हैं; और वे इन्हींमें निमग्न रहा करते हैं। कोई पुत्र-प्राप्तिके लिये एक विशेष यज्ञ करता है, तो कोई पानी बरसानेके लिये दूसरी इष्टि करता है। ये सब कर्म इस लोगमें संसारी व्यवहारोंके लिये अर्थात् अपने योगक्षेमके लिये हैं। अतएव प्रकटही है, कि जिसे मोक्ष प्राप्त करना हो, वह वैदिक कर्मकांडके इन त्रिगुणात्मक और निरे योगक्षेम संपादन करनेवाले कर्मोंको छोड़कर, अपना चित्त इसके परेके परब्रह्मकी ओर लगावे। इसी अर्थमें 'निर्द्वन्द्व' और 'निर्योगक्षेम' - शब्द ऊपर आये हैं। यहाँ ऐसी शंका हो सकती है, कि वैदिक कर्मकांडके इन काम्य कर्मोंको छोड़ देनेसे योग-क्षेम ( निर्वाह ) कैसे होगा ( गीतार. पृ. २९२-३९१ )। किंतु इसका उत्तर यहाँ नहीं दिया है, यह विषय आगे फिर नवें अध्यायमें आया है; वहाँ कहा है, कि इस योग-क्षेमको भगवान् करते हैं; और इन्हीं दो स्थानोंपर, गीतामें 'योगक्षेम' शब्द आया है ( गीता ९. २२ और उसपर हमारी टिप्पणी देखो )। नित्य-सत्त्वस्थ पदकाही अर्थ त्रिगुणातीत होता है। क्योंकि आगे कहा है, कि सत्त्वगुणके नित्य उत्कर्षसेही फिर त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त होती है, और वही सच्ची सिद्धावस्था है ( गीता १४. १४, २०; गीतार. पृ. १६६-१६७ तात्पर्य यह है, कि मीमांसकोंके योगक्षेमकारक त्रिगुणात्मक काम्य कर्म छोड़कर एवं सुख-दुःखके द्वंद्वोंसे निपटकर ब्रह्मनिष्ठ अथवा आत्मनिष्ठ होनेके