श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 698, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ६५३ तृतीयोऽध्यायः । अर्जुन उवाच । ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥ श्रीभगवानुवाच । § § लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥ तीसरा अध्याय [ अर्जुनको भय हो गया था, कि मुझे भीष्म-द्रोण आदिको मारना पड़ेगा । अतः सांख्य-मार्गके अनुसार आत्माकी नित्यता और अशोच्यत्वसे यह सिद्ध करके कि अर्जुनका भय वृथा है; फिर स्वधर्मका थोड़ा-सा विवेचन करके गीताके मुख्य विषय कर्मयोगका दूसरेही अध्यायमें आरंभ किया गया है; और कहा गया है, कर्म करनेपरभी उनके पाप-पुण्यसे बचनेके लिये केवल वही एक युक्ति या योग है, कि वे कर्म साम्य-बुद्धिसे किये जावें । इसके अनंतर अंतमें उस कर्मयोगी स्थितप्रज्ञका वर्णनभी किया गया है, कि जिसकी बुद्धि इस प्रकार सम हो गई है । परंतु इतनेसेही कर्मयोगका विवेचन पूरा नहीं हो जाता । यह बात सच है, कि कोईभी काम सम-बुद्धिसे किया जावे, तो उसका पाप नही लगता; परंतु जब कर्मकी अपेक्षा समबुद्धिकीही श्रेष्ठता विवाडरहित सिद्ध होती है ( गीता २. ४९ ), तब फिर स्थितप्रज्ञकी नाईं बुद्धिको सम कर लेनेसेही काम चल जाता है; इससे यह सिद्ध नहीं होता, कि कर्म करनेही चाहिये । अतएव जब अर्जुनने यही शंका प्रश्नरूपमें उपस्थित की, तब भगवान् इस अध्यायमें तथा अगले अध्यायमें प्रतिपादन करते हैं, कि “ कर्म करनेही चाहिये । ” ] अर्जुनने कहा :- ( १ ) हे जनार्दन ! यदि तुम्हारा यही मत है, कि कर्मकी अपेक्षा (साम्य-)बुद्धिही श्रेष्ठ है, तो हे केशव ! मुझे ( युद्धके ) घोर कर्ममें क्यों लगाते हो ? ( २ ) देखनेमें व्यामिश्र अर्थात् संदिग्ध भाषण करके तुम मेरी बुद्धिको भ्रममें डाल रहे हो ! इसलिये तुम ऐसी एकही बात निश्चित करके मुझे बतलाओ, जिससे मुझे श्रेय अर्थात् कल्याण प्राप्त हो । श्रीभगवानने कहा :- ( ३ ) हे निष्पाप अर्जुन ! ( अर्थात् दूसरे अध्यायमें )