भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 700

तीसरा अध्याय ६५५ | चार्यका 'नैष्कर्म्य-सिद्धि' नामक इसी विषयपर एक ग्रंथभी है। तथापि नैष्कर्म्यके | ये तत्त्व कुछ नये नहीं हैं; और न केवल सुरेश्वराचार्यहीके, किंतु मीमांसा और | वेदान्तके सूत्र बननेकेभी पूर्वसेही इनका प्रचार होता आ रहा है। यह बतलानेकी | कोई आवश्यकता नहीं, कि कर्म बंधक होताही है; इसलिये पारेका उपयोग | करनेके पहले जिस प्रकार वैद्य लोग उसे मारकर शुद्ध कर लेते हैं, उसी प्रकार | कर्म करनेके पहले ऐसा उपाय करना पड़ता है, कि जिससे उसका बंधकत्व या | दोष मिट जाय; और ऐसी युक्तिसे कर्म करनेकी स्थितिकोही 'नैष्कर्म्य' कहते | हैं। इस प्रकार बंधकत्वरहित कर्म मोक्षके लिये बाधक नहीं होता, अतएव | मोक्षशास्त्रका यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, कि यह स्थिति कैसे प्राप्त की जाय ? | मीमांसक लोग इसका यह उत्तर देते हैं, कि नित्य और निमित्त होनेपर, नैमि- | त्तिक कर्म तो करना चाहिये; पर काम्य और निषिद्ध कर्म नहीं करने चाहिये, | इससे कर्मका बंधकत्व नही रहता; और नैष्कर्म्यावस्था सुलभ रीतिसे प्राप्त हो | जाती है। परंतु वेदान्तशास्त्रने सिद्धान्त किया है, कि मीमांसकोंकी यह युक्ति | ग़लत है; और इस बातका विवेचन गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृष्ठ | २७६) किया गया है। अन्य कुछ लोगोंका कथन है, कि यदि कर्मही किये | न जावें, तो उनसे बाधाभी तो कैसे हो सकती है ? इसलिये, उनके मतानुसार, | नैष्कर्म्य अवस्था प्राप्त करनेके लिये सब कर्मोंहीको छोड़ देना चाहिये । इनके | मतसे कर्मशून्यताकोही 'नैष्कर्म्य' कहते हैं। परंतु चौथे श्लोकमें बतलाया गया | है, कि यह मत ठीक नहीं है, इससे तो सिद्धि अर्थात् मोक्षभी नहीं मिलता; और | पाँचवें श्लोकमें उसका कारणभी बतला दिया है। यदि हम कर्मको छोड़ देनेका | विचार करें, तोभी जबतक यह देह है, तबतक सोना, बैठना इत्यादि कर्म कभी | रुकही नहीं सकते (गीता ५.९; १८.११) । इसलिये कोईभी मनुष्य कभी | कर्मशून्य नहीं हो सकता। फलतः कर्मशून्यरूपी नैष्कर्म्यभी असंभव है। | सारांश, कर्मरूपी बिच्छू कभी नहीं मरता। इसलिये ऐसा कोई उपाय सोचना | चाहिये, कि जिससे वह विषरहित हो जाय । गीताका सिद्धान्त है, कि कर्मोंमेंसे | अपनी आसक्तिको हटा लेनाही एकमात्र उपाय है; और आगे अनेक स्थानोंमें | इसी उपायका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। परंतु इसपरभी शंका हो | सकती है, कि यद्यपि सब कर्मोंको छोड़ देना नैष्कर्म्य नहीं है, तथापि संन्यास- | मार्गवाले तो सब कर्मोंका संन्यास अर्थात् त्याग करकेही मोक्ष प्राप्त करते हैं, | अतः मोक्षकी प्राप्तिके लिये कर्मोंका त्याग करना आवश्यक है। इस तर्कका | उत्तर गीता इस प्रकार देती है, कि संन्यास-मार्गवालोंको मोक्ष तो मिलता है | सही; परंतु उन्हें वह कर्मोंका त्याग करनेसे नहीं मिलता, किंतु मोक्षसिद्धि | उनके ज्ञानका फल है। यदि केवल कर्मोंका त्याग करनेसेही मोक्षसिद्धि होती | हो, तो फिर पत्थरकोभी मुक्ति मिलनी चाहिये ! इससे ये तीन बातें सिद्ध