भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 709

६६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

छोड़ देनेसे न तो नैष्कर्म्य होता है और न वह सिद्धि प्राप्त करनेका उपायभी है। परंतु इसपर संन्यास-मार्गवालोंकी यह दलील है, कि "हम कुछ सिद्धि प्राप्त करनेके लिये कर्म करना नहीं छोड़ते हैं। प्रत्येक मनुष्य इस जगतमें जो कुछ करता है, वह अपने या पराये लाभके लियेही करता है। किंतु मनुष्यका अपना परम साध्य जो सिद्धावस्था अथवा मोक्ष है; वह ज्ञानी पुरुषको उसके ज्ञानसे प्राप्त हुआ करता है, इसलिये उसको ज्ञान प्राप्त हो जानेपर अन्य कुछभी प्राप्त करनेके लिये नहीं रहता (श्लोक १७)। ऐसी अवस्थामें, चाहे वह कर्म करे या न करे, उसे दोनों बातें समान हैं। अच्छा; यदि कहें कि उसे लोकोपयोगार्थ कर्म करने चाहिये, तो लोगोंसेभी उसे कुछ लेना-देना नहीं रहता (श्लोक १८)। फिर वह कर्म करेही क्यों?" इसका उत्तर गीता यों देती है, कि जब कर्म करना और न करनाभी तुम्हें दोनों एक-से हैं, तब कर्म न करनेकाही तुम्हारा इतना हठ क्यों है? जो कुछ शास्त्रके अनुसार प्राप्त होता जाय, उसे आग्रहविहीन बुद्धिसे करके छुट्टी पा जाओ! इस जगतमें कर्म किसीकेभी छूटते नहीं हैं; फिर चाहे वह ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी। अब दीखनेमें तो यह बड़ीही जटिल समस्या जान पड़ती है, कि कर्म तो छूटनेसे रहे; और ज्ञानी पुरुषको स्वयं अपने लिये उनकी आवश्यकता नहीं! परंतु गीताको यह समस्या कुछ कठिन नहीं जँचती। गीताका कथन यह है, कि जब कर्म छूटताही नहीं है, तब उसे करनाही चाहिये। किंतु अब स्वार्थबुद्धि न रहनेसेही उसे निःस्वार्थ अर्थात् निष्काम बुद्धिसे किया करो। १९ वें श्लोकमें 'तस्मात्' पदका प्रयोग करके यही उपदेश अर्जुनको किया गया है, एवं इसकी पुष्टिमें आगे २२ वें श्लोकमें यह दृष्टान्त दिया गया है, कि सबसे श्रेष्ठ ज्ञानी भगवान् स्वयं अपना कुछभी कर्तव्य न होनेपरभी कर्मही करते हैं। सारांश, संन्यास-मार्गके लोग ज्ञानी पुरुषकी स्थितिका वर्णन करते हैं, उसे ठीक मान लें, तो गीताका यह वक्तव्य है, कि उस स्थितिसे कर्म-संन्यास-पक्ष सिद्ध होनेके बदले, सदा निष्काम कर्म करते रहनेका पक्षही औरभी दृढ़ हो जाता है। परंतु संन्यास-मार्गवाले टीकाकारोंको कर्मयोगकी उक्त युक्ति और सिद्धान्त (श्लोक ७, ८, ९) मान्य नहीं है, इसलिये वे उक्त कार्यकारणभावको, अथवा समूचे अर्थप्रवाहको, या आगे बतलाये हुए भगवानके दृष्टान्तकोभी नहीं मानते (श्लोक २२, २५, ३०)। उन्होंने, इन तीनों श्लोकोंको तोड़-मरोड़कर स्वतंत्र मान लिया है; और इनमेंसे पहले दो श्लोकोंमें जो यह निर्देश है, कि "ज्ञानी पुरुषको स्वयं अपना कुछभी कर्तव्य नहीं रहता।" उसीको गीताका अंतिम सिद्धान्त मानकर, उसी आधारपर यह प्रतिपादन किया है, कि भगवान् ज्ञानी पुरुषसे कहते हैं, कि कर्म छोड़ दे! परंतु ऐसा करनेसे तीसरे अर्थात् १९ वें श्लोकमें अर्जुनको जो लगे हाथ यह उपदेश किया है, कि "आसक्ति छोड़कर कर्म कर।" वह अलग हुआ जाता है और उसकी उपपत्तिभी नहीं लगती। इस