श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६४९ नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥ इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥ तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥ या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥ | चित्त प्रसन्न नहीं, उसका वर्णनकर स्थितप्रज्ञके स्वरूपका अब औरभी अधिक | व्यक्त करते हैं - ] ( ६६ ) जो पुरुष उक्त रीतिसे युक्त अर्थात् योगयुक्त नहीं हुआ है उसमें ( स्थिर ) बुद्धि और भावना अर्थात् दृढ़-बुद्धिरूप निष्ठाभी नहीं रहती । जिसे भावना नहीं, उसे शांति नही; और जिसे शांति नहीं, उसे सुख मिलेगा कहाँसे ? ( ६७ ) ( विषयोंमें ) संचार अर्थात् व्यवहार करनेवाली इंद्रियोंके पीछे पीछे मन जो जाने लगता है, वही पुरुषकी बुद्धिको ऐसे हरण किया करता है, जैसे कि पानीमें नौकाको वायु खींचती है। ( ६८ ) अतएव हे महाबाहु अर्जुन ! इंद्रियोंके विषयोंसे जिसकी इंद्रियां चहूँ ओरसे हटी हुई हों, ( कहना चाहिये कि ) उसीकी बुद्धि स्थिर हुई । | [ सारांश, मनके निग्रहके द्वारा इंद्रियोंका निग्रह करना सब साधनोंका | मूल है । विषयोंमें व्यग्र होकर इंद्रियाँ इधर-उधर दौड़ती रहें, तो आत्मज्ञान | प्राप्तकर लेनेकी ( वासनात्मक ) बुद्धिही नहीं हो सकती । अर्थ यह है, कि बुद्धि | न हो, तो उसके विषयमें दृढ़ उद्योगभी नही होता; और फिर शांति एवं | सुखभी नहीं मिलता । गीतारहस्यके चौथे प्रकरणमें दिखलाया है, कि इंद्रिय- | निग्रहका यह अर्थ नहीं है, कि इंद्रियोंको सर्वथा दबाकर सब कर्मोंको बिलकुल | छोड़ दे; किंतु गीताका अभिप्राय यह है, कि ६४ वें श्लोकमें जो वर्णन है, उसके | अनुसार निष्काम बुद्धिमे कर्म करते रहना चाहिये । ] ( ६९ ) सब लोगोंकी जो रात है, उसमें स्थितप्रज्ञ जागता है; और जब समस्त प्राणीमात्र जागते रहते हैं, तब इस ज्ञानवान् पुरुषको रात मालूम होती है । | [ यह विरोधाभासात्मक वर्णन अलंकारिक है । अज्ञान अंधकारको | और ज्ञान प्रकाशको कहते हैं ( गीता १४. ११ ) । अर्थ यह है, कि अज्ञानी