श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६४७ यततो ह्यापि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥ तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥ । मान लेना उचित नहीं है। अब आगेके दो श्लोकोंमें यही अर्थ अधिक स्पष्टकर । बतलाते हैं, कि बिना ब्रह्मसाक्षात्कारके पूरा इंद्रियनिग्रह होही नहीं सकता है - ] ( ६० ) कारण यह है, कि केवल ( इंद्रियोंके दमन करनेके लिये ) प्रयत्न करनेवाले विद्वानकेभी मनको, हे कुंतीपुत्र ! ये प्रबल इंद्रियाँ बलात्कारसे मनमानी ओर खींच लेती हैं। ( ६१ ) ( अतएव ) इन सब इंद्रियोंका संयमनकर युक्त अर्थात् योगयुक्त और मत्परायण होकर रहना चाहिये । इस प्रकार जिसकी इंद्रियाँ अपने आधीन हो जायें, ( कहना चाहिये कि ) उसकी बुद्धि स्थिर हो गई । । [ इस श्लोकमें कहा है, कि नियमित आहारसे इंद्रियनिग्रह करके, साथही । साथ ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये मत्परायण होना चाहिये । अर्थात् ईश्वरमें चित्त । लगाना चाहिये; और ५९ वें श्लोकका हमने जो अर्थ किया है, उससे प्रकट । होगा, कि उसका हेतु क्या है ? मनुनेभी निरे इंद्रियनिग्रह करनेवाले पुरुषको । यह इशारा किया है, कि “ बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति' ( मनु. । २. २१५ ); और उसीका अनुवाद ऊपरके ६० वें श्लोकमें किया है। सारांश, । इन तीन श्लोकोंका भावार्थ यह है, कि जिसे स्थितप्रज्ञ होना हो, उसे अपना । आहार-विहार नियमित रखकर ब्रह्मज्ञानही प्राप्त करना चाहिये; और यह । ब्रह्मज्ञान होनेपरही मन निर्विषय होता है, शरीरक्लेशके उपाय तो ऊपरी । हैं - सच्चे नहीं । 'मत्परायण' पदसे यहाँ भक्ति-मार्गकाभी आरंभ हो गया । है (गीता ९. १३४) । ऊपरके श्लोकमें जो 'युक्त' शब्दका अर्थ योगसे तैयार । या बना हुआ है। गीता. ६. १७ के 'युक्त' शब्द है, उसका अर्थ 'नियमित' है । । पर गीताके इस शब्दका सदैवका अर्थ है - " साम्य-बुद्धिका जो योग गीतामें । बतलाया गया है, उसका उपयोग करके तदनुसार समस्त सुखदुःखोको शांति- । पूर्वक सहन कर, व्यवहार करनेमें चतुर पुरुष " ( गीता ५. २३ ) । इस । रीतिसे निष्णात हुए पुरुषकोही 'स्थितप्रज्ञ' यह कहते हैं, उसकी यह अवस्थाही । सिद्धावस्था कहलाती है; और इस अध्यायके तथा पाँचवे एवं बारहवें अध्यायके । अंतमें इसीका वर्णन है। यह बतला दिया, कि विषयोंकी चाह छोड़कर स्थित- । प्रज्ञ होनेके लिये क्या आवश्यक है ? अब अगले श्लोकोंमें यह वर्णन करते हैं कि, । विषयोंमें चाह कैसे उत्पन्न होती है ? इस चाहसे आगे चलकर कामक्रोध आदि