श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ६५१ एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ । ऐसाही अर्थ करना चाहिये, कि “ बर्तता है ” अर्थात् “ जगतके व्यवहार करता । है ”। श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने दासबोधके उत्तरार्धमें इस बातका उत्तम । वर्णन किया है, कि 'निःस्पृह' चतुर पुरुष ( स्थितप्रज्ञ ) व्यवहारमें कैसे बर्तता । है, और गीतारहस्यके चौदहवें प्रकरणका विषयभी वही है । ] ( ७२ ) हे पार्थ ! ब्राह्मी स्थिति यही है । इसे पा जानेपर कोईभी मोहमें नहीं फँसता; और अंतकालमें अर्थात् मरनेके समयमेंभी इस स्थितिमें रहकर वह ब्रह्म- निर्वाण अर्थात् ब्रह्ममें मिल जानेके स्वरूपका मोक्ष पाता है । । [ यह ब्राह्मी स्थिति कर्मयोगकी अंतिम और अत्युत्तम स्थिति है ( गीतार. । प्र. ९, पृ. २३१; २५१ ); और इसमें विशेषता यह है; कि इसके प्राप्त । हो जानेसे फिर मोह नहीं होता । यहाँपर इस विशेषत्वके बतलानेका कारण । यह कि, यदि किसीको किसी दिन दैवयोगसे घड़ी-दो घड़ीके लिये इस ब्राह्मी । स्थितिका अनुभव हो सके, तो उससे चिरकालिक लाभ नहीं होता । क्योंकि । किसीभी मनुष्यकी यदि मरते समय यह स्थिति न रहेगी, तो मरणकालमें । जैसी वासना मनमें रहेगी, उसीके अनुसार आगे पुनर्जन्म होगा ( गीतारहस्य । पृ. २९१ ) । यही कारण है, जो ब्राह्मी स्थितिका वर्णन करते हुए इस श्लोकमें । स्पष्टतया कह दिया है, कि 'अंतकालेऽपि' = अंतकालमेंभी, स्थितप्रज्ञकी यह । अवस्था स्थिर बनी रहती है । अंतकालमें मनके शुद्ध रहनेकी विशेष आवश्य- । कताका वर्णन उपनिषदोंमें ( छां. ३. १४. १; प्र. ३. १० ) और गीतामेंभी । ( गीता ८. ५-१० ) है । यह वासनात्मक कर्म अगले अनेक जन्मोंके मिलनेका । कारण है, इसलिये प्रकटही है, कि कम-से-कम मरनेके समय तो वासना शून्य । हो जानी चाहिये । और फिर यहभी कहना पड़ता है, कि मरण समयमें । वासना शून्य होनेके लिये पहलेही वैसा अभ्यास हो जाना चाहिये । क्योंकि, । वासनाको शून्य करनेका कर्म अत्यंत कठिन है, और विना ईश्वरकी विशेष । कृपाके उसका सहसा किसीकोभी प्राप्त हो जाना न केवल कठिन है, वरन् । असंभवभी है, यह तत्त्व केवल वैदिक धर्ममेंही नहीं है, कि मरण-समयमें वासना । शुद्ध होनी चाहिये; किंतु अन्यान्य धर्मोंमेंभी यह तत्त्व अंगीकृत हुआ है । । ( गीतारहस्य प्र. १३, पृ. ४४१ ) ]