भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 695, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 695

६५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥ § § विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स शान्ति मधिगच्छति ॥ ७१ ॥ लोगोंको जो वस्तु अनावश्यक प्रतीत होती है, (अर्थात् उन्हें जो अंधकार है वही ज्ञानियोंको आवश्यक होती है; और जिसमें अज्ञानी लोग उलझे रहते हैं, उन्हें जहाँ उजेला मालूम होता है - वहीं ज्ञानीको अँधेरा दीख पड़ता है - अर्थात् ज्ञानीको वह अभीष्ट नहीं रहता । उदाहरणार्थ, ज्ञानी पुरुष काम्य-कर्मोंको तुच्छ मानता है, तो सामान्य लोग उन्हींसे लिपटे रहते हैं; और ज्ञानी पुरुषको जो निष्काम कर्म चाहिये, उसकी औरोंको चाह नहीं होती ।] ( ७० ) चारों ओरसे (पानी) भरते जानेपरभी जिसकी मर्यादा नहीं डिगती, ऐसे समुद्रमें जिस प्रकार सब पानी चला जाता है, उसी प्रकार जिस पुरुषमें समस्त विषय (उसकी शांति भंग किये बिनाही) प्रवेश करते हैं, उसेही (सच्ची) शांति मिलती है । विषयोंकी इच्छा करनेवालेको (यह शांति मिलना संभव नहीं है) । [ इस श्लोकका अर्थ यह नहीं है, कि शांति प्राप्त करनेके लिये कर्म न करना चाहिये; प्रत्युत भावार्थ यह है, कि साधारण लोगोंका मन फलाशासे या काम्य-वासनासे घबड़ा जाता है; और उनके कर्मोंसे उनसे मनकी शांति बिगड़ जाती है; परंतु जो सिद्धावस्थामें पहुँच गया है, उसका मन फलाशासे क्षुब्ध नहीं होता, कितनेही कर्म करनेको क्यों न हों, पर उसके मनकी शांति नहीं डिगती । वह समुद्रसरीखा शांत बना रहता है, और सब काम किया करता है, अतएव उसे सुख-दुःखकी व्यथा नहीं होती । (उक्त ६४ वाँ श्लोक और गीता ४. १९) । अब इस विषयका उपसंहार करके बतलाते हैं, कि स्थितप्रज्ञकी इस स्थितिका नाम क्या है ? ] ( ७१ ) जो पुरुष समस्त काम अर्थात् आसक्ति छोड़कर और निःस्पृह हो करके ( व्यवहारमें ) बर्तता है, एवं जिसे ममत्व और अहंकार नहीं होता, उसेही शांति मिलती है ! [ संन्यास-मार्गके टीकाकार इस 'चरति' ( बर्तता है ) पदका "भीख मांगता फिरता है" ऐसा अर्थ करते हैं; परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है । पिछले ६४ वें और ६७ वें श्लोकोंमें 'चरन्' एवं 'चरतां'का जो अर्थ है, वही अर्थ यहाँभी करना चाहिये । गीतामें ऐसा उपदेश कहींभी नहीं है, कि स्थितप्रज्ञ भिक्षा माँगा करे । हाँ; इसके विरुद्ध ६४ वें श्लोकमें यह स्पष्ट कह दिया है, कि स्थित- प्रज्ञ पुरुष इंद्रियोंको अपने अधीन रखकर 'विषयोंमें बर्ते ।' अतएव 'चरति'का