श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥ ९ ॥ अब तो मानना पड़ता है, कि उन्हीं कर्मोंको करना चाहिये; इसलिये अगले श्लोकोंमें इस बातका विस्तृत विवेचन किया गया है, कि इन कर्मोंका शुभाशुभ लेप अथवा बंधकत्व कैसे मिट जाता है और उन्हें करते रहनेपरभी नैष्कर्म्यावस्था क्योंकर प्राप्त होती है ? यह समग्र विवेचन भारतमें वर्णित नारायणीय या भागवत धर्मके अनुसार है ( मभा. शां. ३४० )। ] ( ९ ) यज्ञके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कर्मोंसे यह लोक बँधा हुआ है । तदर्थ अर्थात् यज्ञार्थ ( किये जानेवाले ) कर्म(भी) तू आसक्ति या फलाशा छोड़कर करता जा । [ इस श्लोकके पहले चरणमें मीमांसकोंका और दूसरेमें गीताका सिद्धान्त बतलाया गया है । मीमांसकोंका कथन है, कि जब वेदोंनेही यज्ञायागादि कर्म हरएक मनुष्यके लिये नियत कर दिये हैं, और जब कि ईश्वरनिर्मित सृष्टिके व्यवहार ठीक ठीक चलते रहनेके लिये यह यज्ञ-चक्र आवश्यक है, तब कोईभी इन कर्मोंका त्याग नहीं कर सकता । यदि कोई इनका त्याग कर देगा, तो समझना होगा, कि वह श्रौतधर्मसे वंचित हो गया । परंतु कर्मविपाक-प्रक्रियाका सिद्धान्त है, कि प्रत्येक कर्मका फल मनुष्यको भोगनाही पड़ता है; और उसके अनुसार कहना पड़ता है, कि यज्ञके लिये मनुष्य जो जो कर्म करेगा, उसका भला या बुरा फलभी उसे भोगनाही पड़ेगा । मीमांसकोंका इसपर यह उत्तर है, कि वेदोंकीही आज्ञा है, कि 'यज्ञ' करने चाहिये, इसलिये यज्ञार्थ जो जो कर्म किये जावेंगे, वे सब ईश्वरसंमत होंगे; अतः उन कर्मोंसे कर्ता बद्ध नहीं हो सकता । परंतु यज्ञोंके- सिवा दूसरे कर्मोंके लिये उदाहरणार्थ, केवल अपना पेट भरनेके लिये, मनुष्य जो कुछ कर्म करेगा, वह यज्ञार्थ नहीं हो सकता; उसमें तो केवल मनुष्यकाही निजी लाभ है। यही कारण है, जो मीमांसक उसे 'पुरुषार्थ' कर्म कहते है; और उन्होंने निश्चित किया है, कि ऐसे याने यज्ञार्थके अतिरिक्त अन्य कर्म अर्थात् पुरुषार्थ कर्मका जो कुछ भला या बुरा फल होगा, वह मनुष्यको भोगनाही पड़ता है - यही सिद्धान्त उक्त श्लोककी पहली पंक्तिमें दिया है ( गीतार. प्र. ३, पृ. ५३-५६ )। कुछ टीकाकार, यज्ञ = विष्णु ऐसा गौण अर्थ करके, कहते हैं, कि यज्ञार्थ शब्दका अर्थ विष्णुप्रीत्यर्थ या परमेश्वरार्पण- पूर्वक है । परंतु हमारी समझमें यह अर्थ खींचातानीका और क्लिष्ट है । पर यहाँपर प्रश्न होता है, कि यज्ञके लिये जो कर्म करने पड़ते हैं, उनके सिवा मनुष्य यदि दूसरे कुछभी कर्म न करे, तो क्या वह कर्मबंधनसे छूट सकता है ? क्योंकि