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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

तीसरा अध्याय ६५५ | चार्यका 'नैष्कर्म्य-सिद्धि' नामक इसी विषयपर एक ग्रंथभी है। तथापि नैष्कर्म्यके | ये तत्त्व कुछ नये नहीं हैं; और न केवल सुरेश्वराचार्यहीके, किंतु मीमांसा और | वेदान्तके सूत्र बननेकेभी पूर्वसेही इनका प्रचार होता आ रहा है। यह बतलानेकी | कोई आवश्यकता नहीं, कि कर्म बंधक होताही है; इसलिये पारेका उपयोग | करनेके पहले जिस प्रकार वैद्य लोग उसे मारकर शुद्ध कर लेते हैं, उसी प्रकार | कर्म करनेके पहले ऐसा उपाय करना पड़ता है, कि जिससे उसका बंधकत्व या | दोष मिट जाय; और ऐसी युक्तिसे कर्म करनेकी स्थितिकोही 'नैष्कर्म्य' कहते | हैं। इस प्रकार बंधकत्वरहित कर्म मोक्षके लिये बाधक नहीं होता, अतएव | मोक्षशास्त्रका यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, कि यह स्थिति कैसे प्राप्त की जाय ? | मीमांसक लोग इसका यह उत्तर देते हैं, कि नित्य और निमित्त होनेपर, नैमि- | त्तिक कर्म तो करना चाहिये; पर काम्य और निषिद्ध कर्म नहीं करने चाहिये, | इससे कर्मका बंधकत्व नही रहता; और नैष्कर्म्यावस्था सुलभ रीतिसे प्राप्त हो | जाती है। परंतु वेदान्तशास्त्रने सिद्धान्त किया है, कि मीमांसकोंकी यह युक्ति | ग़लत है; और इस बातका विवेचन गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृष्ठ | २७६) किया गया है। अन्य कुछ लोगोंका कथन है, कि यदि कर्मही किये | न जावें, तो उनसे बाधाभी तो कैसे हो सकती है ? इसलिये, उनके मतानुसार, | नैष्कर्म्य अवस्था प्राप्त करनेके लिये सब कर्मोंहीको छोड़ देना चाहिये । इनके | मतसे कर्मशून्यताकोही 'नैष्कर्म्य' कहते हैं। परंतु चौथे श्लोकमें बतलाया गया | है, कि यह मत ठीक नहीं है, इससे तो सिद्धि अर्थात् मोक्षभी नहीं मिलता; और | पाँचवें श्लोकमें उसका कारणभी बतला दिया है। यदि हम कर्मको छोड़ देनेका | विचार करें, तोभी जबतक यह देह है, तबतक सोना, बैठना इत्यादि कर्म कभी | रुकही नहीं सकते (गीता ५.९; १८.११) । इसलिये कोईभी मनुष्य कभी | कर्मशून्य नहीं हो सकता। फलतः कर्मशून्यरूपी नैष्कर्म्यभी असंभव है। | सारांश, कर्मरूपी बिच्छू कभी नहीं मरता। इसलिये ऐसा कोई उपाय सोचना | चाहिये, कि जिससे वह विषरहित हो जाय । गीताका सिद्धान्त है, कि कर्मोंमेंसे | अपनी आसक्तिको हटा लेनाही एकमात्र उपाय है; और आगे अनेक स्थानोंमें | इसी उपायका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। परंतु इसपरभी शंका हो | सकती है, कि यद्यपि सब कर्मोंको छोड़ देना नैष्कर्म्य नहीं है, तथापि संन्यास- | मार्गवाले तो सब कर्मोंका संन्यास अर्थात् त्याग करकेही मोक्ष प्राप्त करते हैं, | अतः मोक्षकी प्राप्तिके लिये कर्मोंका त्याग करना आवश्यक है। इस तर्कका | उत्तर गीता इस प्रकार देती है, कि संन्यास-मार्गवालोंको मोक्ष तो मिलता है | सही; परंतु उन्हें वह कर्मोंका त्याग करनेसे नहीं मिलता, किंतु मोक्षसिद्धि | उनके ज्ञानका फल है। यदि केवल कर्मोंका त्याग करनेसेही मोक्षसिद्धि होती | हो, तो फिर पत्थरकोभी मुक्ति मिलनी चाहिये ! इससे ये तीन बातें सिद्ध

प्रकरण १३-१५: गीता-समन्वय व शाङ्कर-रामानुज भाष्य तुलना

६५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥ यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥ | होती हैं :- ( १ ) नैष्कर्म्य कर्मशून्यता नहीं है, ( २ ) कर्मोंको त्याग देनेका | कोई कितनाभी प्रयत्न क्यों न करे, परंतु वे छूट नहीं सकते; और ( ३ ) | कर्मोंको त्याग देना सिद्धि प्राप्त करनेका उपाय नहीं है; और यही बातें | ऊपरके श्लोकोंमें बतलाई गई हैं। जब ये तीनों बातें सिद्ध हो गई, तब अठारहवें | अध्यायके कथनानुसार 'नैष्कर्म्यसिद्धि'की ( गीता १८. ४८, ४९ ) प्राप्तिके लिये | यही एक मार्ग शेष रह जाता है, कि कर्म तो छोड़े नहीं; पर ज्ञान-द्वारा | यद्यपि आसक्तिका क्षय करके सब कर्म सदा करते रहें । क्योंकि ज्ञान मोक्षका | साधन हो, तोभी कर्मशून्य रहनाभी कभी संभव नहीं, इसलिये कर्मोंके | बंधकत्वको ( बंधन ) नष्ट करनेके लिये आसक्ति छोड़कर उन्हें करना | आवश्यक होता है। इसीको कर्मयोग कहते हैं; और अब बतलाते हैं, कि | यही ज्ञानकर्म-समुच्चयात्मक मार्ग विशेष योग्यताका अर्थात् श्रेष्ठ है - ] ( ६ ) जो मूढ ( हाथ-पैर आदि ) कर्मेन्द्रियोंको रोककर मनसे इंद्रियोंके विषयोंका चिंतन किया करता है, उसे मिथ्याचारी अर्थात् दांभिक कहते हैं। ( ७ ) परंतु हे अर्जुन ! जो मनसे इंद्रियोंका आंकलन करके, ( केवल ) कर्मेन्द्रियों-द्वारा अनासक्त- बुद्धिसे 'कर्मयोग'का आरंभ करता है, उसकी योग्यता विशेष अर्थात् श्रेष्ठ है । | [ पिछले अध्यायमें जो यह बतलाया गया है, कि कर्मयोगमें कर्मकी | अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है ( गीता २. ४९ ), उसीका इन दोनों श्लोकोंमें स्पष्टी- | करण किया गया है । यहाँ साफ़ साफ़ कह दिया है, कि जिस मनुष्यका मन | तो शुद्ध नहीं है; पर जो केवल दूसरोंके भयसे या इस अभिलाषासे कि दूसरे | मुझे भला कहें, केवल बाह्येंद्रियोंके व्यापारको रोकता है, वह सच्चा सदाचारी | नहीं है, वह ढोंगी है। जो लोग इस वचनका प्रमाण देकर - कि “ कलौ कर्ता च | लिप्यते ” कलियुगमें दोष बुद्धिमें नहीं, किंतु कर्ममें रहता है, यह प्रतिपादन | किया करते हैं, कि बुद्धि चाहे जैसी हो; परंतु कर्म बुरा न हो; उन्हें उक्त | श्लोकमें वर्णित गीतातत्त्वपर विशेष ध्यान देना चाहिये । सातवें श्लोकसे यह | बात प्रकट होती है, कि निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेके योगकोही गीतामें 'कर्मयोग' | कहा है । कुछ संन्यास-मार्गीय टीकाकार इस श्लोकका ऐसा अर्थ करते हैं, कि | यद्यपि यह कर्मयोग छठे श्लोकमें बतलाये हुए दांभिक मार्गसे श्रेष्ठ है, तथापि | यह संन्यास-मार्गसे श्रेष्ठ नहीं है । परंतु यह युक्ति सांप्रदायिक आग्रहकी है ।

