श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥ विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥ कि) उसकी बुद्धि स्थिर हुई । (५८) जिस प्रकार कछुवा अपने (हाथ-पैर आदि) अवयव सब ओरसे सिकोड़ लेता है, उसी प्रकार जब कोई पुरुष इंद्रियोंके (शब्द, स्पर्श आदि) विषयोंसे (अपनी) इंद्रियोंको खींच लेता है, तब (कहना चाहिये कि) उसकी बुद्धि स्थिर हुई । (५९) निराहारी पुरुषके विषय छूट जावें, तोभी (उनका) रस अर्थात् चाह नहीं छूटती । परंतु परब्रह्मका अनुभव होनेपर (सब विषय और उनकी) चाहभी छूट जाती है-अर्थात् विषय और उनकी चाह, दोनों छूट जाते हैं । [ अन्नसे इंद्रियोंका पोषण होता है । अतएव निराहार या उपवास करनेसे इंद्रियाँ अशक्त होकर अपने विषयोंका सेवन करनेमें असमर्थ हो जाती हैं । पर इस रीतिसे विषयोपभोगका छूटना केवल जबर्दस्तीकी, अशक्तताकी बाह्य क्रिया हुई । उससे मनकी विषयवासना (रस) कुछ कम नहीं होता, इसलिये वह वासना जिससे नष्ट हो, उस ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति करनी चाहिये । इस प्रकार ब्रह्मका अनुभव हो जानेपर मन एवं उसके साथही साथ इंद्रियाँभी आप-ही-आप तावेमें रहती है; इंद्रियोंको तावेमें रखनेके लिये निराहार आदि उपाय आवश्यक नहीं हैं; यही इस श्लोकका भावार्थ है । और यही अर्थ आगे छठे अध्यायके इस श्लोकमें स्पष्टतासे वर्णित है (गीता ६. १६, १७; ३. ६, ७), कि योगीका आहार नियमित रहे, आहार-विहार आदिको वह बिलकुलही न छोड़ दे । सारांश, गीताका यह सिद्धान्त ध्यानमें रखना चाहिये, कि शरीरको कृश करनेवाले निराहार आदि साधन एकांगी हैं, अतएव वे त्याज्य हैं, नियमित आहारविहार और ब्रह्म- ज्ञानही इंद्रियनिग्रहका उत्तम साधन है । इस श्लोकमें रस शब्दका "जिह्वासे अनुभव किया जानेवाला मीठा, कडुवा इत्यादि रस" ऐसा अर्थ करके, कुछ लोग यह अर्थ करते हैं, कि उपवासोंसे शेष इंद्रियोंके विषय यदि छूटभी जायँ, तोभी जिह्वाका रस अर्थात् खाने-पीने-की इच्छा कम न होकर बहुत दिनोंके निरा- हारसे वह औरभी अधिक तीव्र हो जाती है; और, भागवतमें ऐसे अर्थका एक श्लोकभी है (भाग. ११. ८. २०) । पर हमारी रायमें गीताके इस श्लोकका ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं । क्योंकि दूसरे चरणसे वह मेल नहीं रखता । इसके अतिरिक्त भागवतमें 'रस' शब्द नहीं, 'रसन' है; और गीताके श्लोकका दूसरा चरणभी वहाँ नहीं है । अतएव भागवत और गीताके श्लोकको एकार्थक