श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६३७ § § यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥ कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥ | वासनाओमे मन व्यग्र हो जाता है; और मनुष्य ऐसी अनेक झंझटोंमें पड़ जाता | है, कि आज पुत्रप्राप्तिके लिये अमुक कर्म करो, तो कल स्वर्गकी प्राप्तिके लिये | अमुक कर्म करो। बस इसीका वर्णन अब करते हैं :- ) ( ४२ ) हे पार्थ ! ( कर्मकांडात्मक वेदोंके ( फलश्रुति-युक्त ) वाक्योंमें भूले हुए और यह कहनेवाले मूढ़ लोग कि, उनके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है, बढ़ा कर कहा करते हैं, कि - ( ४३ ) "अनेक प्रकारके ( यज्ञ-याग आदि ) कर्मोंसेही ( फिर ) जन्मरूप फल मिलता है, और ( जन्म-जन्मान्तरमें ) भोग तथा ऐश्वर्य मिलता है ; " - स्वर्गके पीछे पड़े हुए वे काम्य-बुद्धिवाले ( लोग ), ( ४४ ) उल्लिखित भाषणकी ओरही उनके मन आकर्षित हो जानेसे, भोग और ऐश्वर्यमेंही गर्क रहते हैं; इस कारण उनकी व्यवसायात्मका अर्थात् कार्य-अकार्यका निश्चय करनेवाली बुद्धि ( कभीभी ) समाधिस्थ अर्थात् एक स्थानमें स्थिर नहीं रह सकती । | [ ऊपरके तीनों श्लोकोंका मिलकर एकही वाक्य है; उसमें उन ज्ञान- | विरहित कर्मठ मीमांसा-मार्गवालोंका वर्णन है, जो श्रौत-स्मार्त कर्मकांडके अनुसार | आज अमुक हेतुकी सिद्धिके लिये, तो कल और किसी हेतुसे, सदैव स्वार्थके | लियेही, यज्ञ-याग आदि कर्म करनेमें निमग्न रहते हैं। यह वर्णन उपनिषदोंके | आधारपर किया गया है - उदाहरणार्थ, मुंडकोपनिषदमें कहा है - इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ | " इष्टापूर्तही श्रेष्ठ है, दूसरा कुछभी श्रेष्ठ नहीं - यह माननेवाले मूढ़ | लोग स्वर्गमें पुण्यका उपभोग कर चुकनेपर फिर नीचेके इस मनुष्य-लोकमें | आते हैं" ( मुंड १. २. १० )। ज्ञानविरहित कर्मोंकी इसी ढंगकी निंदा ईशा- | वास्य और कठ उपनिषदोंमेंभी की गयी है ( कठ. २. ५; ईश. ९, १२ )। परमे- | श्वरका ज्ञान प्राप्त न करके केवल कर्मोंमेंही फंसे रहनेवाले इन लोगोंको ( गीता | ९. २१ ) अपने अपने कर्मोंके स्वर्ग आदि फल मिलते तो हैं, पर उनकी वासना | आज एक कर्ममें, तो कल किसी दूसरेही कर्ममें रत होकर चारों ओर घुड़-