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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

६४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसके शब्दोंकी नाहक खींचातानी की है। 'सर्वतः सम्प्लुतोदके' यह सप्तम्यन्त सामासिक पद है। परंतु इसे निरी सप्तमी या उदपानका विशेषणभी न समझ कर 'सति सप्तमी' मान लेनेसे, "सर्वतः सम्प्लुतोदके सति उदपाने यावानर्थः (न स्वल्पमपि प्रयोजनं विद्यते) तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषुः अर्थः" इस प्रकार किसीभी बाहरके पदको अध्याहृत मानना नहीं पड़ता, सरल अन्वय लग जाता है, और उसका यह सरल अर्थभी हो जाता है, कि "चारों ओर पानीही पानी होनेपर (पीनेके लिये कहींभी बिना प्रयत्नके यथेष्ट पानी मिलने लगनेपर) जिस प्रकार कुएँको कोईभी नहीं पूछता, उसी प्रकार ज्ञान- प्राप्त पुरुषको यज्ञ-याग आदि केवल वैदिक कर्मका कुछभी उपयोग नहीं रहता।" क्योंकि, वैदिक कर्म केवल स्वर्ग-प्राप्तिके लियेही नहीं, बल्कि अंतमें मोक्षसाधक ज्ञान-प्राप्तिके लिये करना होता है; और इस पुरुषको तो ज्ञान-प्राप्ति पहलेही हो जाती है. इस कारण उसे वैदिक कर्म करके कोई नई वस्तु पानेके लिये शेष रह नहीं जाती। इसी हेतुसे, आगे तीसरे अध्यायमें (गीता ३. १७) कहा है, कि "जो ज्ञानी हो गया, उसे इस जगत्‌मे कर्तव्य शेष नहीं रहता।" बड़े भारी तालाब या नदी पर अनायासही, जितना चाहिये उतना, निर्मल पानी पीनेकी सुविधा होनेपर कुएँकी ओर कौन झाँकेगा? ऐसे समय कोईभी कुएँकी अपेक्षा नहीं रखता। सनत्सुजातीयके अंतिम अध्यायमें (मभा. उद्योग. ४५. २६) यही श्लोक कुछ थोड़े-से शब्दोंके हेरफेरसे आया है। माधवाचार्यने इस श्लोककी टीकामें वैसाही अर्थ किया है, जैसा कि हमने ऊपर किया है; एवं शुकानुप्रश्नमें ज्ञान और कर्मके तारतम्यका विवेचन करते समय साफ़ कह दिया है- "न ते (ज्ञानिनः) कर्म प्रशमन्ति कूपं नद्यां पिबन्निव" - नदीपर जिसे पानी मिलता है, वह जिस प्रकार कुएँकी परवाह नहीं करता उसी प्रकार 'ते' अर्थात् ज्ञानी पुरुष कर्मकी कुछ परवाह नहीं करते (मभा. शां. २४०. १०)। ऐसेही पांडव- गीताके सतहवे श्लोकमें कुएँका दृष्टान्त यों दिया है- जो वासुदेवको छोड़कर दूसरे देवताकी उपासना करता है, वह- "तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं वाञ्छति दुर्मतिः" - भागीरथी तटपर पीनेके लिये पानी मिलने परभी, कुएँ की इच्छा करनेवाले प्यासे पुरुषके समान मूर्ख है। यह दृष्टान्त केवल वैदिक ग्रंथोमेंही नहीं है, प्रत्युत पालिके बौद्ध ग्रंथोंमेंभी उसके प्रयोग है। यह सिद्धान्त बौद्ध धर्मकोभी मान्य है, कि जिस पुरुषने अपनी तृष्णा समूल नष्ट कर डाली हो उसे आगे और कुछ प्राप्त करनेके लिये नहीं रह जाता; और इस सिद्धान्तको बतलाते हुए उदान नामक पाली ग्रंथके (७. ९) इस श्लोकमें यह दृष्टान्त दिया है- "कि कयिरा उदपानेन आपा चे सव्वदा सियुम" - सर्वदा पानी मिलने योग्य हो जानेमे कुएँको लेकर क्या करना है? आजकल बड़े-बड़े शहरोंमें यह देखाभी जाता है, कि घरमें नल हो जानेसे फिर कोई कुएँकी परवाह नही करता। इससे और विशेष कर

दूसरा अध्याय ६४१ § § कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥ | शुकानुप्रश्नके विवेचनसे गीताके दृष्टान्तका स्वारस्य ज्ञात हो जायगा; और | यह दीख पड़ेगा, कि हमने इस श्लोकका ऊपर जो अर्थ किया है, वही सरल और | ठीक है। परंतु, चाहे इस कारणसे हो, कि ऐसे अर्थसे वेदोंमें कुछ गौणता आ जाती | है; अथवा इस सांप्रदायिक सिद्धान्तकी ओर दृष्टि देनेसे हो, कि ज्ञानमेंही समस्त | कर्मोंका समावेश रहनेके कारण ज्ञानीको कर्म करनेकी ज़रूरत नहीं। गीताके | टीकाकार इस श्लोकके पदोंका अन्वय कुछ निराले ढंगसे लगाते हैं। वे इस | श्लोकके पहले चरणमें 'तावान्' और दूसरे चरणमें 'यावान्' पदोंको अध्याहृत | मानकर ऐसा अर्थ लगाते हैं - "उदपाने यावानर्थः तावानेव सर्वतः सम्प्लुतोदके | यथा सम्पद्यते तथा यावान् सर्वेषु वेदेषु अर्थः तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य | सम्पद्यते" - अर्थात् स्नान-पान आदि कर्मोंके लिये कुएँका जितना उपयोग | होता है, उतनाही बड़े तालाबकाभी (सर्वतः सम्प्लुतोदके) हो सकता है; | उसी प्रकार वेदोंका जितनाभी उपयोग है, उतना सब, ज्ञानी पुरुषको | ज्ञानसे हो सकता है। परंतु इस अन्वयमें पहली श्लोकपंक्तिमें 'तावान्' और | दूसरी पंक्तिमें 'यावान्' इन दो पदोंके अध्याहार कर लेनेकी आवश्यकता पड़नेके | कारण, हमने इस अन्वय और अर्थको स्वीकृत नहीं किया। हमारा अन्वय | और अर्थ किसीभी पदके, अध्याहार किये बिनाही लग जाता है; और पूर्वके | श्लोकसे सिद्ध होता है, कि उसमें प्रतिपादित वेदोंके कोरे अर्थात् ज्ञानव्यतिरिक्त | कर्मकांडका गौणत्वही इस स्थलपर विवक्षित है। अब ज्ञानी पुरुषको यज्ञयाग | आदि कर्मोंकी कोई आवश्यकता न रह जानेसे, कुछ लोग जो यह अनुमान किया | करते हैं, कि इन कर्मोंको ज्ञानी पुरुष न करे, बिलकुल छोड़ दे - यह बात गीताको | संमत नहीं है। क्योंकि, यद्यपि इन कर्मोंका फल ज्ञानी पुरुषको अभीष्ट नहीं | होता, तथापि फलके लिये न सही; तोभी यज्ञयाग आदि कर्मोंको, अपना शास्त्र- | विहित कर्तव्य समझकर, वह कभी छोड़ नहीं सकता - अठारहवें अध्यायमें | भगवान्ने अपना निश्चित मत स्पष्ट कह दिया है, कि फलाशा न रहे, तोभी | अन्यान्य निष्काम कर्मोंके समान यज्ञयाग आदि कर्मभी ज्ञानी पुरुषको निःसंग- | बुद्धिसे करनेही चाहिये (पिछले श्लोकपर और गीता ३. १९ पर हमारी जो | टिप्पणी है, उसे देखो)। यही निष्कामविषयक अर्थ अब अगले श्लोकमें व्यक्त | कर दिखलाते हैं - ] (४७) कर्म करने मात्रका तेरा अधिकार है; फल (मिलना या न मिलना) कभीभी तेरे अधिकार अर्थात् ताबेमें नहीं; (इसलिये मेरे कर्मका) गी. र. ४१

