भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 699

६५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥ न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥ मैंने यह बतलाया है, कि इस लोकमें दो प्रकारकी निष्ठाएँ हैं – अर्थात् ज्ञानयोगसे सांख्योंकी और कर्मयोगसे योगियोंकी । | [ हमने 'पुरा' शब्दका अर्थ, 'पहले' अर्थात् 'दूसरे अध्यायमें' किया है, | यही अर्थ सरल है। क्योंकि दूसरे अध्यायमें पहले सांख्य-निष्ठाके अनुसार ज्ञानका | वर्णन करके फिर कर्मयोग-निष्ठाका आरंभ किया गया है। परंतु 'पुरा' शब्दका | अर्थ 'सृष्टिके आरंभमें' भी हो सकता है; क्योंकि महाभारतमें, नारायणीय या | भागवत-धर्मके निरूपणमें यह वर्णन है, कि सांख्य और योग (निवृत्ति और | प्रवृत्ति) इन दोनों प्रकारकी निष्ठाओंको भगवान्ने स्वतंत्र रूपसे जगत्के | आरंभमेंही उत्पन्न किया है (शां. ३४०; ३४३) । 'निष्ठा' शब्दके पहले मोक्ष | शब्द अध्याहृत है । ? 'निष्ठा' शब्दका अर्थ वह मार्ग है, कि जिसपर चलनेपर | अंतमें मोक्ष मिलता है। गीताके अनुसार ऐसी निष्ठाएँ दोही हैं; और वे | दोनोंभी स्वतंत्र हैं, कोई किसीका अंग नहीं है - इत्यादि बातोंका विस्तृत विवेचन | गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (पृ. ३०६-३१७) में किया गया है, इसलिये | उसे यहाँ दुहरानेकी आवश्यकता नहीं है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरणके | अंतमें (पृष्ठ ३५४-३५७) नक्शा देकर इस बातकाभी वर्णन कर दिया गया | है, इन दोनों निष्ठाओंमें भेद क्या है। मोक्षकी दो निष्ठाएँ बतला दी गईं; अब | तदंगभूत नैष्कर्म्य-सिद्धिका स्वरूप स्पष्ट करके बतलाते हैं :- ] (४) (परंतु) कर्मोंका प्रारंभ न करनेसेही पुरुषको नैष्कर्म्य-प्राप्ति नहीं हो जाती; और कर्मोंका (त्याग) करनेसेही सिद्धि नहीं मिल जाती। (५) क्योंकि कोईभी मनुष्य (कुछ-न-कुछ) कर्म किये बिना क्षणभरभी नहीं रह सकता। प्रकृतिके गुण प्रत्येक परतंत्र मनुष्यको (तो सदा कुछ-न-कुछ) कर्म करनेमें लगायाही करते हैं। | [ चौथे श्लोकके पहले चरणमें जो 'नैष्कर्म्य' पद है, उसका 'ज्ञान' अर्थ | मानकर संन्यास-मार्गवाले टीकाकारोंने इस श्लोकका अर्थ अपने संप्रदायके | अनुकूल इस प्रकार बना लिया है – "कर्मोंका आरंभ न करनेसे ज्ञान नहीं | होता, अर्थात् कर्मोंसेही ज्ञान होता है" क्योंकि कर्म ज्ञानप्राप्तिका साधन है ! | परंतु यह अर्थ न तो सरल है और न ठीकभी है। नैष्कर्म्य शब्दका उपयोग वेदान्त | और मीमांसा, इन दोनों शास्त्रोंमें कई बार किया गया है; और सुरेश्वरा-