तीसरा अध्याय ६५७ नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥ [ क्योंकि न केवल इसी श्लोकमें, वरन् फिर पाँचवें अध्यायके आरंभमें और अन्यत्रभी, यह स्पष्ट कह दिया गया है, कि संन्यास-मार्गसेभी कर्मयोग अधिक योग्यताका या श्रेष्ठ है (गीतार. प्र. ११, पृ. ३०९-३१०) । इस प्रकार जब कर्मयोगही श्रेष्ठ है, तब अर्जुनको उसी मार्गका आचरण करनेके लिये अब उपदेश करते हैं :- ] (८) (अपने धर्मके अनुसार) नियत अर्थात् नियमित कर्म तू कर । क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना कहीं अधिक अच्छा है। इसके अतिरिक्त (यह समझ ले, कि यदि) तू कर्म न करेगा, तो (भोजनभी न मिलनेसे) तेरा शरीर- निर्वाहतक न हो सकेगा। [ 'अतिरिक्त' और 'तक' (अपि च) पदोंसे शरीरयात्राको कम-से-कम हेतु कहा है। अब यह बतलानेके लिये यज्ञ-प्रकरणका आरंभ किया जाता है, कि 'नियत' अर्थात् नियत किया हुआ 'कर्म' कौन-सा है? और दूसरे किस महत्त्वके कारण उसका आचरण करना चाहिये? आजकल यज्ञयाग आदि श्रौतधर्म लुप्त-सा हो गया है, इसलिये इस विषयका आधुनिक पाठकोंको कोई विशेष महत्व मालूम नहीं होता। परंतु गीताके समयमें इन यज्ञयागोंका पूरा पूरा प्रचार था; और 'कर्म' शब्दसे मुख्यतः इन्हींका बोध हुआ करता था। अतएव, गीताधर्ममें इस बातका विवेचन करना अत्यावश्यक था, कि ये धर्मकृत्य किये जावें या नहीं; और यदि किये जावें, तो किस प्रकार? इसके सिवा, यहभी स्मरण रहे, कि यज्ञ शब्दका अर्थ केवल ज्योतिष्टोम आदि श्रौतयज्ञ या अग्निमें किसीभी वस्तुका हवन करनाही नहीं है (गीता. ४. ३२) । सृष्टिका निर्माण करके, उसका काम ठीक ठीक चलते रहनेके लिये, अर्थात् लोकसंग्रहार्थ, ब्रह्माने प्रजाको चातुर्वर्ण्यविहित जो जो काम बाँट दिये हैं, उन सबका 'यज्ञ' शब्दमें समावेश होता है (मभा. अनु. ४८. ३; गीतार. प्र. १०, पृ. २९१- २९७) । धर्मशास्त्रोंमें इन्हीं कर्मोंका उल्लेख है; और यहाँ 'नियत' शब्दसे वेही विवक्षित हैं। इसलिये कहना चाहिये, कि यद्यपि आजकल श्रौत यज्ञ-याग लुप्तप्राय हो गये हैं; तथापि यज्ञ-चक्रका यह विवेचन अबभी निरर्थक नही है। शास्त्रोंके अनुसार ये सब कर्म काम्य हैं, अर्थात् इसलिये बतलाये गये हैं, कि मनुष्यका इस जगत्में कल्याण हो और उसे सुख मिले। परंतु पीछे दूसरे अध्याय (गीता २. ४१-४४) में यह सिद्धान्त किया है, कि मीमांसकोंके ये सहेतुक या काम्यकर्म मोक्षके लिये प्रतिबंधक हैं, अतएव वे नीचे दर्जेके हैं; और गी. र. ४२

६५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥ ९ ॥ अब तो मानना पड़ता है, कि उन्हीं कर्मोंको करना चाहिये; इसलिये अगले श्लोकोंमें इस बातका विस्तृत विवेचन किया गया है, कि इन कर्मोंका शुभाशुभ लेप अथवा बंधकत्व कैसे मिट जाता है और उन्हें करते रहनेपरभी नैष्कर्म्यावस्था क्योंकर प्राप्त होती है ? यह समग्र विवेचन भारतमें वर्णित नारायणीय या भागवत धर्मके अनुसार है ( मभा. शां. ३४० )। ] ( ९ ) यज्ञके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कर्मोंसे यह लोक बँधा हुआ है । तदर्थ अर्थात् यज्ञार्थ ( किये जानेवाले ) कर्म(भी) तू आसक्ति या फलाशा छोड़कर करता जा । [ इस श्लोकके पहले चरणमें मीमांसकोंका और दूसरेमें गीताका सिद्धान्त बतलाया गया है । मीमांसकोंका कथन है, कि जब वेदोंनेही यज्ञायागादि कर्म हरएक मनुष्यके लिये नियत कर दिये हैं, और जब कि ईश्वरनिर्मित सृष्टिके व्यवहार ठीक ठीक चलते रहनेके लिये यह यज्ञ-चक्र आवश्यक है, तब कोईभी इन कर्मोंका त्याग नहीं कर सकता । यदि कोई इनका त्याग कर देगा, तो समझना होगा, कि वह श्रौतधर्मसे वंचित हो गया । परंतु कर्मविपाक-प्रक्रियाका सिद्धान्त है, कि प्रत्येक कर्मका फल मनुष्यको भोगनाही पड़ता है; और उसके अनुसार कहना पड़ता है, कि यज्ञके लिये मनुष्य जो जो कर्म करेगा, उसका भला या बुरा फलभी उसे भोगनाही पड़ेगा । मीमांसकोंका इसपर यह उत्तर है, कि वेदोंकीही आज्ञा है, कि 'यज्ञ' करने चाहिये, इसलिये यज्ञार्थ जो जो कर्म किये जावेंगे, वे सब ईश्वरसंमत होंगे; अतः उन कर्मोंसे कर्ता बद्ध नहीं हो सकता । परंतु यज्ञोंके- सिवा दूसरे कर्मोंके लिये उदाहरणार्थ, केवल अपना पेट भरनेके लिये, मनुष्य जो कुछ कर्म करेगा, वह यज्ञार्थ नहीं हो सकता; उसमें तो केवल मनुष्यकाही निजी लाभ है। यही कारण है, जो मीमांसक उसे 'पुरुषार्थ' कर्म कहते है; और उन्होंने निश्चित किया है, कि ऐसे याने यज्ञार्थके अतिरिक्त अन्य कर्म अर्थात् पुरुषार्थ कर्मका जो कुछ भला या बुरा फल होगा, वह मनुष्यको भोगनाही पड़ता है - यही सिद्धान्त उक्त श्लोककी पहली पंक्तिमें दिया है ( गीतार. प्र. ३, पृ. ५३-५६ )। कुछ टीकाकार, यज्ञ = विष्णु ऐसा गौण अर्थ करके, कहते हैं, कि यज्ञार्थ शब्दका अर्थ विष्णुप्रीत्यर्थ या परमेश्वरार्पण- पूर्वक है । परंतु हमारी समझमें यह अर्थ खींचातानीका और क्लिष्ट है । पर यहाँपर प्रश्न होता है, कि यज्ञके लिये जो कर्म करने पड़ते हैं, उनके सिवा मनुष्य यदि दूसरे कुछभी कर्म न करे, तो क्या वह कर्मबंधनसे छूट सकता है ? क्योंकि

तीसरा अध्याय ६५९ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १०॥ | यज्ञभीतो कर्मही है, और उसका स्वर्गप्राप्तिरूप जो शास्त्रोक्त फल है, वह मिले | बिना नहीं रहता । परंतु गीताके दूसरेही अध्यायमें स्पष्ट रीतिसे बतलाया गया | है, कि यह स्वर्गप्राप्तिरूप फल मोक्षप्राप्तिके विरुद्ध है (गीता २ ४०-४४; | ९.२०, २१)। इसीलिये उक्त श्लोकके दूसरे चरणमें यह बात फिर बतलाई | गई है, कि मनुष्यको यज्ञार्थभी जो नियत कर्म करना होता है, उसेभी वह | फलकी आशा छोडकर अर्थात् केवल कर्तव्य समझकर करे; और इसी अर्थका | प्रतिपादन आगे सात्त्विक यज्ञकी व्याख्या करते समय किया गया है (गीता | १७.११; १८.६) । इस श्लोकका भावार्थ यह है, कि इस प्रकार सब कर्म | यज्ञार्थ और सोभी फलाशा छोडकर करनेसे, (१) वे मीमांसकोंके न्याया- | नुसारही किसीभी प्रकार मनुष्यको बद्ध नहीं करते, क्योंकि वे तो यज्ञार्थ किये | जाते हैं; और (२) उनका स्वर्गप्राप्तिरूप शास्त्रोक्त एवं अनित्य फल मिलनेके | बदले मोक्षप्राप्ति होती है, क्योंकि वे फलाशा छोडकर किये जाते हैं। आगे | १९वें श्लोकमें और फिर चौथे अध्यायके २३ वें श्लोकमें यही अर्थ दुबारा प्रति- | पादित हुआ है। तात्पर्य यह है, कि मीमांसकोंके इस सिद्धान्त "यज्ञार्थ कर्म- | करने चाहिये। क्योंकि वे बंधक नहीं होते" मेंही भगवद्गीताने औरभी यह | सुधार कर दिया है, कि "जो कर्म यज्ञार्थ किये जावें, उन्हेंभी फलाशा छोड़कर | करना चाहिये।" किंतु इसपरभी यह शंका होती है, कि मीमांसकोंके | सिद्धान्तको इस प्रकार सुधारनेका प्रयत्न करके यज्ञयाग आदि गार्हस्थ्यवृत्तिको | जारी रखनेकी अपेक्षा क्या यह अधिक अच्छा नहीं है, कि कर्मोंकी झंझटसे | छूटकर मोक्षप्राप्तिके लिये सब कर्मोंको छोडकर संन्यास ले लें? भगवद्गीता | इस प्रश्नका साफ़ यही उत्तर देती है, कि 'नहीं'। क्योंकि यज्ञ-चक्रके विना इस | जगतके व्यवहार जारी नहीं रह सकते । अधिक क्या कहें? जगतके धारण- | पोषणके लिये ब्रह्माने इस चक्रको प्रथम उत्पन्न किया है; और जब कि जगतकी | सुस्थिति या संग्रहही भगवानको इष्ट है, तब इस यज्ञ-चक्रको कोईभी नहीं छोड़ | सकता । अब यही अर्थ अगले श्लोकमें बतलाया गया है। इस प्रकरणमें | पाठकोंको सदा स्मरण रखना चाहिये, कि यज्ञ शब्द यहाँ केवल श्रौत-यज्ञकेही | अर्थमें प्रयुक्त नहीं है, किंतु उसमें स्मार्त-यज्ञोंका तथा चातुर्वर्ण्य आदिके | यथाधिकार सब व्यावहारिक कर्मोंका समावेश है।] (१०) आरंभमें यज्ञके साथ साथ प्रजाको उत्पन्न करके ब्रह्माने (उनसे) कहा, “इसके (यज्ञ) द्वारा तुम्हारी वृद्धि हो; यह (यज्ञ) तुम्हारी कामधेनु होवे,

