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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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६३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥ कर्मका नाश नहीं होता और (आगे) विघ्नभी नही होते । इस धर्मका थोड़ा-साभी (आचरण) बड़े भयसे संरक्षण करता है। | [इस सिद्धान्तका महत्त्व गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृष्ठ २८६) | दिखलाया गया है; और अधिक स्पष्टीकरण आगे गीतामेंभी किया गया है | (गीता ६.४०-४६)। इसका यह अर्थ है, कि कर्मयोग-मार्गमें यदि एक जन्ममें | सिद्धि न मिले, तो किया हुआ कर्म व्यर्थ न जाकर अगले जन्ममें उपयोगी | होता है; और प्रत्येक जन्ममें इसकी बढ़ती होती है, एवं अंतमें कभी-न-कभी | सच्ची सद्गति मिलतीही है। अब कर्म-योगमार्गका दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त | बतलाते है - ] (४१) हे कुरुनंदन, इस मार्गमें व्यवसाय-बुद्धि अर्थात् कार्य और अकार्यका निश्चय करनेवाली (इंद्रियरूपी) बुद्धि एक अर्थात् एकाग्र रखनी पड़ती है; क्योंकि जिनकी बुद्धिका (इस प्रकार एक) निश्चय नहीं होता, उनकी बुद्धि अर्थात् वासनाएं अनेक शाखाओंपे युक्त और अनंत (प्रकारकी) होती हैं। | [संस्कृतमें बुद्धि शब्दके अनेक अर्थ है । ३९ वें श्लोकमें यह शब्द-ज्ञानके | अर्थमें आया है; और आगे ४९ वें श्लोकमें इस 'बुद्धि' शब्दकाही "समझ, इच्छा, | वासना, या हेतु" अर्थ है। परंतु बुद्धि शब्दके पीछे 'व्यवसायात्मिका' विशेषण | है, इसलिये इस श्लोकके पूर्वार्धमें उसी शब्दका अर्थ यों होता है- व्यवसाय | अर्थात् कार्य-अकार्यका निश्चय करनेवाली बुद्धि-इंद्रिय (गीतार. प्र. ६, १३४- | १३९)। पहले इस बुद्धि-इंद्रियसे किसीभी बातका भला-बुरा विचार कर लेने | पर फिर तदनुसार कर्म करनेकी इच्छा या वासना मनमें हुआ करती है, अतएव | इस इच्छा या वासनाकोभी बुद्धिही कहते हैं; परंतु उस समय 'व्यवसायात्मिका' | यह विशेषण उसके पीछे नहीं लगाते। भेद दिखलाना आवश्यकही हो, तो | 'वासनात्मक' बुद्धि कहते है । इस श्लोकके दूसरे चरणमें सिर्फ 'बुद्धि' शब्द है, | उसके पीछे 'व्यवसायात्मका' यह विशेषण नहीं है, इसलिये बहुवचनान्त | 'बुद्धयः'से 'वासना, कल्पनातरंग' अर्थ होकर पूरे श्लोकका यह अर्थ होता है, कि | "जिसकी व्यवसायात्मका बुद्धि अर्थात निश्चय करनेवाली बुद्धि-इंद्रिय स्थिर | नहीं होती, उनके मनमें क्षण-क्षण में नई तरंगें या वासनाएं उत्पन्न हुआ करती | हैं।" बुद्धि शब्दके 'निश्चय करनेवाली इंद्रिय' या 'वासना' इन दोनों अर्थोंको | ध्यानमें रखे बिना कर्मयोगकी बुद्धिके विवेचनका मर्म भली भांति समझमें आनेका | नही। व्यवसायात्मका बुद्धिके स्थिर या एकाग्र न रहनेसे प्रतिदिन भिन्न भिन्न

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