६४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥ अमुक फल मिले, यह ( लालची ) हेतु ( मनमें ) रखकर काम करनेवाला न हो; और कर्म न करनेकाभी तू आग्रह न कर । । [ इस श्लोकके चारों चरण परस्पर एक दूसरेके अर्थके पूरक हैं। इस । कारण अतिव्याप्ति न होकर कर्मयोगका सारा रहस्य थोड़ेमें उत्तम रीतिसे । बतला दिया गया है । और तो क्या, यह कहनेमेंभी कोई हानि नहीं, कि ये चारों । चरण कर्मयोगकी चतुःसूत्रीही हैं। यह पहले कह दिया है, कि "कर्म करने मात्रका । तेरा अधिकार है।" परन्तु इसपर यह शंका होती है, कि, कर्मका फल तो कर्मसेही । संयुक्त होनेके कारण " जिसका पेड़, उसीका फल" इस न्यायसे जो कर्म करनेका । अधिकारी है, वही फलकाभी अधिकारी होगा। अतएव इस शंकाको दूर करनेके । निमित्त दूसरे चरणमें स्पष्ट कह दिया है, कि " फलमें तेरा अधिकार नहीं है।" । फिर इससे निष्पन्न होनेवाला तीसरा यह सिद्धान्त बतलाया है, कि " मनमें । फलाशा रखकर कर्म करनेवाला मत हो।" ('कर्मफलहेतुः' = कर्मफले हेतुर्यस्य । स कर्मफलहेतुः, ऐसा बहुव्रीहि समास होता है; ), परंतु कर्म और उसका फल । दोनों संलग्न होते हैं, इस कारण यदि कोई ऐसा सिद्धान्त प्रतिपादन करने लगे, । कि फलाशाके साथ साथ फलकोभी छोड़ही देना चाहिये, तो उसेभी सच न । माननेके लिये अंतमें स्पष्ट उपदेश किया है, कि " फलाशाको तो छोड़ दे, पर । इसके साथही कर्म न करनेका अर्थात् कर्म छोड़नेका आग्रह न कर।" सारांश, । "कर्म कर" कहनेसे यह अर्थ तो नहीं होता कि "फलकी आशाको रख" और । "फलकी आशाको छोड़" कहनेसे यह अर्थ नहीं हो जाता कि "कर्मोंको छोड़ । दे" अतएव इस श्लोकका यह अर्थ है, कि फलाशा छोड़कर कर्त्तव्य-कर्म अवश्य । करना चाहिये; किंतु न तो कर्मकी आसक्तिमें फँसें और न कर्मही छोड़ें - । "त्यागो न युक्त इह कर्मसु नापि रागः" (योग. ५. ५. ५४) । और यह । दिखलाकर कि फल मिलनेकी बात अपने वशमें नहीं है; किंतु उसके लिये और । अनेक बातोंकी अनुकूलता आवश्यक है; अठारहवें अध्यायमें फिर यही अर्थ । औरभी दृढ़ किया गया है (गीता १८. १४-१६; गीतारहस्य प्र. ५, पृ. ११५; । प्र. १२)। अब कर्मयोगका यह स्पष्ट लक्षण बतलाते हैं, कि इसेही योग अथवा । कर्मयोग कहते हैं-] ( ४८ ) हे धनंजय ! आसक्ति छोड़कर, और कर्मकी सिद्धि हो या असिद्धि, दोनोंको समानही मानकर, 'योगस्थ' हो करके कर्म कर; ( कर्मके सिद्ध होने या निष्फल होनेमें रहनेवाली) समताकी (मनो-)वृत्तिकोही (कर्म-)योग कहते हैं।

दूसरा अध्याय ६४३ दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥ (४९) क्योकि हे धनजय ! बुद्धिके (साम्य-) योगकी अपेक्षा (बाह्य) कर्म बहुतही कनिष्ठ है। अतएव इस साम्य-बुद्धिकी शरणमें जा। फलहेतुक अर्थात् फलपर दृष्टि रखकर काम करनेवाले लोग कृपण अर्थात् दीन या निचले दर्जेके हैं। (५०) जो (साम्य-) बुद्धिसे युक्त हो जाय, वह इस लोकमें पाप और पुण्य, दोनोंसे अलिप्त रहता है, अतएव योगका आश्रय कर । (पाप-पुण्यसे बचकर) कर्म करनेकी चतुराईकोही (कुशलता या युक्ति) कर्मयोग कहते हैं। [इन श्लोकोंमें कर्मयोगका जो लक्षण बतलाया ह, वह महत्त्वका है; इस संबंधमें गीतारहस्यके तीसरे प्रकरणमें (पृ. ५६-६४) जो विवेचन किया गया है, उसे देखो। पर उसमेंभी कर्मयोगका जो तत्त्व- "कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है"-४९ वें श्लोकमें बतलाया है, वह अत्यंत महत्त्वका है। 'बुद्धि' शब्दके पीछे 'व्यवसायात्मिका' विशेषण नहीं है, इसलिये इस श्लोकमें उसका अर्थ 'वासना' या 'समझ' होना चाहिये। कुछ लोग बुद्धिका अर्थ 'ज्ञान' करके इस श्लोकका ऐसा अर्थ करना चाहते हैं, कि ज्ञानीकी अपेक्षा कर्म हलके दर्जेका है; परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। क्योकि, पीछे ४८ वें श्लोकमें समत्वका लक्षण बतलाया है, और ४९ वें तथा अगले श्लोकमेंभी वही वर्णित है, इस कारण यहाँ बुद्धिका अर्थ समत्व-बुद्धिही करना चाहिये। किसीभी कर्मकी भलाई-बुराई कर्मपर अवलंबित नहीं होती; कर्म एकही क्यों न हो, पर करनेवालेकी भली वा बुरी बुद्धिके अनुसार वह शुभ अथवा अशुभ हुआ करता है; अतः कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ है; इत्यादि नीतिके तत्त्वोंका विचार गीतारहस्यके चौथे, बारहवें और पंद्रहवें प्रकरणमें (पृ. ८८, ३८३-३८४; ४७७-४८०) किया गया है; इस कारण यहाँ और अधिक चर्चा नहीं करते। ४१ वे श्लोकमें बतलायाही है, कि वासनात्मक बुद्धिको सम और शुद्ध रखनेके लिये कार्य-अकार्यका निर्णय करनेवाली व्यवसायात्मका बुद्धि पहले स्थिर हो जानी चाहिये। इसलिये 'साम्य- बुद्धि' - इस शब्दसेही स्थिर व्यवसायात्मका बुद्धि, और शुद्ध वासना (वासनात्मक बुद्धि) इन दोनोंकाभी बोध हो जाता है। यह साम्य-बुद्धिही, शुद्ध आचरण अथवा कर्मयोगकी जड़ है, इसलिये ३९ वें श्लोकमें भगवानने पहले जो यह कहा है, कि कर्म करनेकीभी कर्मकी बाधा न लगनेवाली युक्ति अथवा योग तुझे बतलाता हूँ; उसीके अनुसार इस श्लोकमें कहा है, कि "कर्म करते समय बुद्धिको

