भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 710

पेंचसे बचनेके लिये, इन टीकाकारोंने यह अर्थ करके अपना समाधान कर लिया है, कि अर्जुनको कर्म करनेका उपदेश तो इसलिये किया है, कि वह अज्ञानी था ! परंतु इतनी माथापच्ची करनेपरभी १९वें श्लोकका 'तस्मात्' पद निरर्थकही रह जाता है; और संन्यास-मार्गवालोंका किया हुआ यह अर्थ इसी अध्यायके पूर्वापर संदर्भसेभी विरुद्ध होता है; एवं गीताके अन्यान्य स्थलोंके इन उल्लेखोंसेभी विरुद्ध हो जाता है, कि ज्ञानी पुरुषोंकोभी आसक्ति छोड़कर कर्म करना चाहिये; तथा आगे भगवानने जो अपना दृष्टान्त दिया है, उससेभी यह अर्थ विरुद्ध हो जाता है (गीता २.४७; ३.७, २५; ४.२३; ६.१; १८. ६.९; गीतारहस्य पृ. ९१, पृ. ३२३-३२६) । इसके सिवा एक बात औरभी है, वह यह, कि इस अध्यायमें उस कर्मयोगकाही विवेचन चल रहा है, कि जिसके कारण कर्म करनेपरभी वे बंधक नहीं होते (गीता २.३९); उस विवेचनके बीचमेही यह बे-सिरपैरकी-सी बात कोईभी समझदार मनुष्य न कहेगा, कि “कर्म छोड़ना उत्तम है”! फिर भला भगवान् यह बात क्यों कहने लगे ? अतएव निरे सांप्रदायिक आग्रहके और खींचातानीके ये अर्थ माने नहीं जा सकते। योगवासिष्ठमें लिखा है, कि जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुषकोभी कर्म करने चाहिये; और जब रामने पूछा - “मुझे बतलाइये, कि मुक्त पुरुष कर्म क्यों करे ?” तब वसिष्ठने उत्तर दिया है :- ज्ञस्य नार्थः कर्मत्यागैः नार्थः कर्मसमाश्रयैः । तेन स्थितं यथा यद्यत्तत्तथैव करोत्यसौ ॥ “ज्ञ अर्थात् ज्ञानी पुरुषको कर्म छोड़नेसे या करनेसेभी कोई लाभ नहीं उठाना होता, अतएव (तेन) वह जो जैसे प्राप्त हो जाय, उसे वैसे किया करता है” (योग ६. उ. १९९. ४)। इसी ग्रंथके अंतमें, उपसंहारमें फिर गीताकेही शब्दोंमें पहले यह कारण दिखलाया है :- मम नास्ति कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । यथाप्राप्तेन तिष्ठामि ह्यकर्मणि क आग्रहः ॥ “किसी बातका करना या न करना मुझे एक-सा-ही है।” और दूसरीही पंक्तिमें कहा है, कि जब दोनों बातें एकहीसी हैं, तब फिर “कर्म न करनेका आग्रही क्यों है ? जो जो शास्त्रकी रीतिसे प्राप्त होता जाय, उसे मै करता रहता हूँ” (यो. ६. उ. २१६. १४)। उसी प्रकार इसके पहले, योगवासिष्ठमें “नैव तस्य कृतेनार्थो०” आदि, और गीताका श्लोकही शब्दशः लिया गया है, और आगेके श्लोकमें कहा है, कि “यद्यथा नाम सपन्नं तत्तथाऽस्त्वितरेण किम्” – अतः जो प्राप्त हो, उसेही (जीवन्मुक्त) किया करता है; और कुछ प्रतीक्षा करता हुआ नहीं बैठता (यो. ६. उ. १२५. ४९, ५०)। योगवासिष्ठमेंही