६६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥ अर्थात् यह तुम्हारे इच्छित फलोंको देनेवाला होवे । (११) तुम इस यज्ञसे देवताओंको समृद्ध करते रहो, (और) वे देवता तुम्हे यज्ञसे समृद्ध करते रहें। (इसप्रकार) परस्पर एक दूसरेको समृद्ध करते हुए (दोनोंभी) परम श्रेय अर्थात् कल्याण प्राप्तकर लो !" (१२) क्योंकि, यज्ञसे संतुष्ट होकर देवता लोग तुम्हारे इच्छित (सब) भोग तुम्हें देंगे। उन्हींका दिया हुआ उन्हें (वापिस) न देकर, जो (केवल स्वयं) उपभोग करता है, वह सचमुच चोर है। । [ जब ब्रह्माने इस सृष्टि अर्थात् देव आदि सब लोकोंको उत्पन्न किया, । तब उसे चिंता हुई, कि उन लोगोंका आगे धारण-पोषण कैसे होगा ? महाभारतके । नारायणीय धर्ममें वर्णन है, कि ब्रह्माने इसके बाद हजार वर्षतक तप करके । भगवान्को संतुष्ट किया; तब भगवान्ने सब लोकोंके निर्वाहके लिये प्रवृत्ति- । प्रधान यज्ञचक्र उत्पन्न किया, और देवता तथा मनुष्य, दोनोंसे कहा, कि उसके । अनुसार बर्ताव करके एक दूसरेकी रक्षा करो। उक्त श्लोकमें इसी कथाका । कुछ शब्दभेदसे अनुवाद किया गया है (मभा. शां. ३४०. ३८-७२)। इससे । यह सिद्धान्त औरभी अधिक दृढ़ हो जाता है, कि प्रवृत्ति-प्रधान भागवत धर्मके । तत्त्वोंकाही गीतामें प्रतिपादन किया गया है। परंतु भागवत धर्ममें यज्ञोंमें की । जानेवाली हिंसा गर्ह्य मानी गई है (मभा. शां. ३३६, ३३७), इसलिये पशु- । यज्ञके स्थानमे प्रथम द्रव्यमय यज्ञ शुरू हुआ, और अंतमें यह मत प्रचलित हो गया, । कि जपमय यज्ञ अथवा ज्ञानमय यज्ञही सबमें श्रेष्ठ है (गीता ४. २३-३३)। । यज्ञ शब्दसे मतलब चातुर्वर्ण्यके सब कर्मोंसे है; और यह बात स्पष्ट है, कि । समाजका उचित रीतिसे धारण-पोषण होनेके लिये इन यज्ञकर्मों या यज्ञचक्रको । अच्छी तरह जारी रखना चाहिये (मनु. १. ८७)। अधिक क्या कहें ? यह । यज्ञचक्र आगे बीसवें श्लोकमें वर्णित लोकसंग्रहकाही एक स्वरूप है (गीतार. । प्र. ११)। इसीलिये स्मृतियोंमेंभी लिखा है, कि देवलोक और मनुष्यलोक, । इन दोनोंके संग्रहार्थ भगवान्नेही प्रथम जिस लोकसंग्रहकारक कर्मको निर्माण । किया है, उसे आगे अच्छी तरह प्रचलित रखना मनुष्यका कर्तव्य है, और यही । अर्थ अब अगले श्लोकमें स्पष्ट रीतिसे बतलाया गया है :- ]

तीसरा अध्याय ६६१ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥ अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥ (१३) यज्ञ करके शेष बचे हुए भागको ग्रहण करनेवाले सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परंतु (यज्ञ न करके केवल) अपनेही लिये जो (अन्न) पकाते हैं, वे पापी लोग पाप भक्षण करते हैं ! [ ऋग्वेदके १०. ११७. ६ मंत्रमेंभी यही अर्थ है। उसमें कहा है, कि "नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी" - जो मनुष्य अर्यमा या सखाका पोषण नहीं करता, अकेलेही भोजन करता है, उसे केवल पापी समझना चाहिये। इसी प्रकार मनुस्मृतिमेंभी कहा है, कि अघं स केवलं भुंक्ते यः पचत्यात्मकारणात् । यज्ञशिष्टाशनं ह्येतत्सतामन्नं विधीयते " ॥ (मनु. ३. ११८) - जो मनुष्य अपने लियेही (अन्न) पकाता है, वह केवल पाप भक्षण करता है। यज्ञ करनेपर जो शेष रह जाता है, उसे 'अमृत' और दूसरोंके भोजन कर चुकनेपर जो शेष रहता है (भुक्तशेष), उसे 'विघस्' कहते हैं (मनु. ३. २८५) ; और भले मनुष्योंके लिये यही अन्न विहित कहा गया है (गीता. ४. ३१)। अब इस बातका औरभी स्पष्टीकरण करते हैं, कि यज्ञ आदि कर्म न तो केवल तिल और चावलोंको आगमें झोंकनेके लियेही हैं, या न स्वर्गप्राप्तिके लियेभी; वरन् जगत्का धारण-पोषण होनेकेलिये उनकी बहुत आवश्यकता है, अर्थात् यज्ञपरही सारा जगत् अवलंबित है :- ] (१४) प्राणीमात्रकी उत्पत्ति अन्नसे होती है, अन्न पर्जन्यसे उत्पन्न होता है, पर्जन्य यज्ञसे उत्पन्न होता है; और यज्ञकी उत्पत्ति कर्मसे होती है। [ मनुस्मृतिमेंभी मनुष्यकी और उसके धारणके लिये आवश्यक अन्नकी उत्पत्तिके विषयमें इसी प्रकारका वर्णन है। मनुके श्लोकका भाव यह है :- "यज्ञकी आगमें दी हुई आहुति सूर्यको मिलती है; और फिर सूर्यसे (अर्थात् परंपरा-द्वारा यज्ञसेही) पर्जन्य उपजता है, पर्जन्यसे अन्न और अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है" (मनु. ३. ७६)। यही श्लोक महाभारतमेंभी है (मभा. शां. २६२. ११)। तैत्तिरीय उपनिषद्में (२. १) यह पूर्वपरंपरा इससेभी पीछे हटा दी गई है और ऐसा क्रम दिया है, "कि परमात्मासे प्रथम आकाश उत्पन्न हुआ; और फिर क्रमसे वायु, अग्नि, जल और पृथिवीकी उत्पत्ति हुई, पृथिवीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न, और अन्नसे पुरुष उत्पन्न हुआ।" अतएव इस परंपराके अनुसार, प्राणीमात्रके कर्मपर्यंत बतलाई हुई पूर्वपरंपराको अब