६४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥ यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥ श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥ | स्थिर, पवित्र, सम और शुद्ध रखनाही " वह 'युक्ति' या 'कौशल्य' है, और | इसीको 'योग' कहते हैं - इस प्रकार योग शब्दकी दो वार व्याख्या की गई है । | ५० वें श्लोकके “योगः कर्मसु कौशलम् ” इस पदका इस प्रकार सरल अर्थ | लगनेपरभी, कुछ लोगोंने ऐसी खीचातानीसे अर्थ लगानेका प्रयत्न किया है, | कि “ कर्मसु योगः कौशलम् ” – कर्ममें जो योग है, उसको कौशल कहते हैं। पर | 'कौशल' शब्दकी व्याख्या करनेका यहाँ कोई प्रयोजन नही है, 'योग' शब्दका | लक्षण बतलानाही अभीष्ट है, इसलिये यह अर्थ सच्चा नहीं माना जा सकता । | इसके अतिरिक्त जब कि “कर्मसु कौशलम्” ऐसा सरल अन्वय लग सकता है, | तब 'कर्मसुयोगः' ऐसा औंधासीधा अन्वय करनाभी ठीक नहीं है । अब बतलाते | हैं, कि इस प्रकार साम्य-बुद्धिसे समस्त कर्म करते रहनेसे व्यवहारका लोप नहीं | होता और पूर्ण सिद्धि अथवा मोक्ष प्राप्त हुए बिना नहीं रहता – ] (५१) (समत्व-) बुद्धिसे युक्त (जो) ज्ञानी पुरुष कर्मफलका त्याग करते हैं, (वे) जन्मके बंधसे मुक्त होकर (परमेश्वरके) दुःखरहित पदको जा पहुँचते हैं। (५२) जब तेरी बुद्धि मोहके गंदले आवरणसे पार हो जायगी, तब उन बातोंसे तू विरक्त हो जायगा, जो सुनी हैं और सुननेकी हैं। | [अर्थात् तुझे अधिक कुछ सुननेकी इच्छा न होगी । क्योंकि इन बातोंके | सुननेसे मिलनेवाला फल तुझे पहलेही प्राप्त हो चुका होगा । 'निर्वेद' शब्दका | उपयोग प्रायः संसारी प्रपंचसे उकताहट या वैराग्यके लिये किया जाता है। इस | श्लोकमें उसका सामान्य अर्थ 'ऊब जाना' या 'चाह न रहना' ही है । अगले | श्लोकसे दीख पड़ेगा, कि यह उकताहट, विशेष करके पीछे बतलाये हुए, त्रैगुण्य- | विषयक श्रौत-कर्मोंके संबंधमें है।] (५३) (नाना प्रकारके) वेदवाक्योंसे घबड़ाई हुई तेरी बुद्धि जब समाधिवृत्तिमें स्थिर और निश्चल होगी, तब (यह साम्य-बुद्धिरूप) योग तुझे प्राप्त होगा । [सारांश, द्वितीय अध्यायके ४४ वें श्लोकके कथनानुसार, लोग जो वेद- | वाक्यकी फलश्रुतिमें भूले हुए हैं, और जो लोग किसी विशेष फलकी प्राप्तिके

दूसरा अध्याय ६४५ अर्जुन उवाच। § § स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥ श्रीभगवानुवाच । प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥ यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥ | लिये कुछ-न-कुछ कर्म करनेकी धुनमें लगे रहते हैं, उनकी बुद्धि स्थिर नहीं | होती - औरभी अधिक गड़बड़ा जाती है । इसलिये अनेक उपदेशोंका सुनना | छोड़ कर चित्तको निश्चल समाधि-अवस्थामें रख; ऐसा करनेसे साम्य-बुद्धिरूप | कर्मयोग तुझे प्राप्त होगा और अधिक उपदेशकी जरूरत न रहेगी, एवं कर्म | करनेपरभी तुझे उनका पाप न लगेगा। इस रीतिसे जिस कर्मयोगीकी बुद्धि या | प्रज्ञा स्थिर हो जाय, उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं। अब अर्जुनका प्रश्न है, कि उसका | व्यवहार कैसा होता है । ] अर्जुनने कहा - (५४) हे केशव ! (मुझे बतलाओ कि) समाधिस्थ स्थितप्रज्ञ किसे कहें ? उस स्थितप्रज्ञका बोलना, बैठना, और चलना कैसा रहता है ? | [ इस श्लोकमें 'भाषा' शब्द 'लक्षण'के अर्थमें प्रयुक्त है और हमने उसका | भाषांतर, उसकी भाषा धातुके अनुसार 'किसे कहें' किया है। गीतारहस्यके | बारहवें प्रकरणमें (पृ. ३६८-३६९) स्पष्ट कर दिया है, कि स्थितप्रज्ञका | बर्ताव कर्मयोगशास्त्रका आधार है; और उससे अगले वर्णनका महत्त्व ज्ञात हो | जायगा । ] श्रीभगवानने कहा :- (५५) हे पार्थ ! (जब कोई मनुष्य अपने) मनके समस्त काम अर्थात् वासनाओंको छोड़ता है; और अपने आपमेंही संतुष्ट होकर रहता है, तब उसको स्थितप्रज्ञ कहते हैं। (५६) दुःखमें जिसके मनको खेद नहीं होता, सुखमें जिसकी आसक्ति नहीं; और प्रीति, भय एवं क्रोध जिसके छूट गये हैं, उसको स्थितप्रज्ञ मुनि कहते हैं। (५७) सब बातोंमें जिसका मन निःसंग हो गया; और यथाप्राप्त शुभ-अशुभका जिसे आनंद या विषादभी नहीं; (कहना चाहिये

६४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥ विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥ कि) उसकी बुद्धि स्थिर हुई । (५८) जिस प्रकार कछुवा अपने (हाथ-पैर आदि) अवयव सब ओरसे सिकोड़ लेता है, उसी प्रकार जब कोई पुरुष इंद्रियोंके (शब्द, स्पर्श आदि) विषयोंसे (अपनी) इंद्रियोंको खींच लेता है, तब (कहना चाहिये कि) उसकी बुद्धि स्थिर हुई । (५९) निराहारी पुरुषके विषय छूट जावें, तोभी (उनका) रस अर्थात् चाह नहीं छूटती । परंतु परब्रह्मका अनुभव होनेपर (सब विषय और उनकी) चाहभी छूट जाती है-अर्थात् विषय और उनकी चाह, दोनों छूट जाते हैं । [ अन्नसे इंद्रियोंका पोषण होता है । अतएव निराहार या उपवास करनेसे इंद्रियाँ अशक्त होकर अपने विषयोंका सेवन करनेमें असमर्थ हो जाती हैं । पर इस रीतिसे विषयोपभोगका छूटना केवल जबर्दस्तीकी, अशक्तताकी बाह्य क्रिया हुई । उससे मनकी विषयवासना (रस) कुछ कम नहीं होता, इसलिये वह वासना जिससे नष्ट हो, उस ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति करनी चाहिये । इस प्रकार ब्रह्मका अनुभव हो जानेपर मन एवं उसके साथही साथ इंद्रियाँभी आप-ही-आप तावेमें रहती है; इंद्रियोंको तावेमें रखनेके लिये निराहार आदि उपाय आवश्यक नहीं हैं; यही इस श्लोकका भावार्थ है । और यही अर्थ आगे छठे अध्यायके इस श्लोकमें स्पष्टतासे वर्णित है (गीता ६. १६, १७; ३. ६, ७), कि योगीका आहार नियमित रहे, आहार-विहार आदिको वह बिलकुलही न छोड़ दे । सारांश, गीताका यह सिद्धान्त ध्यानमें रखना चाहिये, कि शरीरको कृश करनेवाले निराहार आदि साधन एकांगी हैं, अतएव वे त्याज्य हैं, नियमित आहारविहार और ब्रह्म- ज्ञानही इंद्रियनिग्रहका उत्तम साधन है । इस श्लोकमें रस शब्दका "जिह्वासे अनुभव किया जानेवाला मीठा, कडुवा इत्यादि रस" ऐसा अर्थ करके, कुछ लोग यह अर्थ करते हैं, कि उपवासोंसे शेष इंद्रियोंके विषय यदि छूटभी जायँ, तोभी जिह्वाका रस अर्थात् खाने-पीने-की इच्छा कम न होकर बहुत दिनोंके निरा- हारसे वह औरभी अधिक तीव्र हो जाती है; और, भागवतमें ऐसे अर्थका एक श्लोकभी है (भाग. ११. ८. २०) । पर हमारी रायमें गीताके इस श्लोकका ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं । क्योंकि दूसरे चरणसे वह मेल नहीं रखता । इसके अतिरिक्त भागवतमें 'रस' शब्द नहीं, 'रसन' है; और गीताके श्लोकका दूसरा चरणभी वहाँ नहीं है । अतएव भागवत और गीताके श्लोकको एकार्थक

