भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 708, कुल 956 में से

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पृष्ठ 708

तीसरा अध्याय ६६३ § § यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥ नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥ तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥ | है, कि इस यज्ञचक्रको अनासक्त-बुद्धिसे इस जगत्में सदा चलाते जाना चाहिये । | अब यह बात मालूम हो चुकी, कि मीमांसकोंका या त्रयी-धर्मका कर्मकांड | (यज्ञचक्र) गीता-धर्ममें अनासक्त-बुद्धिकी युक्तिसे कैसे स्थिर रखा गया है | (गीतार. प्र. ११, पृ. ३४७-३४८) । परंतु कई संन्यास-मार्गवाले वेदान्ती इस | विषयमें शंका करते हैं, कि आत्मज्ञानी पुरुषको जब यहीं मोक्ष प्राप्त हो जाता | है, और उसे जो कुछ प्राप्त करना होता है, वह सब उसे यहीं मिल जाता है, तब | उसे इस जगतमें कुछभी कर्म करनेकी आवश्यकता नहीं है, और उसको कर्म | करनाभी न चाहिये । इसी शंकाका उत्तर अगले तीन श्लोकोंमें दिया है ।] (१७) परंतु जो मनुष्य केवल आत्मामेंही रत, आत्मामेंही तृप्त और आत्मामेंही संतुष्ट हो जाता है, उसके लिये (स्वयं अपना) कुछभी कार्य (शेष) नही रह जाता; (१८) उसी प्रकार यहाँ अर्थात् इस जगतमें (कोई काम) करनेसे या न करनेसेभी उसका लाभ नहीं होता; और सब प्राणियोंमें उसका (अपना) कुछभी मतलब अटका नहीं रहता । (१९) तस्मात् अर्थात् जब ज्ञानी पुरुष इस प्रकार कोईभी अपेक्षा नहीं रखता, तब तूभी (फलकी) आसक्ति छोड़कर (अपना) कर्तव्य-कर्म सदैव किया कर । क्योंकि आसक्ति छोड़कर कर्म करनेवाले मनुष्यको परमगति प्राप्त होती है । | [ १७ से १९ तकके श्लोकोंका टीकाकारोंने बहुतही विपर्यास कर डाला | है, इसलिये हम पहले उनका सरल भावार्थही बतलाते हैं। तीनों श्लोक मिलकर | हेतु-अनुमानयुक्त एकही वाक्य है । इनमेंसे १७ वें और १८ वें श्लोकोंमें पहले | उन कारणोंका उल्लेख किया गया है, कि जो ज्ञानी पुरुषके कर्म करनेके विषयमें | साधारण रीतिसे बतलाये जाते हैं; और इन्हीं कारणोंसे गीताने जो अनुमान | निकाला है, वह १९वें श्लोकमें कारणबोधक 'तस्मात्' शब्दका प्रयोग पहले करके | बतलाया गया है । इस जगतमें सोना, बैठना, उठना या जिंदा रहना आदि सब | कर्मोंको कोई छोड़नेकी इच्छा करे, तो वे छूट नहीं सकते । अतः इस अध्यायके | आरंभमें, चौथे और पाँचवें श्लोकोंमें, स्पष्ट कह दिया गया है, कि कर्मोंको

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