श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ६५९ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १०॥ | यज्ञभीतो कर्मही है, और उसका स्वर्गप्राप्तिरूप जो शास्त्रोक्त फल है, वह मिले | बिना नहीं रहता । परंतु गीताके दूसरेही अध्यायमें स्पष्ट रीतिसे बतलाया गया | है, कि यह स्वर्गप्राप्तिरूप फल मोक्षप्राप्तिके विरुद्ध है (गीता २ ४०-४४; | ९.२०, २१)। इसीलिये उक्त श्लोकके दूसरे चरणमें यह बात फिर बतलाई | गई है, कि मनुष्यको यज्ञार्थभी जो नियत कर्म करना होता है, उसेभी वह | फलकी आशा छोडकर अर्थात् केवल कर्तव्य समझकर करे; और इसी अर्थका | प्रतिपादन आगे सात्त्विक यज्ञकी व्याख्या करते समय किया गया है (गीता | १७.११; १८.६) । इस श्लोकका भावार्थ यह है, कि इस प्रकार सब कर्म | यज्ञार्थ और सोभी फलाशा छोडकर करनेसे, (१) वे मीमांसकोंके न्याया- | नुसारही किसीभी प्रकार मनुष्यको बद्ध नहीं करते, क्योंकि वे तो यज्ञार्थ किये | जाते हैं; और (२) उनका स्वर्गप्राप्तिरूप शास्त्रोक्त एवं अनित्य फल मिलनेके | बदले मोक्षप्राप्ति होती है, क्योंकि वे फलाशा छोडकर किये जाते हैं। आगे | १९वें श्लोकमें और फिर चौथे अध्यायके २३ वें श्लोकमें यही अर्थ दुबारा प्रति- | पादित हुआ है। तात्पर्य यह है, कि मीमांसकोंके इस सिद्धान्त "यज्ञार्थ कर्म- | करने चाहिये। क्योंकि वे बंधक नहीं होते" मेंही भगवद्गीताने औरभी यह | सुधार कर दिया है, कि "जो कर्म यज्ञार्थ किये जावें, उन्हेंभी फलाशा छोड़कर | करना चाहिये।" किंतु इसपरभी यह शंका होती है, कि मीमांसकोंके | सिद्धान्तको इस प्रकार सुधारनेका प्रयत्न करके यज्ञयाग आदि गार्हस्थ्यवृत्तिको | जारी रखनेकी अपेक्षा क्या यह अधिक अच्छा नहीं है, कि कर्मोंकी झंझटसे | छूटकर मोक्षप्राप्तिके लिये सब कर्मोंको छोडकर संन्यास ले लें? भगवद्गीता | इस प्रश्नका साफ़ यही उत्तर देती है, कि 'नहीं'। क्योंकि यज्ञ-चक्रके विना इस | जगतके व्यवहार जारी नहीं रह सकते । अधिक क्या कहें? जगतके धारण- | पोषणके लिये ब्रह्माने इस चक्रको प्रथम उत्पन्न किया है; और जब कि जगतकी | सुस्थिति या संग्रहही भगवानको इष्ट है, तब इस यज्ञ-चक्रको कोईभी नहीं छोड़ | सकता । अब यही अर्थ अगले श्लोकमें बतलाया गया है। इस प्रकरणमें | पाठकोंको सदा स्मरण रखना चाहिये, कि यज्ञ शब्द यहाँ केवल श्रौत-यज्ञकेही | अर्थमें प्रयुक्त नहीं है, किंतु उसमें स्मार्त-यज्ञोंका तथा चातुर्वर्ण्य आदिके | यथाधिकार सब व्यावहारिक कर्मोंका समावेश है।] (१०) आरंभमें यज्ञके साथ साथ प्रजाको उत्पन्न करके ब्रह्माने (उनसे) कहा, “इसके (यज्ञ) द्वारा तुम्हारी वृद्धि हो; यह (यज्ञ) तुम्हारी कामधेनु होवे,