६६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ १६ ॥ [ कर्मके पहले प्रकृति और प्रकृतिके पहले सीधे अक्षर-ब्रह्मपर्यंत पहुँचकर, पूरी करते हैं :- ] ( १५ ) ( यह ) जान ले, कि कर्मकी उत्पत्ति ब्रह्मसे अर्थात् प्रकृतिसे हुई ( है ); और यह ब्रह्म अक्षरसे अर्थात् परमेश्वरसे उत्पन्न हुआ है । इसलिये ( यह समझ ले, कि ) सर्वगत ब्रह्मही यज्ञमें सदा अधिष्ठित रहता है । [ कोई कोई इस श्लोकके 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ 'प्रकृति' नहीं समझते, वे कहते हैं, कि यहाँ ब्रह्मका अर्थ 'वेद' है। परंतु 'ब्रह्म' शब्दका 'वेद' अर्थ करनेसे यद्यपि इस वाक्यमें आपत्ति नहीं हुई, कि " ब्रह्म अर्थात् 'वेद' परमेश्वरसे उत्पन्न हुए हैं, " तथापि वैसा अर्थ करनेसे " सर्वगत ब्रह्म यज्ञमें है " इसका अर्थ ठीक ठीक नहीं लगता । इसलिये " मम योनिर्महत् ब्रह्म " ( गीता १४. ३ ) श्लोकमें 'ब्रह्म'पदका जो 'प्रकृति' अर्थ है, उसके अनुसार रामानुजभाष्यमें जो यह अर्थ किया गया है, कि इस स्थानमेंभी 'ब्रह्म' शब्दसे जगतकी मूल प्रकृतिही विवक्षित है; वही अर्थ हमेंभी ठीक मालूम होता है। इसके सिवा महाभारतके शांतिपर्वके यज्ञप्रकरणमें यह वर्णन है कि " अनुयज्ञं जगत्सर्वं यज्ञश्चानुजगत्सदा " ( शां. २६७. ३४ ) - यज्ञके पीछे जगत् है, और जगतके पीछे पीछे यज्ञ है । ब्रह्मका अर्थ 'प्रकृति' करनेसे उस वर्णनकाभी प्रस्तुत श्लोकसे मेल हो जाता है, क्योंकि जगतही प्रकृति है । गीतारहस्यके सातवें और आठवें प्रकरणमें यह बात विस्तारपूर्वक बतलाई गई है कि परमेश्वरसे प्रकृति और त्रिगुणात्मक प्रकृतिसे जगतके सब कर्म कैसे निष्पन्न होते हैं, उसी प्रकार पुरुषसूक्तमेंभी यह वर्णन है, कि देवताओने प्रथम यज्ञ करकेही सृष्टिको निर्माण किया है । ] ( १६ ) हे पार्थ ! इस प्रकार ( जगतके धारणार्थ ) चलाये हुए चक्र अर्थात् कर्म या यज्ञके चक्रको, जो इस जगत्मे आगे नहीं चलाता, उसकी आयु पापरूप है; उस इंद्रियलंपटका ( अर्थात् देवताओंको न देकर स्वयं उपभोग करनेवालाका ) जीवन व्यर्थ है । [ स्वयं ब्रह्मानेही - मनुष्योंने नहीं - लोगोंके धारण-पोषणके लिये यज्ञमय कर्म या चातुर्वर्ण्य-वृत्ति उत्पन्न की है । यह सृष्टिका क्रम चलते रहनेके लिये ( श्लोक १४ ) और साथही साथ अपना निर्वाह होनेके लिये ( श्लोक ८ ), इन दोनों कारणोंसे, उस वृत्तिकी आवश्यकता है; और इससे सिद्ध होता

तीसरा अध्याय ६६३ § § यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥ नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥ तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥ | है, कि इस यज्ञचक्रको अनासक्त-बुद्धिसे इस जगत्में सदा चलाते जाना चाहिये । | अब यह बात मालूम हो चुकी, कि मीमांसकोंका या त्रयी-धर्मका कर्मकांड | (यज्ञचक्र) गीता-धर्ममें अनासक्त-बुद्धिकी युक्तिसे कैसे स्थिर रखा गया है | (गीतार. प्र. ११, पृ. ३४७-३४८) । परंतु कई संन्यास-मार्गवाले वेदान्ती इस | विषयमें शंका करते हैं, कि आत्मज्ञानी पुरुषको जब यहीं मोक्ष प्राप्त हो जाता | है, और उसे जो कुछ प्राप्त करना होता है, वह सब उसे यहीं मिल जाता है, तब | उसे इस जगतमें कुछभी कर्म करनेकी आवश्यकता नहीं है, और उसको कर्म | करनाभी न चाहिये । इसी शंकाका उत्तर अगले तीन श्लोकोंमें दिया है ।] (१७) परंतु जो मनुष्य केवल आत्मामेंही रत, आत्मामेंही तृप्त और आत्मामेंही संतुष्ट हो जाता है, उसके लिये (स्वयं अपना) कुछभी कार्य (शेष) नही रह जाता; (१८) उसी प्रकार यहाँ अर्थात् इस जगतमें (कोई काम) करनेसे या न करनेसेभी उसका लाभ नहीं होता; और सब प्राणियोंमें उसका (अपना) कुछभी मतलब अटका नहीं रहता । (१९) तस्मात् अर्थात् जब ज्ञानी पुरुष इस प्रकार कोईभी अपेक्षा नहीं रखता, तब तूभी (फलकी) आसक्ति छोड़कर (अपना) कर्तव्य-कर्म सदैव किया कर । क्योंकि आसक्ति छोड़कर कर्म करनेवाले मनुष्यको परमगति प्राप्त होती है । | [ १७ से १९ तकके श्लोकोंका टीकाकारोंने बहुतही विपर्यास कर डाला | है, इसलिये हम पहले उनका सरल भावार्थही बतलाते हैं। तीनों श्लोक मिलकर | हेतु-अनुमानयुक्त एकही वाक्य है । इनमेंसे १७ वें और १८ वें श्लोकोंमें पहले | उन कारणोंका उल्लेख किया गया है, कि जो ज्ञानी पुरुषके कर्म करनेके विषयमें | साधारण रीतिसे बतलाये जाते हैं; और इन्हीं कारणोंसे गीताने जो अनुमान | निकाला है, वह १९वें श्लोकमें कारणबोधक 'तस्मात्' शब्दका प्रयोग पहले करके | बतलाया गया है । इस जगतमें सोना, बैठना, उठना या जिंदा रहना आदि सब | कर्मोंको कोई छोड़नेकी इच्छा करे, तो वे छूट नहीं सकते । अतः इस अध्यायके | आरंभमें, चौथे और पाँचवें श्लोकोंमें, स्पष्ट कह दिया गया है, कि कर्मोंको

६६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

छोड़ देनेसे न तो नैष्कर्म्य होता है और न वह सिद्धि प्राप्त करनेका उपायभी है। परंतु इसपर संन्यास-मार्गवालोंकी यह दलील है, कि "हम कुछ सिद्धि प्राप्त करनेके लिये कर्म करना नहीं छोड़ते हैं। प्रत्येक मनुष्य इस जगतमें जो कुछ करता है, वह अपने या पराये लाभके लियेही करता है। किंतु मनुष्यका अपना परम साध्य जो सिद्धावस्था अथवा मोक्ष है; वह ज्ञानी पुरुषको उसके ज्ञानसे प्राप्त हुआ करता है, इसलिये उसको ज्ञान प्राप्त हो जानेपर अन्य कुछभी प्राप्त करनेके लिये नहीं रहता (श्लोक १७)। ऐसी अवस्थामें, चाहे वह कर्म करे या न करे, उसे दोनों बातें समान हैं। अच्छा; यदि कहें कि उसे लोकोपयोगार्थ कर्म करने चाहिये, तो लोगोंसेभी उसे कुछ लेना-देना नहीं रहता (श्लोक १८)। फिर वह कर्म करेही क्यों?" इसका उत्तर गीता यों देती है, कि जब कर्म करना और न करनाभी तुम्हें दोनों एक-से हैं, तब कर्म न करनेकाही तुम्हारा इतना हठ क्यों है? जो कुछ शास्त्रके अनुसार प्राप्त होता जाय, उसे आग्रहविहीन बुद्धिसे करके छुट्टी पा जाओ! इस जगतमें कर्म किसीकेभी छूटते नहीं हैं; फिर चाहे वह ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी। अब दीखनेमें तो यह बड़ीही जटिल समस्या जान पड़ती है, कि कर्म तो छूटनेसे रहे; और ज्ञानी पुरुषको स्वयं अपने लिये उनकी आवश्यकता नहीं! परंतु गीताको यह समस्या कुछ कठिन नहीं जँचती। गीताका कथन यह है, कि जब कर्म छूटताही नहीं है, तब उसे करनाही चाहिये। किंतु अब स्वार्थबुद्धि न रहनेसेही उसे निःस्वार्थ अर्थात् निष्काम बुद्धिसे किया करो। १९ वें श्लोकमें 'तस्मात्' पदका प्रयोग करके यही उपदेश अर्जुनको किया गया है, एवं इसकी पुष्टिमें आगे २२ वें श्लोकमें यह दृष्टान्त दिया गया है, कि सबसे श्रेष्ठ ज्ञानी भगवान् स्वयं अपना कुछभी कर्तव्य न होनेपरभी कर्मही करते हैं। सारांश, संन्यास-मार्गके लोग ज्ञानी पुरुषकी स्थितिका वर्णन करते हैं, उसे ठीक मान लें, तो गीताका यह वक्तव्य है, कि उस स्थितिसे कर्म-संन्यास-पक्ष सिद्ध होनेके बदले, सदा निष्काम कर्म करते रहनेका पक्षही औरभी दृढ़ हो जाता है। परंतु संन्यास-मार्गवाले टीकाकारोंको कर्मयोगकी उक्त युक्ति और सिद्धान्त (श्लोक ७, ८, ९) मान्य नहीं है, इसलिये वे उक्त कार्यकारणभावको, अथवा समूचे अर्थप्रवाहको, या आगे बतलाये हुए भगवानके दृष्टान्तकोभी नहीं मानते (श्लोक २२, २५, ३०)। उन्होंने, इन तीनों श्लोकोंको तोड़-मरोड़कर स्वतंत्र मान लिया है; और इनमेंसे पहले दो श्लोकोंमें जो यह निर्देश है, कि "ज्ञानी पुरुषको स्वयं अपना कुछभी कर्तव्य नहीं रहता।" उसीको गीताका अंतिम सिद्धान्त मानकर, उसी आधारपर यह प्रतिपादन किया है, कि भगवान् ज्ञानी पुरुषसे कहते हैं, कि कर्म छोड़ दे! परंतु ऐसा करनेसे तीसरे अर्थात् १९ वें श्लोकमें अर्जुनको जो लगे हाथ यह उपदेश किया है, कि "आसक्ति छोड़कर कर्म कर।" वह अलग हुआ जाता है और उसकी उपपत्तिभी नहीं लगती। इस

