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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 707, कुल 956 में से

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पृष्ठ 707

६६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ १६ ॥ [ कर्मके पहले प्रकृति और प्रकृतिके पहले सीधे अक्षर-ब्रह्मपर्यंत पहुँचकर, पूरी करते हैं :- ] ( १५ ) ( यह ) जान ले, कि कर्मकी उत्पत्ति ब्रह्मसे अर्थात् प्रकृतिसे हुई ( है ); और यह ब्रह्म अक्षरसे अर्थात् परमेश्वरसे उत्पन्न हुआ है । इसलिये ( यह समझ ले, कि ) सर्वगत ब्रह्मही यज्ञमें सदा अधिष्ठित रहता है । [ कोई कोई इस श्लोकके 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ 'प्रकृति' नहीं समझते, वे कहते हैं, कि यहाँ ब्रह्मका अर्थ 'वेद' है। परंतु 'ब्रह्म' शब्दका 'वेद' अर्थ करनेसे यद्यपि इस वाक्यमें आपत्ति नहीं हुई, कि " ब्रह्म अर्थात् 'वेद' परमेश्वरसे उत्पन्न हुए हैं, " तथापि वैसा अर्थ करनेसे " सर्वगत ब्रह्म यज्ञमें है " इसका अर्थ ठीक ठीक नहीं लगता । इसलिये " मम योनिर्महत् ब्रह्म " ( गीता १४. ३ ) श्लोकमें 'ब्रह्म'पदका जो 'प्रकृति' अर्थ है, उसके अनुसार रामानुजभाष्यमें जो यह अर्थ किया गया है, कि इस स्थानमेंभी 'ब्रह्म' शब्दसे जगतकी मूल प्रकृतिही विवक्षित है; वही अर्थ हमेंभी ठीक मालूम होता है। इसके सिवा महाभारतके शांतिपर्वके यज्ञप्रकरणमें यह वर्णन है कि " अनुयज्ञं जगत्सर्वं यज्ञश्चानुजगत्सदा " ( शां. २६७. ३४ ) - यज्ञके पीछे जगत् है, और जगतके पीछे पीछे यज्ञ है । ब्रह्मका अर्थ 'प्रकृति' करनेसे उस वर्णनकाभी प्रस्तुत श्लोकसे मेल हो जाता है, क्योंकि जगतही प्रकृति है । गीतारहस्यके सातवें और आठवें प्रकरणमें यह बात विस्तारपूर्वक बतलाई गई है कि परमेश्वरसे प्रकृति और त्रिगुणात्मक प्रकृतिसे जगतके सब कर्म कैसे निष्पन्न होते हैं, उसी प्रकार पुरुषसूक्तमेंभी यह वर्णन है, कि देवताओने प्रथम यज्ञ करकेही सृष्टिको निर्माण किया है । ] ( १६ ) हे पार्थ ! इस प्रकार ( जगतके धारणार्थ ) चलाये हुए चक्र अर्थात् कर्म या यज्ञके चक्रको, जो इस जगत्मे आगे नहीं चलाता, उसकी आयु पापरूप है; उस इंद्रियलंपटका ( अर्थात् देवताओंको न देकर स्वयं उपभोग करनेवालाका ) जीवन व्यर्थ है । [ स्वयं ब्रह्मानेही - मनुष्योंने नहीं - लोगोंके धारण-पोषणके लिये यज्ञमय कर्म या चातुर्वर्ण्य-वृत्ति उत्पन्न की है । यह सृष्टिका क्रम चलते रहनेके लिये ( श्लोक १४ ) और साथही साथ अपना निर्वाह होनेके लिये ( श्लोक ८ ), इन दोनों कारणोंसे, उस वृत्तिकी आवश्यकता है; और इससे सिद्ध होता

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