दूसरा अध्याय ६४७ यततो ह्यापि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥ तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥ । मान लेना उचित नहीं है। अब आगेके दो श्लोकोंमें यही अर्थ अधिक स्पष्टकर । बतलाते हैं, कि बिना ब्रह्मसाक्षात्कारके पूरा इंद्रियनिग्रह होही नहीं सकता है - ] ( ६० ) कारण यह है, कि केवल ( इंद्रियोंके दमन करनेके लिये ) प्रयत्न करनेवाले विद्वानकेभी मनको, हे कुंतीपुत्र ! ये प्रबल इंद्रियाँ बलात्कारसे मनमानी ओर खींच लेती हैं। ( ६१ ) ( अतएव ) इन सब इंद्रियोंका संयमनकर युक्त अर्थात् योगयुक्त और मत्परायण होकर रहना चाहिये । इस प्रकार जिसकी इंद्रियाँ अपने आधीन हो जायें, ( कहना चाहिये कि ) उसकी बुद्धि स्थिर हो गई । । [ इस श्लोकमें कहा है, कि नियमित आहारसे इंद्रियनिग्रह करके, साथही । साथ ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये मत्परायण होना चाहिये । अर्थात् ईश्वरमें चित्त । लगाना चाहिये; और ५९ वें श्लोकका हमने जो अर्थ किया है, उससे प्रकट । होगा, कि उसका हेतु क्या है ? मनुनेभी निरे इंद्रियनिग्रह करनेवाले पुरुषको । यह इशारा किया है, कि “ बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति' ( मनु. । २. २१५ ); और उसीका अनुवाद ऊपरके ६० वें श्लोकमें किया है। सारांश, । इन तीन श्लोकोंका भावार्थ यह है, कि जिसे स्थितप्रज्ञ होना हो, उसे अपना । आहार-विहार नियमित रखकर ब्रह्मज्ञानही प्राप्त करना चाहिये; और यह । ब्रह्मज्ञान होनेपरही मन निर्विषय होता है, शरीरक्लेशके उपाय तो ऊपरी । हैं - सच्चे नहीं । 'मत्परायण' पदसे यहाँ भक्ति-मार्गकाभी आरंभ हो गया । है (गीता ९. १३४) । ऊपरके श्लोकमें जो 'युक्त' शब्दका अर्थ योगसे तैयार । या बना हुआ है। गीता. ६. १७ के 'युक्त' शब्द है, उसका अर्थ 'नियमित' है । । पर गीताके इस शब्दका सदैवका अर्थ है - " साम्य-बुद्धिका जो योग गीतामें । बतलाया गया है, उसका उपयोग करके तदनुसार समस्त सुखदुःखोको शांति- । पूर्वक सहन कर, व्यवहार करनेमें चतुर पुरुष " ( गीता ५. २३ ) । इस । रीतिसे निष्णात हुए पुरुषकोही 'स्थितप्रज्ञ' यह कहते हैं, उसकी यह अवस्थाही । सिद्धावस्था कहलाती है; और इस अध्यायके तथा पाँचवे एवं बारहवें अध्यायके । अंतमें इसीका वर्णन है। यह बतला दिया, कि विषयोंकी चाह छोड़कर स्थित- । प्रज्ञ होनेके लिये क्या आवश्यक है ? अब अगले श्लोकोंमें यह वर्णन करते हैं कि, । विषयोंमें चाह कैसे उत्पन्न होती है ? इस चाहसे आगे चलकर कामक्रोध आदि

६४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते । संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥ रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥ | विकार कैसे उत्पन्न होते हैं ? और अंतमें उससे मनुष्यका नाश कैसे हो जाता | है । एवं इनसे छुटकारा किस प्रकार मिल सकता है ? ] ( ६२ ) विषयोंका चिंतन करनेवाले पुरुषका इन विषयोंमें संग बढ़ता जाता है । फिर इस संगसे यह वासना उत्पन्न होती है, कि हमको काम ( अर्थात् वह विषय ) चाहिये; और ( इस कामकी तृप्ति होनेमें विघ्न आनेसे ) उस कामसेही क्रोधकी उत्पत्ति होती है; ( ६३ ) क्रोधसे संमोह अर्थात् अविवेक होता है, संमोहसे स्मृति-भ्रंश, स्मृति-भ्रंशसे बुद्धि-नाश और बुद्धि-नाशसे ( पुरुषका ) सर्वस्व नाश हो जाता है । ( ६४ ) परंतु अपना आत्मा अर्थात् अंतःकरण जिसके काबूमें है, वह (पुरुष) प्रीति और द्वेषसे छूटी हुई, अपने आधीन इंद्रियोंसे विषयोंमें बर्ताव करकेभी ( चित्तसे ) प्रसन्न रहता है । ( ६५ ) चित्त प्रसन्न रहनेसे उसके सब दुःखोंका नाश होता है । क्योंकि जिसका चित्त प्रसन्न है, उसकी बुद्धिभी तत्काल स्थिर होती है । | [ स्मरण रहे, कि इन दो श्लोकोंमें स्पष्ट वर्णन है, कि विषय या कर्मोंको | न छोड़, स्थितप्रज्ञ केवल उनका संग छोड़कर विषयोंमेंही निःसंग-बुद्धिसे वर्तता | रहता है और उसे जो शांति मिलती है, वह कर्मत्यागसे नहीं; किंतु फलाशाके | त्यागसे प्राप्त होती है । क्योंकि, इसके सिवा अन्य बातोंमें इस स्थितप्रज्ञमें और | संन्यास-मार्गवाले स्थितप्रज्ञमें कोई भेद नहीं है । इंद्रिय-संयमन, निरिच्छा और | शांति ये गुण दोनोंकोभी चाहिये; परंतु इन दोनोंमें महत्त्वका भेद यह है, कि | गीताका स्थितप्रज्ञ कर्मोंका संन्यास नहीं करता, किंतु लोकसंग्रहके निमित्त | समस्त कर्म निष्काम बुद्धिसे किया करता है; और संन्यास-मार्गवाला स्थित- | प्रज्ञ करताही नहीं है ( गीता ३. २५ ) । किंतु गीताके संन्यास-मार्गीय टीका- | कार इस भेदको गौण समझकर, सांप्रदायिक आग्रहसे प्रतिपादन किया करते | हैं, कि स्थितप्रज्ञका उक्त वर्णन संन्यास-मार्गकाही है । इस प्रकार जिसका

दूसरा अध्याय ६४९ नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥ इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥ तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥ या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥ | चित्त प्रसन्न नहीं, उसका वर्णनकर स्थितप्रज्ञके स्वरूपका अब औरभी अधिक | व्यक्त करते हैं - ] ( ६६ ) जो पुरुष उक्त रीतिसे युक्त अर्थात् योगयुक्त नहीं हुआ है उसमें ( स्थिर ) बुद्धि और भावना अर्थात् दृढ़-बुद्धिरूप निष्ठाभी नहीं रहती । जिसे भावना नहीं, उसे शांति नही; और जिसे शांति नहीं, उसे सुख मिलेगा कहाँसे ? ( ६७ ) ( विषयोंमें ) संचार अर्थात् व्यवहार करनेवाली इंद्रियोंके पीछे पीछे मन जो जाने लगता है, वही पुरुषकी बुद्धिको ऐसे हरण किया करता है, जैसे कि पानीमें नौकाको वायु खींचती है। ( ६८ ) अतएव हे महाबाहु अर्जुन ! इंद्रियोंके विषयोंसे जिसकी इंद्रियां चहूँ ओरसे हटी हुई हों, ( कहना चाहिये कि ) उसीकी बुद्धि स्थिर हुई । | [ सारांश, मनके निग्रहके द्वारा इंद्रियोंका निग्रह करना सब साधनोंका | मूल है । विषयोंमें व्यग्र होकर इंद्रियाँ इधर-उधर दौड़ती रहें, तो आत्मज्ञान | प्राप्तकर लेनेकी ( वासनात्मक ) बुद्धिही नहीं हो सकती । अर्थ यह है, कि बुद्धि | न हो, तो उसके विषयमें दृढ़ उद्योगभी नही होता; और फिर शांति एवं | सुखभी नहीं मिलता । गीतारहस्यके चौथे प्रकरणमें दिखलाया है, कि इंद्रिय- | निग्रहका यह अर्थ नहीं है, कि इंद्रियोंको सर्वथा दबाकर सब कर्मोंको बिलकुल | छोड़ दे; किंतु गीताका अभिप्राय यह है, कि ६४ वें श्लोकमें जो वर्णन है, उसके | अनुसार निष्काम बुद्धिमे कर्म करते रहना चाहिये । ] ( ६९ ) सब लोगोंकी जो रात है, उसमें स्थितप्रज्ञ जागता है; और जब समस्त प्राणीमात्र जागते रहते हैं, तब इस ज्ञानवान् पुरुषको रात मालूम होती है । | [ यह विरोधाभासात्मक वर्णन अलंकारिक है । अज्ञान अंधकारको | और ज्ञान प्रकाशको कहते हैं ( गीता १४. ११ ) । अर्थ यह है, कि अज्ञानी

