भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 680, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 680

दूसरा अध्याय ६३५ § § एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥ § § नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥ | एवं स्वधर्मकी ओर ध्यान देकर युद्ध करनाही क्षत्रियको उचित है, तथा सम- | बुद्धिसे युद्ध करनेमें कोईभी पाप नहीं लगता । परंतु इस मार्गका ( सांख्य ) | मत है, कि कभी-न-कभी संसार छोड़कर संन्यास ले लेनाही प्रत्येक मनुष्यका | इस जगतमें परम कर्तव्य है, इसलिये दृष्ट जान पड़े तो अभीही युद्ध छोड़कर | संन्यास क्यों न ले लें; अथवा स्वधर्मपालनही क्यों करें ? इत्यादि शंकाओंका | निवारण सांख्य-ज्ञानसे नहीं होता; और इसीसे यह कह सकते हैं, कि अर्जुनका | मूल आक्षेप ज्यों का त्यों बना रहता है । अतएव अब भगवान् कहते हैं - ] ( ३९ ) सांख्य अर्थात् संन्यास-निष्ठाके अनुसार तुझे यह बुद्धि अर्थात् ज्ञान या उपपत्ति बतलाई । अब जिस बुद्धिसे युक्त होनेपर ( कर्मोंके न छोड़ने परभी ) हे पार्थ ! तू कर्मबंध छोड़ेगा, ऐसी यह (कर्म)-योगकी बुद्धि अर्थात् ज्ञान ( तुझे बतलाता हूँ ) सुन ! | [ भगवद्गीताका रहस्य समझनेके लिये यह श्लोक अत्यंत महत्त्वका है । | सांख्य शब्दसे कपिलका सांख्य या निरा वेदान्त, और योग शब्दसे पातंजल- | योग यहाँपर उद्दिष्ट नहीं है; सांख्यसे संन्यास-मार्ग और योगसे कर्म-मार्गहीका | अर्थ यहाँपर लेना चाहिये । गीताके ( ३. ३) श्लोकसे प्रकट यह है, कि ये दोनों | मार्गस्वतंत्र हैं, इनके अनुयायियोंकोभी क्रमसे 'सांख्य' - संन्यास-मार्गी, और 'योग' | कर्मयोग-मार्गी कहते हैं ( गीता ५. ५ ) । इनमेंसे सांख्य-निष्ठावाले लोग कभी- | न-कभी अंतमें कर्मोंको सर्वथा छोड़ देनाही श्रेष्ठ मानते हैं; इसलिये इस मार्गके | तत्त्वज्ञानसे अर्जुनकी इस शंकाका पूरा पूरा समाधान नहीं होता, कि " युद्ध क्यों | करूँ ? " अतएव जिस कर्मयोग-निष्ठाका ऐसा मत है, कि संन्यास न लेकर ज्ञान- | प्राप्तिके पश्चातभी निष्काम बुद्धिसे सदैव कर्म करते रहनाही प्रत्येकका सच्चा | पुरुषार्थ है, उसी कर्मयोगका, अथवा संक्षेपमें योग-मार्गका, ज्ञान बतलाना अब | आरंभ किया गया है; और गीताके अंतिम अध्याय तक, अनेक कारण दिखलाते | हुए, अनेक शंकाओंका निवारण कर, इसी मार्गका, पुष्टीकरण किया गया है । | गीताके विषय-निरूपणका, स्वयं भगवानका किया हुआ, यह स्पष्टीकरण ध्यानमें | रखनेसे इस विषयमें कोई शंका रह नहीं जाती, कि कर्मयोगही गीतामें प्रतिपाद्य | है । कर्मयोगके मुख्य मुख्य सिद्धान्तोंका पहले निर्देश करते हैं - ] ( ४० ) यहाँ अर्थात् इस कर्मयोग-मार्गमें ( एक बार ) आरंभ किये हुए