भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 706

तीसरा अध्याय ६६१ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥ अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥ (१३) यज्ञ करके शेष बचे हुए भागको ग्रहण करनेवाले सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परंतु (यज्ञ न करके केवल) अपनेही लिये जो (अन्न) पकाते हैं, वे पापी लोग पाप भक्षण करते हैं ! [ ऋग्वेदके १०. ११७. ६ मंत्रमेंभी यही अर्थ है। उसमें कहा है, कि "नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी" - जो मनुष्य अर्यमा या सखाका पोषण नहीं करता, अकेलेही भोजन करता है, उसे केवल पापी समझना चाहिये। इसी प्रकार मनुस्मृतिमेंभी कहा है, कि अघं स केवलं भुंक्ते यः पचत्यात्मकारणात् । यज्ञशिष्टाशनं ह्येतत्सतामन्नं विधीयते " ॥ (मनु. ३. ११८) - जो मनुष्य अपने लियेही (अन्न) पकाता है, वह केवल पाप भक्षण करता है। यज्ञ करनेपर जो शेष रह जाता है, उसे 'अमृत' और दूसरोंके भोजन कर चुकनेपर जो शेष रहता है (भुक्तशेष), उसे 'विघस्' कहते हैं (मनु. ३. २८५) ; और भले मनुष्योंके लिये यही अन्न विहित कहा गया है (गीता. ४. ३१)। अब इस बातका औरभी स्पष्टीकरण करते हैं, कि यज्ञ आदि कर्म न तो केवल तिल और चावलोंको आगमें झोंकनेके लियेही हैं, या न स्वर्गप्राप्तिके लियेभी; वरन् जगत्का धारण-पोषण होनेकेलिये उनकी बहुत आवश्यकता है, अर्थात् यज्ञपरही सारा जगत् अवलंबित है :- ] (१४) प्राणीमात्रकी उत्पत्ति अन्नसे होती है, अन्न पर्जन्यसे उत्पन्न होता है, पर्जन्य यज्ञसे उत्पन्न होता है; और यज्ञकी उत्पत्ति कर्मसे होती है। [ मनुस्मृतिमेंभी मनुष्यकी और उसके धारणके लिये आवश्यक अन्नकी उत्पत्तिके विषयमें इसी प्रकारका वर्णन है। मनुके श्लोकका भाव यह है :- "यज्ञकी आगमें दी हुई आहुति सूर्यको मिलती है; और फिर सूर्यसे (अर्थात् परंपरा-द्वारा यज्ञसेही) पर्जन्य उपजता है, पर्जन्यसे अन्न और अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है" (मनु. ३. ७६)। यही श्लोक महाभारतमेंभी है (मभा. शां. २६२. ११)। तैत्तिरीय उपनिषद्में (२. १) यह पूर्वपरंपरा इससेभी पीछे हटा दी गई है और ऐसा क्रम दिया है, "कि परमात्मासे प्रथम आकाश उत्पन्न हुआ; और फिर क्रमसे वायु, अग्नि, जल और पृथिवीकी उत्पत्ति हुई, पृथिवीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न, और अन्नसे पुरुष उत्पन्न हुआ।" अतएव इस परंपराके अनुसार, प्राणीमात्रके कर्मपर्यंत बतलाई हुई पूर्वपरंपराको अब