६५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥ § § विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स शान्ति मधिगच्छति ॥ ७१ ॥ लोगोंको जो वस्तु अनावश्यक प्रतीत होती है, (अर्थात् उन्हें जो अंधकार है वही ज्ञानियोंको आवश्यक होती है; और जिसमें अज्ञानी लोग उलझे रहते हैं, उन्हें जहाँ उजेला मालूम होता है - वहीं ज्ञानीको अँधेरा दीख पड़ता है - अर्थात् ज्ञानीको वह अभीष्ट नहीं रहता । उदाहरणार्थ, ज्ञानी पुरुष काम्य-कर्मोंको तुच्छ मानता है, तो सामान्य लोग उन्हींसे लिपटे रहते हैं; और ज्ञानी पुरुषको जो निष्काम कर्म चाहिये, उसकी औरोंको चाह नहीं होती ।] ( ७० ) चारों ओरसे (पानी) भरते जानेपरभी जिसकी मर्यादा नहीं डिगती, ऐसे समुद्रमें जिस प्रकार सब पानी चला जाता है, उसी प्रकार जिस पुरुषमें समस्त विषय (उसकी शांति भंग किये बिनाही) प्रवेश करते हैं, उसेही (सच्ची) शांति मिलती है । विषयोंकी इच्छा करनेवालेको (यह शांति मिलना संभव नहीं है) । [ इस श्लोकका अर्थ यह नहीं है, कि शांति प्राप्त करनेके लिये कर्म न करना चाहिये; प्रत्युत भावार्थ यह है, कि साधारण लोगोंका मन फलाशासे या काम्य-वासनासे घबड़ा जाता है; और उनके कर्मोंसे उनसे मनकी शांति बिगड़ जाती है; परंतु जो सिद्धावस्थामें पहुँच गया है, उसका मन फलाशासे क्षुब्ध नहीं होता, कितनेही कर्म करनेको क्यों न हों, पर उसके मनकी शांति नहीं डिगती । वह समुद्रसरीखा शांत बना रहता है, और सब काम किया करता है, अतएव उसे सुख-दुःखकी व्यथा नहीं होती । (उक्त ६४ वाँ श्लोक और गीता ४. १९) । अब इस विषयका उपसंहार करके बतलाते हैं, कि स्थितप्रज्ञकी इस स्थितिका नाम क्या है ? ] ( ७१ ) जो पुरुष समस्त काम अर्थात् आसक्ति छोड़कर और निःस्पृह हो करके ( व्यवहारमें ) बर्तता है, एवं जिसे ममत्व और अहंकार नहीं होता, उसेही शांति मिलती है ! [ संन्यास-मार्गके टीकाकार इस 'चरति' ( बर्तता है ) पदका "भीख मांगता फिरता है" ऐसा अर्थ करते हैं; परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है । पिछले ६४ वें और ६७ वें श्लोकोंमें 'चरन्' एवं 'चरतां'का जो अर्थ है, वही अर्थ यहाँभी करना चाहिये । गीतामें ऐसा उपदेश कहींभी नहीं है, कि स्थितप्रज्ञ भिक्षा माँगा करे । हाँ; इसके विरुद्ध ६४ वें श्लोकमें यह स्पष्ट कह दिया है, कि स्थित- प्रज्ञ पुरुष इंद्रियोंको अपने अधीन रखकर 'विषयोंमें बर्ते ।' अतएव 'चरति'का

दूसरा अध्याय ६५१ एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ । ऐसाही अर्थ करना चाहिये, कि “ बर्तता है ” अर्थात् “ जगतके व्यवहार करता । है ”। श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने दासबोधके उत्तरार्धमें इस बातका उत्तम । वर्णन किया है, कि 'निःस्पृह' चतुर पुरुष ( स्थितप्रज्ञ ) व्यवहारमें कैसे बर्तता । है, और गीतारहस्यके चौदहवें प्रकरणका विषयभी वही है । ] ( ७२ ) हे पार्थ ! ब्राह्मी स्थिति यही है । इसे पा जानेपर कोईभी मोहमें नहीं फँसता; और अंतकालमें अर्थात् मरनेके समयमेंभी इस स्थितिमें रहकर वह ब्रह्म- निर्वाण अर्थात् ब्रह्ममें मिल जानेके स्वरूपका मोक्ष पाता है । । [ यह ब्राह्मी स्थिति कर्मयोगकी अंतिम और अत्युत्तम स्थिति है ( गीतार. । प्र. ९, पृ. २३१; २५१ ); और इसमें विशेषता यह है; कि इसके प्राप्त । हो जानेसे फिर मोह नहीं होता । यहाँपर इस विशेषत्वके बतलानेका कारण । यह कि, यदि किसीको किसी दिन दैवयोगसे घड़ी-दो घड़ीके लिये इस ब्राह्मी । स्थितिका अनुभव हो सके, तो उससे चिरकालिक लाभ नहीं होता । क्योंकि । किसीभी मनुष्यकी यदि मरते समय यह स्थिति न रहेगी, तो मरणकालमें । जैसी वासना मनमें रहेगी, उसीके अनुसार आगे पुनर्जन्म होगा ( गीतारहस्य । पृ. २९१ ) । यही कारण है, जो ब्राह्मी स्थितिका वर्णन करते हुए इस श्लोकमें । स्पष्टतया कह दिया है, कि 'अंतकालेऽपि' = अंतकालमेंभी, स्थितप्रज्ञकी यह । अवस्था स्थिर बनी रहती है । अंतकालमें मनके शुद्ध रहनेकी विशेष आवश्य- । कताका वर्णन उपनिषदोंमें ( छां. ३. १४. १; प्र. ३. १० ) और गीतामेंभी । ( गीता ८. ५-१० ) है । यह वासनात्मक कर्म अगले अनेक जन्मोंके मिलनेका । कारण है, इसलिये प्रकटही है, कि कम-से-कम मरनेके समय तो वासना शून्य । हो जानी चाहिये । और फिर यहभी कहना पड़ता है, कि मरण समयमें । वासना शून्य होनेके लिये पहलेही वैसा अभ्यास हो जाना चाहिये । क्योंकि, । वासनाको शून्य करनेका कर्म अत्यंत कठिन है, और विना ईश्वरकी विशेष । कृपाके उसका सहसा किसीकोभी प्राप्त हो जाना न केवल कठिन है, वरन् । असंभवभी है, यह तत्त्व केवल वैदिक धर्ममेंही नहीं है, कि मरण-समयमें वासना । शुद्ध होनी चाहिये; किंतु अन्यान्य धर्मोंमेंभी यह तत्त्व अंगीकृत हुआ है । । ( गीतारहस्य प्र. १३, पृ. ४४१ ) ]

६५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए उपनिषदमें, ब्रह्मविद्या- न्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय समाप्त हुआ। [ इस अध्यायमें, आरंभमें सांख्य अथवा संन्यास-मार्गका विवेचन है, इस कारण इसको सांख्ययोग नाम दिया गया है। परंतु इससे यह न समझ लेना चाहिये, कि पूरे अध्यायमें वही विषय है। एकही अध्यायमें प्रायः अनेक विषयोंका वर्णन होता है। जिस अध्यायमें जो विषय आरंभमें आ गया है, अथवा जो विषय उसमें प्रमुख है, उसके अनुसार उस अध्यायका नाम रख दिया जाता है। (गीतारहस्य प्रकरण १४, पृ. ४४६.)]