पेंचसे बचनेके लिये, इन टीकाकारोंने यह अर्थ करके अपना समाधान कर लिया है, कि अर्जुनको कर्म करनेका उपदेश तो इसलिये किया है, कि वह अज्ञानी था ! परंतु इतनी माथापच्ची करनेपरभी १९वें श्लोकका 'तस्मात्' पद निरर्थकही रह जाता है; और संन्यास-मार्गवालोंका किया हुआ यह अर्थ इसी अध्यायके पूर्वापर संदर्भसेभी विरुद्ध होता है; एवं गीताके अन्यान्य स्थलोंके इन उल्लेखोंसेभी विरुद्ध हो जाता है, कि ज्ञानी पुरुषोंकोभी आसक्ति छोड़कर कर्म करना चाहिये; तथा आगे भगवानने जो अपना दृष्टान्त दिया है, उससेभी यह अर्थ विरुद्ध हो जाता है (गीता २.४७; ३.७, २५; ४.२३; ६.१; १८. ६.९; गीतारहस्य पृ. ९१, पृ. ३२३-३२६) । इसके सिवा एक बात औरभी है, वह यह, कि इस अध्यायमें उस कर्मयोगकाही विवेचन चल रहा है, कि जिसके कारण कर्म करनेपरभी वे बंधक नहीं होते (गीता २.३९); उस विवेचनके बीचमेही यह बे-सिरपैरकी-सी बात कोईभी समझदार मनुष्य न कहेगा, कि “कर्म छोड़ना उत्तम है”! फिर भला भगवान् यह बात क्यों कहने लगे ? अतएव निरे सांप्रदायिक आग्रहके और खींचातानीके ये अर्थ माने नहीं जा सकते। योगवासिष्ठमें लिखा है, कि जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुषकोभी कर्म करने चाहिये; और जब रामने पूछा - “मुझे बतलाइये, कि मुक्त पुरुष कर्म क्यों करे ?” तब वसिष्ठने उत्तर दिया है :- ज्ञस्य नार्थः कर्मत्यागैः नार्थः कर्मसमाश्रयैः । तेन स्थितं यथा यद्यत्तत्तथैव करोत्यसौ ॥ “ज्ञ अर्थात् ज्ञानी पुरुषको कर्म छोड़नेसे या करनेसेभी कोई लाभ नहीं उठाना होता, अतएव (तेन) वह जो जैसे प्राप्त हो जाय, उसे वैसे किया करता है” (योग ६. उ. १९९. ४)। इसी ग्रंथके अंतमें, उपसंहारमें फिर गीताकेही शब्दोंमें पहले यह कारण दिखलाया है :- मम नास्ति कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । यथाप्राप्तेन तिष्ठामि ह्यकर्मणि क आग्रहः ॥ “किसी बातका करना या न करना मुझे एक-सा-ही है।” और दूसरीही पंक्तिमें कहा है, कि जब दोनों बातें एकहीसी हैं, तब फिर “कर्म न करनेका आग्रही क्यों है ? जो जो शास्त्रकी रीतिसे प्राप्त होता जाय, उसे मै करता रहता हूँ” (यो. ६. उ. २१६. १४)। उसी प्रकार इसके पहले, योगवासिष्ठमें “नैव तस्य कृतेनार्थो०” आदि, और गीताका श्लोकही शब्दशः लिया गया है, और आगेके श्लोकमें कहा है, कि “यद्यथा नाम सपन्नं तत्तथाऽस्त्वितरेण किम्” – अतः जो प्राप्त हो, उसेही (जीवन्मुक्त) किया करता है; और कुछ प्रतीक्षा करता हुआ नहीं बैठता (यो. ६. उ. १२५. ४९, ५०)। योगवासिष्ठमेंही

६६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ २० ॥ नहीं; किंतु गणेशगीतामेंभी इसी अर्थके प्रतिपादनमें यह श्लोक आया है :- किंचिदस्य न साध्यं स्यात्सर्वजन्तुषु सर्वदः । अतोऽसक्ततया भूप कर्तव्यं कर्म जन्तुभिः ॥ “उसका अन्य प्राणियोंमें कोई साध्य (प्रयोजन) शेष नहीं रहता; अतएव हे राजन्! लोगोंको अपना अपना कर्तव्य आसक्तबुद्धिसे करते रहना चाहिये” (गणेशगीता २. १८) । इन सब उदाहरणोंपर ध्यान देनेसे ज्ञात होगा, कि यहांपर गीता तीनों श्लोकोंका जो कार्यकारण-संबंध हमने ऊपर दिखलाया है, वही ठीक है। और गीताके तीनों श्लोकोंका पूरा अर्थ योगवासिष्ठके एक ही श्लोकमें आ गया है। अतएव उसके कार्यकारणभावके विषयमें शंका करनेके लिये स्थानही नहीं रह जाता। गीताकी इन्हीं युक्तियोंको महायान-पंथके बौद्ध ग्रंथकारोंनेभी पीछेसे ले लिया है (गीतारहस्य परिशिष्ट पृ. ५६८- ५६९, ५८२-५८३)। ऊपर जो यह कहा गया है, कि स्वार्थ न रहनेके कारणसेही ज्ञानी पुरुषको अपना कर्तव्य निष्काम बुद्धिसे करना चाहिये; और इस प्रकारसे किये हुए निष्काम कर्मका मोक्षमें बाधक होना तो दूर रहा, उसीसे सिद्धि मिलती है - इसीकी पुष्टिके लिये अब दृष्टान्त देते हैं :- ] (२०) जनक आदिनेभी इस प्रकार कर्मसेही सिद्धि पाई है। इसी प्रकार लोक- संग्रहपर दृष्टि देकरभी तुझे कर्म करनाही उचित है। [इस श्लोकके पहले चरणमें इस बातका उदाहरण दिया है, कि निष्काम कर्मोंसे सिद्धि मिलती है; और दूसरे चरणसे भिन्न रीतिके प्रतिपादनका आरंभ कर दिया है। यह तो सिद्ध किया, कि ज्ञानी पुरुषका लोगोंमे कुछ अटका नहीं रहता; तोभी जब उसका कर्म छूटही नहीं सकता, तब तो उसे निष्काम कर्मही करना चाहिये। परंतु यद्यपि यह युक्ति नियमसंगत है, कि कर्म जब छूट नहीं सकता है, तब उन्हें करनाही चाहिये । तथापि सिर्फ इसीसे साधारण मनुष्योंका पूरा पूरा विश्वास नहीं हो जाता। मनमें शंका होती है, कि क्या कर्म टाले नहीं टलते हैं, इसीलिये उसे करना चाहिये ? उसमें और कोई साध्य नहीं है? अतएव इस श्लोकके दूसरे चरणसे यह दिखलानेका आरंभ कर दिया है, कि इस जगतमें अपने कर्मसे लोकसंग्रह करना ज्ञानी पुरुषका एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रत्यक्ष साध्य है। 'लोकसंग्रहमेवापि' के 'एवापि' पदका यही तात्पर्य है। और इससे स्पष्ट होता है, कि अब भिन्न रीतिके प्रतिपादनका आरंभ हो गया है। 'लोकसंग्रह' शब्दमें 'लोक'का अर्थ व्यापक है; अतः इस शब्दमें न केवल मनुष्यजातिकोही, वरन् सारे जगतको सन्मार्गपर लाकर, उसको नाशसे

