श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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६५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए उपनिषदमें, ब्रह्मविद्या- न्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय समाप्त हुआ। [ इस अध्यायमें, आरंभमें सांख्य अथवा संन्यास-मार्गका विवेचन है, इस कारण इसको सांख्ययोग नाम दिया गया है। परंतु इससे यह न समझ लेना चाहिये, कि पूरे अध्यायमें वही विषय है। एकही अध्यायमें प्रायः अनेक विषयोंका वर्णन होता है। जिस अध्यायमें जो विषय आरंभमें आ गया है, अथवा जो विषय उसमें प्रमुख है, उसके अनुसार उस अध्यायका नाम रख दिया जाता है। (गीतारहस्य प्रकरण १४, पृ. ४४६.)]