तीसरा अध्याय ६५३ तृतीयोऽध्यायः । अर्जुन उवाच । ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥ श्रीभगवानुवाच । § § लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥ तीसरा अध्याय [ अर्जुनको भय हो गया था, कि मुझे भीष्म-द्रोण आदिको मारना पड़ेगा । अतः सांख्य-मार्गके अनुसार आत्माकी नित्यता और अशोच्यत्वसे यह सिद्ध करके कि अर्जुनका भय वृथा है; फिर स्वधर्मका थोड़ा-सा विवेचन करके गीताके मुख्य विषय कर्मयोगका दूसरेही अध्यायमें आरंभ किया गया है; और कहा गया है, कर्म करनेपरभी उनके पाप-पुण्यसे बचनेके लिये केवल वही एक युक्ति या योग है, कि वे कर्म साम्य-बुद्धिसे किये जावें । इसके अनंतर अंतमें उस कर्मयोगी स्थितप्रज्ञका वर्णनभी किया गया है, कि जिसकी बुद्धि इस प्रकार सम हो गई है । परंतु इतनेसेही कर्मयोगका विवेचन पूरा नहीं हो जाता । यह बात सच है, कि कोईभी काम सम-बुद्धिसे किया जावे, तो उसका पाप नही लगता; परंतु जब कर्मकी अपेक्षा समबुद्धिकीही श्रेष्ठता विवाडरहित सिद्ध होती है ( गीता २. ४९ ), तब फिर स्थितप्रज्ञकी नाईं बुद्धिको सम कर लेनेसेही काम चल जाता है; इससे यह सिद्ध नहीं होता, कि कर्म करनेही चाहिये । अतएव जब अर्जुनने यही शंका प्रश्नरूपमें उपस्थित की, तब भगवान् इस अध्यायमें तथा अगले अध्यायमें प्रतिपादन करते हैं, कि “ कर्म करनेही चाहिये । ” ] अर्जुनने कहा :- ( १ ) हे जनार्दन ! यदि तुम्हारा यही मत है, कि कर्मकी अपेक्षा (साम्य-)बुद्धिही श्रेष्ठ है, तो हे केशव ! मुझे ( युद्धके ) घोर कर्ममें क्यों लगाते हो ? ( २ ) देखनेमें व्यामिश्र अर्थात् संदिग्ध भाषण करके तुम मेरी बुद्धिको भ्रममें डाल रहे हो ! इसलिये तुम ऐसी एकही बात निश्चित करके मुझे बतलाओ, जिससे मुझे श्रेय अर्थात् कल्याण प्राप्त हो । श्रीभगवानने कहा :- ( ३ ) हे निष्पाप अर्जुन ! ( अर्थात् दूसरे अध्यायमें )

६५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥ न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥ मैंने यह बतलाया है, कि इस लोकमें दो प्रकारकी निष्ठाएँ हैं – अर्थात् ज्ञानयोगसे सांख्योंकी और कर्मयोगसे योगियोंकी । | [ हमने 'पुरा' शब्दका अर्थ, 'पहले' अर्थात् 'दूसरे अध्यायमें' किया है, | यही अर्थ सरल है। क्योंकि दूसरे अध्यायमें पहले सांख्य-निष्ठाके अनुसार ज्ञानका | वर्णन करके फिर कर्मयोग-निष्ठाका आरंभ किया गया है। परंतु 'पुरा' शब्दका | अर्थ 'सृष्टिके आरंभमें' भी हो सकता है; क्योंकि महाभारतमें, नारायणीय या | भागवत-धर्मके निरूपणमें यह वर्णन है, कि सांख्य और योग (निवृत्ति और | प्रवृत्ति) इन दोनों प्रकारकी निष्ठाओंको भगवान्ने स्वतंत्र रूपसे जगत्के | आरंभमेंही उत्पन्न किया है (शां. ३४०; ३४३) । 'निष्ठा' शब्दके पहले मोक्ष | शब्द अध्याहृत है । ? 'निष्ठा' शब्दका अर्थ वह मार्ग है, कि जिसपर चलनेपर | अंतमें मोक्ष मिलता है। गीताके अनुसार ऐसी निष्ठाएँ दोही हैं; और वे | दोनोंभी स्वतंत्र हैं, कोई किसीका अंग नहीं है - इत्यादि बातोंका विस्तृत विवेचन | गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (पृ. ३०६-३१७) में किया गया है, इसलिये | उसे यहाँ दुहरानेकी आवश्यकता नहीं है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणके | अंतमें (पृष्ठ ३५४-३५७) नक्शा देकर इस बातकाभी वर्णन कर दिया गया | है, इन दोनों निष्ठाओंमें भेद क्या है। मोक्षकी दो निष्ठाएँ बतला दी गईं; अब | तदंगभूत नैष्कर्म्य-सिद्धिका स्वरूप स्पष्ट करके बतलाते हैं :- ] (४) (परंतु) कर्मोंका प्रारंभ न करनेसेही पुरुषको नैष्कर्म्य-प्राप्ति नहीं हो जाती; और कर्मोंका (त्याग) करनेसेही सिद्धि नहीं मिल जाती। (५) क्योंकि कोईभी मनुष्य (कुछ-न-कुछ) कर्म किये बिना क्षणभरभी नहीं रह सकता। प्रकृतिके गुण प्रत्येक परतंत्र मनुष्यको (तो सदा कुछ-न-कुछ) कर्म करनेमें लगायाही करते हैं। | [ चौथे श्लोकके पहले चरणमें जो 'नैष्कर्म्य' पद है, उसका 'ज्ञान' अर्थ | मानकर संन्यास-मार्गवाले टीकाकारोंने इस श्लोकका अर्थ अपने संप्रदायके | अनुकूल इस प्रकार बना लिया है – "कर्मोंका आरंभ न करनेसे ज्ञान नहीं | होता, अर्थात् कर्मोंसेही ज्ञान होता है" क्योंकि कर्म ज्ञानप्राप्तिका साधन है ! | परंतु यह अर्थ न तो सरल है और न ठीकभी है। नैष्कर्म्य शब्दका उपयोग वेदान्त | और मीमांसा, इन दोनों शास्त्रोंमें कई बार किया गया है; और सुरेश्वरा-

तीसरा अध्याय ६५५ | चार्यका 'नैष्कर्म्य-सिद्धि' नामक इसी विषयपर एक ग्रंथभी है। तथापि नैष्कर्म्यके | ये तत्त्व कुछ नये नहीं हैं; और न केवल सुरेश्वराचार्यहीके, किंतु मीमांसा और | वेदान्तके सूत्र बननेकेभी पूर्वसेही इनका प्रचार होता आ रहा है। यह बतलानेकी | कोई आवश्यकता नहीं, कि कर्म बंधक होताही है; इसलिये पारेका उपयोग | करनेके पहले जिस प्रकार वैद्य लोग उसे मारकर शुद्ध कर लेते हैं, उसी प्रकार | कर्म करनेके पहले ऐसा उपाय करना पड़ता है, कि जिससे उसका बंधकत्व या | दोष मिट जाय; और ऐसी युक्तिसे कर्म करनेकी स्थितिकोही 'नैष्कर्म्य' कहते | हैं। इस प्रकार बंधकत्वरहित कर्म मोक्षके लिये बाधक नहीं होता, अतएव | मोक्षशास्त्रका यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, कि यह स्थिति कैसे प्राप्त की जाय ? | मीमांसक लोग इसका यह उत्तर देते हैं, कि नित्य और निमित्त होनेपर, नैमि- | त्तिक कर्म तो करना चाहिये; पर काम्य और निषिद्ध कर्म नहीं करने चाहिये, | इससे कर्मका बंधकत्व नही रहता; और नैष्कर्म्यावस्था सुलभ रीतिसे प्राप्त हो | जाती है। परंतु वेदान्तशास्त्रने सिद्धान्त किया है, कि मीमांसकोंकी यह युक्ति | ग़लत है; और इस बातका विवेचन गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृष्ठ | २७६) किया गया है। अन्य कुछ लोगोंका कथन है, कि यदि कर्मही किये | न जावें, तो उनसे बाधाभी तो कैसे हो सकती है ? इसलिये, उनके मतानुसार, | नैष्कर्म्य अवस्था प्राप्त करनेके लिये सब कर्मोंहीको छोड़ देना चाहिये । इनके | मतसे कर्मशून्यताकोही 'नैष्कर्म्य' कहते हैं। परंतु चौथे श्लोकमें बतलाया गया | है, कि यह मत ठीक नहीं है, इससे तो सिद्धि अर्थात् मोक्षभी नहीं मिलता; और | पाँचवें श्लोकमें उसका कारणभी बतला दिया है। यदि हम कर्मको छोड़ देनेका | विचार करें, तोभी जबतक यह देह है, तबतक सोना, बैठना इत्यादि कर्म कभी | रुकही नहीं सकते (गीता ५.९; १८.११) । इसलिये कोईभी मनुष्य कभी | कर्मशून्य नहीं हो सकता। फलतः कर्मशून्यरूपी नैष्कर्म्यभी असंभव है। | सारांश, कर्मरूपी बिच्छू कभी नहीं मरता। इसलिये ऐसा कोई उपाय सोचना | चाहिये, कि जिससे वह विषरहित हो जाय । गीताका सिद्धान्त है, कि कर्मोंमेंसे | अपनी आसक्तिको हटा लेनाही एकमात्र उपाय है; और आगे अनेक स्थानोंमें | इसी उपायका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। परंतु इसपरभी शंका हो | सकती है, कि यद्यपि सब कर्मोंको छोड़ देना नैष्कर्म्य नहीं है, तथापि संन्यास- | मार्गवाले तो सब कर्मोंका संन्यास अर्थात् त्याग करकेही मोक्ष प्राप्त करते हैं, | अतः मोक्षकी प्राप्तिके लिये कर्मोंका त्याग करना आवश्यक है। इस तर्कका | उत्तर गीता इस प्रकार देती है, कि संन्यास-मार्गवालोंको मोक्ष तो मिलता है | सही; परंतु उन्हें वह कर्मोंका त्याग करनेसे नहीं मिलता, किंतु मोक्षसिद्धि | उनके ज्ञानका फल है। यदि केवल कर्मोंका त्याग करनेसेही मोक्षसिद्धि होती | हो, तो फिर पत्थरकोभी मुक्ति मिलनी चाहिये ! इससे ये तीन बातें सिद्ध