तीसरा अध्याय ६६७ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २३ ॥ बचाते हुए संग्रह करना – अर्थात् भली भाँति धारण, पोषण-पालन या बचाव करना इत्यादि सभी बातोंका समावेश हो जाता है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (पृ. ३३०-३३८) में इन बातोंका विस्तृत विचार किया गया है, इसलिये हम यहाँ उसकी पुनरुक्ति नहीं करते। अब पहले यह बतलाते हैं, कि लोकसंग्रह करनेका यह कर्तव्य या अधिकार ज्ञानी पुरुषकाही क्यों है :-] (२१) श्रेष्ठ (अर्थात् आत्मज्ञानी कर्मयोगी) पुरुष जो कुछ करता है, वही अन्य अर्थात् साधारण मनुष्यभी किया करते हैं। वह जिसे प्रमाण मानकर अंगीकार करता है, लोग उसीका अनुकरण करते हैं। [ तैत्तिरीय उपनिषदमेंभी पहले 'सत्यं वद', 'धर्मं चर' इत्यादि उपदेश किया है और फिर अंतमें कहा है, कि "जब तुम्हें संदेह हो कि यहाँ संसारमें किसी प्रसंगपर कैसे बर्ताव करें, तब वैसेही बर्ताव करो, कि जैसा ज्ञानी, युक्त और धर्मिष्ठ ब्राह्मण करते हों" (तै. १.११.४)। इसी अर्थका एक श्लोक नारायणीय धर्ममेंभी है (मभा. शां. ३४१.२५); और इसी आशयका मराठीमें श्रीरामदास स्वामीजीका जो एक श्लोक है, वह इसीका अनुवाद है। और जिसका सार यह है:- "लोककल्याणकारी मनुष्य जैसे बर्ताव करता है वैसेही, इस संसारमें, सब लोगभी किया करते हैं।" यही भाव इस प्रकार प्रकट किया जा सकता है – "देख भलोंकी चालको, वर्तें सब संसार।" रामदास स्वामीजीका यह लोककल्याणकारी पुरुषही गीताका श्रेष्ठ कर्मयोगी है। श्रेष्ठ शब्दका अर्थ "आत्मज्ञानी संन्यासी" नहीं है (गीता ५.२)। अब भगवान् स्वयं अपना उदाहरण देकर इसी अर्थको औरभी दृढ़ करते हैं, कि आत्मज्ञानी पुरुषकी स्वार्थबुद्धि छूट जानेपरभी, लोककल्याणके कर्म उससे छूट नहीं जाते :-] (२२) हे पार्थ! (देखो, कि) त्रिभुवनमें न तो (मेरा) कुछ कर्तव्य (शेष) रहा है, (और) न कोई अप्राप्त वस्तु प्राप्त करनेको (रह गई) है; तोभी मैं कर्म करताही रहता हूँ। (२३) क्योंकि यदि मैं कदाचित् आलस्य छोड़कर कर्मोंमें न बर्तुंगा, तो हे पार्थ! सब मनुष्य सब प्रकारसे मेरेही पथका अनुकरण करेंगे।

६६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४ § § सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ २५ ॥ न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६ ॥ ( २४ ) यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सारे लोक उत्सन्न अर्थात् नष्ट हो जावेंगे, मैं संकरकर्ता होऊँगा और इन प्रजाजनोंका मेरे हाथसे नाश होगा । । [ भगवानने अपना उदाहरण देकर इस श्लोकमें भली भाँति स्पष्ट कर । दिखला दिया है, कि लोकसंग्रह कुछ पाखंड नहीं है । इसी प्रकार हमने ऊपर १७ । से १९ वे श्लोकका जो यह अर्थ किया है, कि ज्ञान प्राप्त हो जानेपर ज्ञाताका । कुछ कर्तव्य भलेही न रह गया हो; फिरभी निष्काम बुद्धिसे सारे कर्म उसे करते । रहना चाहिये, वहभी स्वयं भगवानके इस दृष्टान्तसे पूर्णतया सिद्ध हो जाता है । । यदि ऐसा न हो, तो यहही दृष्टान्त निरर्थक हो जायगा ( गीतार. प्र. ११, । पृ. ३२४-३२५ ) । सांख्य-मार्ग और कर्म-मार्गमें यह बड़ा भारी भेद है, कि । सांख्यमार्गके ज्ञानी पुरुष सारे कर्म छोड़ बैठते हैं, फिर चाहे इस कर्मत्यागसे । यज्ञचक्र डूब जाय और जगतका कुछभी हुआ करे - उन्हें उसकी परवाह नहीं । होती; और कर्ममार्गके ज्ञानी पुरुष; स्वयं अपने लिये आवश्यक न भी हो, तोभी । लोकसंग्रहको महत्त्वपूर्ण आवश्यक साध्य समझकर, तदर्थ अपने धर्मके अनुसार, । अपने सारे काम किया करते हैं ( गीतारहस्य प्र. ११, पृ. ३५५-३५८ ) । । यह बतला दिया गया, कि स्वयं भगवान क्या करते हैं । अब ज्ञानियों और । अज्ञानियोंके कर्मोंका भेद दिखलाकर बतलाते हैं, कि अज्ञानियोंको सुधारनेके । लिये ज्ञाताका आवश्यक कर्तव्य क्या है :- ] ( २५ ) हे अर्जुन ! ( इसलिये ) लोकसंग्रह करनेकी इच्छा रखनेवाले ज्ञानी पुरुषकोभी आसक्ति छोड़कर उसी प्रकार बर्तना चाहिये, जिस प्रकार कि ( व्यावहारिक ) कर्मोंमें आसक्त अज्ञानी लोग बर्ताव करते हैं । ( २६ ) कर्ममें आसक्त अज्ञानियोंकी बुद्धिमें ज्ञानी पुरुष भेद-भाव उत्पन्न न करे; ( आप स्वयं ) युक्त अर्थात् योगयुक्त हो कर सभी काम करे; और लोगोंसे खुशीसे करावे । । [ इस श्लोकका अर्थ यह है, कि अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भेदभाव उत्पन्न न । करें; और आगे चल कर २९ वें श्लोकमेंभी यही बात फिरसे कही गई है । परंतु । इसका मतलब यह नहीं है, कि लोगोंको अज्ञानमें बनाये रखे । २५ वें श्लोकमें

