श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते । संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥ रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥ | विकार कैसे उत्पन्न होते हैं ? और अंतमें उससे मनुष्यका नाश कैसे हो जाता | है । एवं इनसे छुटकारा किस प्रकार मिल सकता है ? ] ( ६२ ) विषयोंका चिंतन करनेवाले पुरुषका इन विषयोंमें संग बढ़ता जाता है । फिर इस संगसे यह वासना उत्पन्न होती है, कि हमको काम ( अर्थात् वह विषय ) चाहिये; और ( इस कामकी तृप्ति होनेमें विघ्न आनेसे ) उस कामसेही क्रोधकी उत्पत्ति होती है; ( ६३ ) क्रोधसे संमोह अर्थात् अविवेक होता है, संमोहसे स्मृति-भ्रंश, स्मृति-भ्रंशसे बुद्धि-नाश और बुद्धि-नाशसे ( पुरुषका ) सर्वस्व नाश हो जाता है । ( ६४ ) परंतु अपना आत्मा अर्थात् अंतःकरण जिसके काबूमें है, वह (पुरुष) प्रीति और द्वेषसे छूटी हुई, अपने आधीन इंद्रियोंसे विषयोंमें बर्ताव करकेभी ( चित्तसे ) प्रसन्न रहता है । ( ६५ ) चित्त प्रसन्न रहनेसे उसके सब दुःखोंका नाश होता है । क्योंकि जिसका चित्त प्रसन्न है, उसकी बुद्धिभी तत्काल स्थिर होती है । | [ स्मरण रहे, कि इन दो श्लोकोंमें स्पष्ट वर्णन है, कि विषय या कर्मोंको | न छोड़, स्थितप्रज्ञ केवल उनका संग छोड़कर विषयोंमेंही निःसंग-बुद्धिसे वर्तता | रहता है और उसे जो शांति मिलती है, वह कर्मत्यागसे नहीं; किंतु फलाशाके | त्यागसे प्राप्त होती है । क्योंकि, इसके सिवा अन्य बातोंमें इस स्थितप्रज्ञमें और | संन्यास-मार्गवाले स्थितप्रज्ञमें कोई भेद नहीं है । इंद्रिय-संयमन, निरिच्छा और | शांति ये गुण दोनोंकोभी चाहिये; परंतु इन दोनोंमें महत्त्वका भेद यह है, कि | गीताका स्थितप्रज्ञ कर्मोंका संन्यास नहीं करता, किंतु लोकसंग्रहके निमित्त | समस्त कर्म निष्काम बुद्धिसे किया करता है; और संन्यास-मार्गवाला स्थित- | प्रज्ञ करताही नहीं है ( गीता ३. २५ ) । किंतु गीताके संन्यास-मार्गीय टीका- | कार इस भेदको गौण समझकर, सांप्रदायिक आग्रहसे प्रतिपादन किया करते | हैं, कि स्थितप्रज्ञका उक्त वर्णन संन्यास-मार्गकाही है । इस प्रकार जिसका