प्रकरण १३-१५: गीता-समन्वय व शाङ्कर-रामानुज भाष्य तुलना

६५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥ यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥ | होती हैं :- ( १ ) नैष्कर्म्य कर्मशून्यता नहीं है, ( २ ) कर्मोंको त्याग देनेका | कोई कितनाभी प्रयत्न क्यों न करे, परंतु वे छूट नहीं सकते; और ( ३ ) | कर्मोंको त्याग देना सिद्धि प्राप्त करनेका उपाय नहीं है; और यही बातें | ऊपरके श्लोकोंमें बतलाई गई हैं। जब ये तीनों बातें सिद्ध हो गई, तब अठारहवें | अध्यायके कथनानुसार 'नैष्कर्म्यसिद्धि'की ( गीता १८. ४८, ४९ ) प्राप्तिके लिये | यही एक मार्ग शेष रह जाता है, कि कर्म तो छोड़े नहीं; पर ज्ञान-द्वारा | यद्यपि आसक्तिका क्षय करके सब कर्म सदा करते रहें । क्योंकि ज्ञान मोक्षका | साधन हो, तोभी कर्मशून्य रहनाभी कभी संभव नहीं, इसलिये कर्मोंके | बंधकत्वको ( बंधन ) नष्ट करनेके लिये आसक्ति छोड़कर उन्हें करना | आवश्यक होता है। इसीको कर्मयोग कहते हैं; और अब बतलाते हैं, कि | यही ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक मार्ग विशेष योग्यताका अर्थात् श्रेष्ठ है - ] ( ६ ) जो मूढ ( हाथ-पैर आदि ) कर्मेन्द्रियोंको रोककर मनसे इंद्रियोंके विषयोंका चिंतन किया करता है, उसे मिथ्याचारी अर्थात् दांभिक कहते हैं। ( ७ ) परंतु हे अर्जुन ! जो मनसे इंद्रियोंका आंकलन करके, ( केवल ) कर्मेन्द्रियों-द्वारा अनासक्त- बुद्धिसे 'कर्मयोग'का आरंभ करता है, उसकी योग्यता विशेष अर्थात् श्रेष्ठ है । | [ पिछले अध्यायमें जो यह बतलाया गया है, कि कर्मयोगमें कर्मकी | अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है ( गीता २. ४९ ), उसीका इन दोनों श्लोकोंमें स्पष्टी- | करण किया गया है । यहाँ साफ़ साफ़ कह दिया है, कि जिस मनुष्यका मन | तो शुद्ध नहीं है; पर जो केवल दूसरोंके भयसे या इस अभिलाषासे कि दूसरे | मुझे भला कहें, केवल बाह्येंद्रियोंके व्यापारको रोकता है, वह सच्चा सदाचारी | नहीं है, वह ढोंगी है। जो लोग इस वचनका प्रमाण देकर - कि “ कलौ कर्ता च | लिप्यते ” कलियुगमें दोष बुद्धिमें नहीं, किंतु कर्ममें रहता है, यह प्रतिपादन | किया करते हैं, कि बुद्धि चाहे जैसी हो; परंतु कर्म बुरा न हो; उन्हें उक्त | श्लोकमें वर्णित गीतातत्त्वपर विशेष ध्यान देना चाहिये । सातवें श्लोकसे यह | बात प्रकट होती है, कि निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेके योगकोही गीतामें 'कर्मयोग' | कहा है । कुछ संन्यास-मार्गीय टीकाकार इस श्लोकका ऐसा अर्थ करते हैं, कि | यद्यपि यह कर्मयोग छठे श्लोकमें बतलाये हुए दांभिक मार्गसे श्रेष्ठ है, तथापि | यह संन्यास-मार्गसे श्रेष्ठ नहीं है । परंतु यह युक्ति सांप्रदायिक आग्रहकी है ।

तीसरा अध्याय ६५७ नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥ [ क्योंकि न केवल इसी श्लोकमें, वरन् फिर पाँचवें अध्यायके आरंभमें और अन्यत्रभी, यह स्पष्ट कह दिया गया है, कि संन्यास-मार्गसेभी कर्मयोग अधिक योग्यताका या श्रेष्ठ है (गीतार. प्र. ११, पृ. ३०९-३१०) । इस प्रकार जब कर्मयोगही श्रेष्ठ है, तब अर्जुनको उसी मार्गका आचरण करनेके लिये अब उपदेश करते हैं :- ] (८) (अपने धर्मके अनुसार) नियत अर्थात् नियमित कर्म तू कर । क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना कहीं अधिक अच्छा है। इसके अतिरिक्त (यह समझ ले, कि यदि) तू कर्म न करेगा, तो (भोजनभी न मिलनेसे) तेरा शरीर- निर्वाहतक न हो सकेगा। [ 'अतिरिक्त' और 'तक' (अपि च) पदोंसे शरीरयात्राको कम-से-कम हेतु कहा है। अब यह बतलानेके लिये यज्ञ-प्रकरणका आरंभ किया जाता है, कि 'नियत' अर्थात् नियत किया हुआ 'कर्म' कौन-सा है? और दूसरे किस महत्त्वके कारण उसका आचरण करना चाहिये? आजकल यज्ञयाग आदि श्रौतधर्म लुप्त-सा हो गया है, इसलिये इस विषयका आधुनिक पाठकोंको कोई विशेष महत्व मालूम नहीं होता। परंतु गीताके समयमें इन यज्ञयागोंका पूरा पूरा प्रचार था; और 'कर्म' शब्दसे मुख्यतः इन्हींका बोध हुआ करता था। अतएव, गीताधर्ममें इस बातका विवेचन करना अत्यावश्यक था, कि ये धर्मकृत्य किये जावें या नहीं; और यदि किये जावें, तो किस प्रकार? इसके सिवा, यहभी स्मरण रहे, कि यज्ञ शब्दका अर्थ केवल ज्योतिष्टोम आदि श्रौतयज्ञ या अग्निमें किसीभी वस्तुका हवन करनाही नहीं है (गीता. ४. ३२) । सृष्टिका निर्माण करके, उसका काम ठीक ठीक चलते रहनेके लिये, अर्थात् लोकसंग्रहार्थ, ब्रह्माने प्रजाको चातुर्वर्ण्यविहित जो जो काम बाँट दिये हैं, उन सबका 'यज्ञ' शब्दमें समावेश होता है (मभा. अनु. ४८. ३; गीतार. प्र. १०, पृ. २९१- २९७) । धर्मशास्त्रोंमें इन्हीं कर्मोंका उल्लेख है; और यहाँ 'नियत' शब्दसे वेही विवक्षित हैं। इसलिये कहना चाहिये, कि यद्यपि आजकल श्रौत यज्ञ-याग लुप्तप्राय हो गये हैं; तथापि यज्ञ-चक्रका यह विवेचन अबभी निरर्थक नही है। शास्त्रोंके अनुसार ये सब कर्म काम्य हैं, अर्थात् इसलिये बतलाये गये हैं, कि मनुष्यका इस जगत्में कल्याण हो और उसे सुख मिले। परंतु पीछे दूसरे अध्याय (गीता २. ४१-४४) में यह सिद्धान्त किया है, कि मीमांसकोंके ये सहेतुक या काम्यकर्म मोक्षके लिये प्रतिबंधक हैं, अतएव वे नीचे दर्जेके हैं; और गी. र. ४२