कहा है; कि ज्ञानी पुरुषको लोकसंग्रह करना चाहिये । लोकसंग्रहका अर्थही लोगोंको चतुर बनाना है । परंतु इसपर कोई शंका करे, कि जो लोकसंग्रहही करना हो, तो फिर यह आवश्यक नहीं, कि उसके लिये ज्ञानी पुरुष स्वयं कर्म करे; लोगोंको समझा देने – ज्ञानका उपदेश कर देने – सेही काम चल जाता है । इसका भगवान् यह उत्तर देते हैं, कि जिनको सदाचरणका दृढ़ अभ्यास हो नहीं गया है, ( और साधारण लोग ऐसेही होते हैं ) . उनको यदि केवल मुँहसे उपदेश किया जाय – सिर्फ ज्ञान बतला दिया जाय – तो वे अपने अनुचित बर्तावके समर्थनमेंही उस ब्रह्मज्ञानका दुरुपयोग किया करते हैं; और उलटे वे ऐसी व्यर्थ बातें कहते-सुनते सदैव देखे जाते हैं, कि “ अमुक ज्ञानी पुरुष तो ऐसे कहता है । ” इसी प्रकार यदि ज्ञानी पुरुष कर्मोंको सर्वथा छोड़ बैठे, तो अज्ञानी लोगोंको निरुद्योगी बननेके लिये वह एक उदाहरणही बन जाता है । लोगोंका इस प्रकार बातूनी, अथवा निरुद्योगी हो जानाही चालाक बुद्धिभेद है; और लोगोंकी बुद्धिमें इस प्रकारसे भेद-भाव उत्पन्न कर देना ज्ञाता पुरुषको उचित नहीं है । अतएव गीतामें यह सिद्धान्त किया है, कि जो पुरुष ज्ञानी हो जाय, वह लोकसंग्रहके लिये, अर्थात् लोगोंको चतुर और सदाचरणी बनानेके लिये, स्वयं संसारमें रहकर निष्काम कर्म अर्थात् सदाचरणका प्रत्यक्ष आदर्श लोगोंको दिखलावे; और तदनुसार उनमें आचरण करावे – यही जगत्में उसका बड़ा महत्त्वपूर्ण काम है ( गी. र. प्र. १२, पृ. ४०३-४०४ ) । किंतु गीताके इस अभिप्रायको समझे-बूझे बिना कुछ टीकाकार इस श्लोकका यों विपरीत अर्थ किया करते हैं, कि “ ज्ञानी पुरुषको अज्ञानियोंके समानही कर्म करनेका स्वाँग इसलिये करना चाहिये, जिससे कि अज्ञानी लोग नादान बने रह करही अपने कर्म करते रहें !” मानो दंभाचरण सिखलाने अथवा लोगोंको अज्ञानी बने रहने देकर जानवरोंके समान उनमें कर्म करा लेनेके लियेही गीता प्रवृत्त हुई है ! जिनका यह दृढ़ निश्चय है; कि ज्ञानी पुरुष कर्म न करे; संभव है, कि उन्हें लोकसंग्रह एक ढोंग-सा प्रतीत हो; परंतु गीताका वास्तविक अभिप्राय ऐसा नहीं है । भगवान् कहते हैं. कि ज्ञानी पुरुषके कामोंमेंसे लोकसंग्रह एक महत्त्वपूर्ण काम है; और ज्ञानी पुरुषभी अपने उत्तम आदर्शके द्वारा लोगोंको सुधारनेके लिये – नादान बनाये रखनेके लिये नहीं – कर्मही किया करे ( गीतारहस्य प्र. ११, १२ ) । अब यह शंका हो सकती है, कि यदि आत्मज्ञानी पुरुष इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये सांसारिक कर्म करने लगे तो वहभी अज्ञानीही बन जायगा, अतएव स्पष्ट कर बतलाते हैं, कि यद्यपि ज्ञानी और अज्ञानी, दोनोंभी संसारी बन जाय, तथापि उन दोनोंके बर्तावमें भेद क्या है और ज्ञानवानसे अज्ञानीको किस बातकी शिक्षा लेनी चाहिये :- ]

६७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ २७ ॥ तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥ प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ २९ ॥ § § मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३० ॥ ( २७ ) प्रकृतिके ( सत्त्व-रज-तम ) गुणोंसे सब प्रकार कर्म हुआ करते हैं; पर अहंकारसे मोहित ( अज्ञानी पुरुष ) समझता है, कि मैं कर्ता हूँ; ( २८ ) परंतु हे महाबाहु अर्जुन ! “ गुण और कर्म ये दोनोंभी मुझसे भिन्न हैं ” इस तत्त्वको जानने- वाला ( ज्ञानी पुरुष ), यह समझ कर उनमें आसक्त नहीं होता, कि गुणोंका यह आपसमें खेल हो रहा है। ( २९ ) प्रकृतिके गुणोंसे बहके हुए लोग गुण और कर्मोंमेंही आसक्त रहते हैं; इन असर्वज्ञ और मंद जनोंको सर्वज्ञ पुरुष ( अपने कर्मत्यागसे किसी अनुचित मार्गमें लगा कर ) बिचला न दे । । [ यहाँ २६ वें श्लोकके अर्थकाही अनुवाद किया गया है। इस श्लोकमें । जो ये सिद्धान्त हैं, कि प्रकृति भिन्न है और आत्मा भिन्न है; प्रकृति अथवा । मायाही सब कुछ करती है, आत्मा कुछ करता-धरता नहीं है; जो इस तत्त्वको । जान लेता है, वही बुद्ध अथवा ज्ञानी हो जाता है, उसे कर्मका बंधन नहीं होता; । इत्यादि - वे मूलमें कापिल-सांख्यशास्त्रके हैं; और गीतारहस्यके ७ वें प्रकरण । ( पृ. १६५-१६७ ) में उनका पूर्ण विवेचन किया गया है, उसे देखिये । २८ वें । श्लोकका कुछ लोग यों अर्थ करते हैं, कि गुण याने इंद्रियाँ गुणोंमें याने विषयोंमें । बर्तती हैं। यह अर्थ कुछ अशुद्ध नहीं है; क्योंकि सांख्यशास्त्रके अनुसार ग्यारह । इंद्रियाँ और शब्द-स्पर्श आदि पाँच विषय मूल प्रकृतिके २३ गुणोंमेंसेही गुण हैं। । परंतु इसकी अपेक्षा प्रकृतिके समस्त अर्थात् चौबीस गुणोंको लक्ष्य करकेही यह । “ गुणा गुणेषु वर्तन्ते ” सिद्धान्त स्थिर किया गया है ( गीता १३. १९-२२; । १४. २३ )। हमने उसका शब्दशः और व्यापक रीतिसे अनुवाद किया है। । भगवानने यह बतलाया है, कि ज्ञानी और अज्ञानी एकही कर्म करें, तोभी उसमें । बुद्धिकी दृष्टिसे इस प्रकार बहुत बड़ा भेद रहता है ( गीतारहस्य प्र. ११, । पृ. ३१२, ३३० ) अब इस पूरे विवेचनके सार-रूपसे यह उपदेश करते हैं :- ] ( ३० ) ( इसलिये हे अर्जुन ! ) मुझमें अध्यात्म बुद्धिसे सब कर्मोंका संन्यास

तीसरा अध्याय ६७१ § § ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥ § § सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥ अर्थात् अर्पण करके और ( फलकी ) आशा एवं ममता छोड़ कर तू निश्चित हो करके युद्ध कर ! | [ अब यह बतलाते हैं, कि इस उपदेशके अनुसार बर्ताव करनेसे क्या | फल मिलता है और बर्ताव न करनेसे कैसी गति होती है :- ] ( ३१ ) जो श्रद्धावान् ( पुरुष ) दोषोंको न खोजकर मेरे इस मतके अनुसार नित्य बर्ताव करते हैं, वेभी कर्मसे अर्थात् कर्मबंधनसे मुक्त हो जाते हैं। ( ३२ ) परंतु जो दोष-दृष्टिसे शंकाएँ करके मेरे इस मतके अनुसार नहीं बर्तते, उन सर्वज्ञान- विमूढ अर्थात् पक्के मूर्ख अविवेकियोंको नष्ट हुए समझ । | [ निष्काम बुद्धिसे समस्त कर्म करनेके लिये कहनेवाले कर्मयोगकी | श्रेयस्करताके संबंधमें ऊपर अन्वयव्यतिरेकसे जो फलश्रुति बतलाई गई है, उससे | पूर्णतया व्यक्त हो जाता है, कि गीतामें कौनसा विषय प्रतिपाद्य है। इसी कर्म- | योग-निरूपणकी पूर्तिके हेतु भगवान् प्रकृतिकी प्रबलताका और फिर उसे रोकनेके | लिये इंद्रियनिग्रहका वर्णन करते हैं :- ] ( ३३ ) ज्ञानी पुरुषभी अपनी प्रकृतिके अनुसार बर्तता है। सभी प्राणी ( अपनी अपनी ) प्रकृतिके अनुसार रहते हैं, अर्थात् ( वहाँ ) निग्रह जबर्दस्ती क्या करेगी ? ( ३४ ) इंद्रिय और उसके ( शब्द-स्पर्श आदि ) विषयोंमें प्रीति एवं द्वेष ( दोनों ) व्यवस्थित हैं - अर्थात् स्वभावतः निश्चित हैं। इस प्रीति और द्वेषके वशमें न जाना चाहिये; ( क्योंकि ) वे मनुष्यके शत्रु हैं। | [ तैंतीसवें श्लोकके 'निग्रह' शब्दका अर्थ 'निरा संयमन' नहीं है; किंतु | उसका अर्थ 'जबर्दस्ती' अथवा 'हठ' है। इंद्रियोंका योग्य संयमन तो गीताको इष्ट | है; किंतु यहाँपर कहना यह है, कि हठसे या जबर्दस्तीसे इंद्रियोंकी स्वाभाविक | वृत्तियोंकोभी एकदम मार डालना संभव नहीं है। उदाहरण लीजिये; जबतक | देह है, तबतक भूख-प्यास आदि धर्म, प्रकृतिसिद्ध होनेके कारण, छूट नहीं सकते;

