भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 705

६६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥ अर्थात् यह तुम्हारे इच्छित फलोंको देनेवाला होवे । (११) तुम इस यज्ञसे देवताओंको समृद्ध करते रहो, (और) वे देवता तुम्हे यज्ञसे समृद्ध करते रहें। (इसप्रकार) परस्पर एक दूसरेको समृद्ध करते हुए (दोनोंभी) परम श्रेय अर्थात् कल्याण प्राप्तकर लो !" (१२) क्योंकि, यज्ञसे संतुष्ट होकर देवता लोग तुम्हारे इच्छित (सब) भोग तुम्हें देंगे। उन्हींका दिया हुआ उन्हें (वापिस) न देकर, जो (केवल स्वयं) उपभोग करता है, वह सचमुच चोर है। । [ जब ब्रह्माने इस सृष्टि अर्थात् देव आदि सब लोकोंको उत्पन्न किया, । तब उसे चिंता हुई, कि उन लोगोंका आगे धारण-पोषण कैसे होगा ? महाभारतके । नारायणीय धर्ममें वर्णन है, कि ब्रह्माने इसके बाद हजार वर्षतक तप करके । भगवान्को संतुष्ट किया; तब भगवान्ने सब लोकोंके निर्वाहके लिये प्रवृत्ति- । प्रधान यज्ञचक्र उत्पन्न किया, और देवता तथा मनुष्य, दोनोंसे कहा, कि उसके । अनुसार बर्ताव करके एक दूसरेकी रक्षा करो। उक्त श्लोकमें इसी कथाका । कुछ शब्दभेदसे अनुवाद किया गया है (मभा. शां. ३४०. ३८-७२)। इससे । यह सिद्धान्त औरभी अधिक दृढ़ हो जाता है, कि प्रवृत्ति-प्रधान भागवत धर्मके । तत्त्वोंकाही गीतामें प्रतिपादन किया गया है। परंतु भागवत धर्ममें यज्ञोंमें की । जानेवाली हिंसा गर्ह्य मानी गई है (मभा. शां. ३३६, ३३७), इसलिये पशु- । यज्ञके स्थानमे प्रथम द्रव्यमय यज्ञ शुरू हुआ, और अंतमें यह मत प्रचलित हो गया, । कि जपमय यज्ञ अथवा ज्ञानमय यज्ञही सबमें श्रेष्ठ है (गीता ४. २३-३३)। । यज्ञ शब्दसे मतलब चातुर्वर्ण्यके सब कर्मोंसे है; और यह बात स्पष्ट है, कि । समाजका उचित रीतिसे धारण-पोषण होनेके लिये इन यज्ञकर्मों या यज्ञचक्रको । अच्छी तरह जारी रखना चाहिये (मनु. १. ८७)। अधिक क्या कहें ? यह । यज्ञचक्र आगे बीसवें श्लोकमें वर्णित लोकसंग्रहकाही एक स्वरूप है (गीतार. । प्र. ११)। इसीलिये स्मृतियोंमेंभी लिखा है, कि देवलोक और मनुष्यलोक, । इन दोनोंके संग्रहार्थ भगवान्नेही प्रथम जिस लोकसंग्रहकारक कर्मको निर्माण । किया है, उसे आगे अच्छी तरह प्रचलित रखना मनुष्यका कर्तव्य है, और यही । अर्थ अब अगले श्लोकमें स्पष्ट रीतिसे बतलाया गया है :- ]