६५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥ ९ ॥ अब तो मानना पड़ता है, कि उन्हीं कर्मोंको करना चाहिये; इसलिये अगले श्लोकोंमें इस बातका विस्तृत विवेचन किया गया है, कि इन कर्मोंका शुभाशुभ लेप अथवा बंधकत्व कैसे मिट जाता है और उन्हें करते रहनेपरभी नैष्कर्म्यावस्था क्योंकर प्राप्त होती है ? यह समग्र विवेचन भारतमें वर्णित नारायणीय या भागवत धर्मके अनुसार है ( मभा. शां. ३४० )। ] ( ९ ) यज्ञके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कर्मोंसे यह लोक बँधा हुआ है । तदर्थ अर्थात् यज्ञार्थ ( किये जानेवाले ) कर्म(भी) तू आसक्ति या फलाशा छोड़कर करता जा । [ इस श्लोकके पहले चरणमें मीमांसकोंका और दूसरेमें गीताका सिद्धान्त बतलाया गया है । मीमांसकोंका कथन है, कि जब वेदोंनेही यज्ञायागादि कर्म हरएक मनुष्यके लिये नियत कर दिये हैं, और जब कि ईश्वरनिर्मित सृष्टिके व्यवहार ठीक ठीक चलते रहनेके लिये यह यज्ञ-चक्र आवश्यक है, तब कोईभी इन कर्मोंका त्याग नहीं कर सकता । यदि कोई इनका त्याग कर देगा, तो समझना होगा, कि वह श्रौतधर्मसे वंचित हो गया । परंतु कर्मविपाक-प्रक्रियाका सिद्धान्त है, कि प्रत्येक कर्मका फल मनुष्यको भोगनाही पड़ता है; और उसके अनुसार कहना पड़ता है, कि यज्ञके लिये मनुष्य जो जो कर्म करेगा, उसका भला या बुरा फलभी उसे भोगनाही पड़ेगा । मीमांसकोंका इसपर यह उत्तर है, कि वेदोंकीही आज्ञा है, कि 'यज्ञ' करने चाहिये, इसलिये यज्ञार्थ जो जो कर्म किये जावेंगे, वे सब ईश्वरसंमत होंगे; अतः उन कर्मोंसे कर्ता बद्ध नहीं हो सकता । परंतु यज्ञोंके- सिवा दूसरे कर्मोंके लिये उदाहरणार्थ, केवल अपना पेट भरनेके लिये, मनुष्य जो कुछ कर्म करेगा, वह यज्ञार्थ नहीं हो सकता; उसमें तो केवल मनुष्यकाही निजी लाभ है। यही कारण है, जो मीमांसक उसे 'पुरुषार्थ' कर्म कहते है; और उन्होंने निश्चित किया है, कि ऐसे याने यज्ञार्थके अतिरिक्त अन्य कर्म अर्थात् पुरुषार्थ कर्मका जो कुछ भला या बुरा फल होगा, वह मनुष्यको भोगनाही पड़ता है - यही सिद्धान्त उक्त श्लोककी पहली पंक्तिमें दिया है ( गीतार. प्र. ३, पृ. ५३-५६ )। कुछ टीकाकार, यज्ञ = विष्णु ऐसा गौण अर्थ करके, कहते हैं, कि यज्ञार्थ शब्दका अर्थ विष्णुप्रीत्यर्थ या परमेश्वरार्पण- पूर्वक है । परंतु हमारी समझमें यह अर्थ खींचातानीका और क्लिष्ट है । पर यहाँपर प्रश्न होता है, कि यज्ञके लिये जो कर्म करने पड़ते हैं, उनके सिवा मनुष्य यदि दूसरे कुछभी कर्म न करे, तो क्या वह कर्मबंधनसे छूट सकता है ? क्योंकि

तीसरा अध्याय ६५९ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १०॥ | यज्ञभीतो कर्मही है, और उसका स्वर्गप्राप्तिरूप जो शास्त्रोक्त फल है, वह मिले | बिना नहीं रहता । परंतु गीताके दूसरेही अध्यायमें स्पष्ट रीतिसे बतलाया गया | है, कि यह स्वर्गप्राप्तिरूप फल मोक्षप्राप्तिके विरुद्ध है (गीता २ ४०-४४; | ९.२०, २१)। इसीलिये उक्त श्लोकके दूसरे चरणमें यह बात फिर बतलाई | गई है, कि मनुष्यको यज्ञार्थभी जो नियत कर्म करना होता है, उसेभी वह | फलकी आशा छोडकर अर्थात् केवल कर्तव्य समझकर करे; और इसी अर्थका | प्रतिपादन आगे सात्त्विक यज्ञकी व्याख्या करते समय किया गया है (गीता | १७.११; १८.६) । इस श्लोकका भावार्थ यह है, कि इस प्रकार सब कर्म | यज्ञार्थ और सोभी फलाशा छोडकर करनेसे, (१) वे मीमांसकोंके न्याया- | नुसारही किसीभी प्रकार मनुष्यको बद्ध नहीं करते, क्योंकि वे तो यज्ञार्थ किये | जाते हैं; और (२) उनका स्वर्गप्राप्तिरूप शास्त्रोक्त एवं अनित्य फल मिलनेके | बदले मोक्षप्राप्ति होती है, क्योंकि वे फलाशा छोडकर किये जाते हैं। आगे | १९वें श्लोकमें और फिर चौथे अध्यायके २३ वें श्लोकमें यही अर्थ दुबारा प्रति- | पादित हुआ है। तात्पर्य यह है, कि मीमांसकोंके इस सिद्धान्त "यज्ञार्थ कर्म- | करने चाहिये। क्योंकि वे बंधक नहीं होते" मेंही भगवद्गीताने औरभी यह | सुधार कर दिया है, कि "जो कर्म यज्ञार्थ किये जावें, उन्हेंभी फलाशा छोड़कर | करना चाहिये।" किंतु इसपरभी यह शंका होती है, कि मीमांसकोंके | सिद्धान्तको इस प्रकार सुधारनेका प्रयत्न करके यज्ञयाग आदि गार्हस्थ्यवृत्तिको | जारी रखनेकी अपेक्षा क्या यह अधिक अच्छा नहीं है, कि कर्मोंकी झंझटसे | छूटकर मोक्षप्राप्तिके लिये सब कर्मोंको छोडकर संन्यास ले लें? भगवद्गीता | इस प्रश्नका साफ़ यही उत्तर देती है, कि 'नहीं'। क्योंकि यज्ञ-चक्रके विना इस | जगतके व्यवहार जारी नहीं रह सकते । अधिक क्या कहें? जगतके धारण- | पोषणके लिये ब्रह्माने इस चक्रको प्रथम उत्पन्न किया है; और जब कि जगतकी | सुस्थिति या संग्रहही भगवानको इष्ट है, तब इस यज्ञ-चक्रको कोईभी नहीं छोड़ | सकता । अब यही अर्थ अगले श्लोकमें बतलाया गया है। इस प्रकरणमें | पाठकोंको सदा स्मरण रखना चाहिये, कि यज्ञ शब्द यहाँ केवल श्रौत-यज्ञकेही | अर्थमें प्रयुक्त नहीं है, किंतु उसमें स्मार्त-यज्ञोंका तथा चातुर्वर्ण्य आदिके | यथाधिकार सब व्यावहारिक कर्मोंका समावेश है।] (१०) आरंभमें यज्ञके साथ साथ प्रजाको उत्पन्न करके ब्रह्माने (उनसे) कहा, “इसके (यज्ञ) द्वारा तुम्हारी वृद्धि हो; यह (यज्ञ) तुम्हारी कामधेनु होवे,