६७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ । मनुष्य कितनाही ज्ञानी क्यों न हो; भूख लगतेही भिक्षा माँगनेके लिये तो उसे ! बाहर निकलनाही पड़ता है; इसलिये चतुर पुरुषका यही कर्तव्य है, कि जबर्दस्तीसे । इंद्रियोंको बिलकुलही मार डालनेका वृथा हठ न करें; और योग्य संयमके द्वारा । उन्हें अपने वशमें करके उनकी स्वभावसिद्ध वृत्तियोंका लोकसंग्रहार्थ उपयोग । किया करे - यही इस श्लोकका भावार्थ है । इसी प्रकार ३४ वें श्लोकके 'व्यवस्थित' । पदसे प्रकट होता है, कि सुख और दुःख, ये दोनों विकार स्वतंत्र हैं, एक दूसरेका । अभाव नहीं है ( गीतारहस्य प्र. ४, पृ. १००, ११५ ) । प्रकृति अर्थात् सृष्टिके । अखंडित व्यापारमें कई बार हमें ऐसी बातेंभी करनी पड़ती हैं, कि जो हमें स्वयं । पसंद नही ( गीता १८. ५९ ); और यदि नहीं करते हैं, तो निर्वाह नहीं होता । । ऐसे समय ज्ञानी पुरुष इन कर्मोंको निरिच्छ-बुद्धिसे केवल कर्तव्य समझकर । करता जाता है और उनके पापपुण्यसे अलिप्त रहता है; और अज्ञानी उन्हींमें । आसक्ति रखकर दुःख पाता है; भाम कविके वर्णनानुसार बुद्धिकी दृष्टिसे यही । इन दोनोंमें बड़ा भारी भेद है। परंतु अब एक और शंका होती है, कि यद्यपि यह । सिद्ध हो गया, कि इंद्रियोंको जबर्दस्ती मारकर कर्मत्याग न करे; किंतु निःसंग- । बुद्धिसे सभी काम करता जावे; परंतु यदि ज्ञानी पुरुष युद्धके समान हिंसात्मक । घोर कर्म करनेकी अपेक्षा खेती, व्यापार या भिक्षा माँगना आदि निरुपद्रवी और । सौम्य कर्म करे, तो क्या अधिक प्रशस्त नहीं है ? भगवान् इसका यह उत्तर । देते है :- ] ( ३५ ) पराये धर्मका आचरण सुखसे करते बने, तोभी उसकी अपेक्षा अपना धर्म अर्थात् चातुर्वर्ण्यविहित कर्मही अधिक श्रेयस्कर है; ( फिर चाहे ) वह विगुण अर्थात् सदोष भलेही हो । स्वधर्मके अनुसार ( वर्तनेमें ) मृत्यु हो जावे, तोभी उसमें कल्याण है, (परंतु) परधर्म भयंकर होता है ! । [ स्वधर्मका अर्थ, वह व्यवसाय है, कि जो स्मृतिकारोंकी चातुर्वर्ण्य- । व्यवस्थाके अनुसार प्रत्येक मनुष्यको शास्त्रद्वारा नियत कर दिया गया है; । स्वधर्मका अर्थ मोक्ष-धर्म नहीं है। सब लोगोंके कल्याणके लिये ही गुण-कर्मके । विभागसे चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाको ( गीता १८. ४१ ) शास्त्रकारोंने प्रवृत्त कर दिया । है, अतएव भगवान् कहते हैं कि ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि, ज्ञानी हो जानेपरभी, । अपना अपना व्यवसाय करते रहें, इसीमें उनका और समाजका कल्याण है । और इस व्यवस्थामें बार बार गड़बड़ करना योग्य नही है ( गीतार. प्र. ११, । पृ. ३३६; प्र. १५, पृ. ४९६) । "तेलीका काम तंबोली करे, दैव न मारे आप

तीसरा अध्याय ६७३ अर्जुन उवाच । § § अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ श्रीभगवानुवाच । काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥ । मरे " इस प्रचलित लोकोक्तिका भावार्थभी यही है। जहाँ चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाका । चलन नहीं है, वहाँभी सबको यही श्रेयस्कर जंचेगा, कि जिसने सारी जिंदगी । फौजी महकमेमें बिताई हो, यदि फिर काम पड़े, तो उसको सिपाहीका पेशाही । सुभीतेका होगा; न कि दर्जीका रोजगार; और यही न्याय चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके । लियेभी उपयोगी है। यह प्रश्न भिन्न है, कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था भली है या बुरी; । और वह यहाँ उपस्थितभी नहीं होता। यह बात तो निर्विवाद है, कि । समाजका समुचित धारण-पोषण होनेके लिये खेतीके जैसे निरुपद्रवी और । सौम्य व्यवसायकीही भाँति अन्यान्य कर्मभी आवश्यक हैं। अतएव, जहाँ एक । बार किसीभी उद्योग को अंगीकार किया - फिर चाहे उसे चातुर्वर्ण्य- । व्यवस्थाके कारण स्वीकार करो या अपनी मर्जीसे, - कि वह धर्म हो गया। । फिर किसी विशेष अवसरपर उसमें मीन-मेख निकालकर अपना कर्तव्य-कर्म । छोड़ बैठना अच्छा नहीं है; आवश्यकता होनेपर उस व्यवसायमेंही मर । जाना चाहिये ! बस, यही इस श्लोकका भावार्थ है। कोईभी व्यापार या । रोजगार हो; उसमें कुछ-न-कुछ दोष सहजही निकाला जा सकता है (गीता । १८. ४८)। परंतु इस नुक्ताचीनीके मारे अपना नियत कर्तव्यही छोड़ । देना, कुछ धर्म नहीं है। महाभारतके ब्राह्मण-व्याध-संवादमें और तुलाधार- । जाजलि-संवादमेंभी यही तत्त्व बतलाया गया है, एवं वहाँके ३५ वें श्लोकका । पूर्वार्ध मनुस्मृतिमें (मनु. १०. ९७) और गीतामेंभी (गीता १८. ४७) आया । है। भगवानने ३३ वें श्लोकमें कहा है, कि "इंद्रियोंको मारनेका हठ नहीं । चलता।" इसपर अब अर्जुनने पूछा है, कि इंद्रियोंको मारनेका हठ क्यों नहीं । चलता? और अपनी मर्जी न होने परभी मनुष्य बुरे कामोंकी ओर क्यों । घसीटा जाता है ? ] अर्जुनने कहा :- ( ३६ ) हे वाष्र्णेय ( श्रीकृष्ण ) ! अब ( यह बतलाओ, कि) अपनी इच्छा न रहनेपरभी मनुष्य, जबर्दस्तीसे, किसकी प्रेरणासे पाप करता है। श्रीभगवानने कहा :- ( ३७ ) इस विषयमें यह समझ कि रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाला बड़ा पेटू और बड़ा पापी यह काम एवं यह क्रोधही शत्रु है। गी. र. ८३

६७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ आवृतं ज्ञानमेतेने ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥ इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥ तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥ § § इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥ एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ ( ३८ ) जिस प्रकार धुएँसे अग्नि, धूलिसे दर्पण और जेरसे गर्भ ढँका रहता है, उसी प्रकार उससे यह सब ढँका हुआ है । ( ३९ ) हे कौन्तेय ! कभीभी तृप्त न होनेवाला यह कामरूपी अग्निही ज्ञाताका नित्य वैरी है; उसने ज्ञानको और ढँक रखा है । | [ यह मनुकेही कथनका अनुवाद है, मनुने कहा है, कि “ न जातु कामः | कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥” ( मनु. | २. ९४ ) – कामके उपभोगोंसे काम कभी अघाता नहीं है; बल्कि इंधन डालने- | पर अग्नि जैसे बढ़ जाती है, उसी प्रकार यह कामभी अधिकाधिक बढ़ता जाता | है ( गीतार. प्र. ५, पृ. १०६ ) । ] ( ४० ) इंद्रियोंको, मनको, और बुद्धिको इसका अधिष्ठान अर्थात् घर या गढ़ कहते हैं । इनके आश्रयसे ज्ञानको लपेटकर ( ढँककर ) यह मनुष्यको भुलावेमें डाल देता है । ( ४१ ) अतएव हे भरतश्रेष्ठ ! पहले इंद्रियोंका संयम करके ज्ञान ( अध्यात्म ) और विज्ञानका ( विशेष ज्ञान ) नाश करनेवाले इस पापीको तू मार डाल । ( ४२ ) कहा है, कि ( स्थूल बाह्य पदार्थोंके मानसे उनको जाननेवाली ) इंद्रियाँ पर अर्थात् परे हैं, इंद्रियोंके परे मन है, मनसेभी परे ( व्यवसायात्मिका ) बुद्धि है; और जो बुद्धिमेभी परे है, वह आत्मा है । ( ४३ ) हे महाबाहु अर्जुन !