भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 711, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 711

६६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ २० ॥ नहीं; किंतु गणेशगीतामेंभी इसी अर्थके प्रतिपादनमें यह श्लोक आया है :- किंचिदस्य न साध्यं स्यात्सर्वजन्तुषु सर्वदः । अतोऽसक्ततया भूप कर्तव्यं कर्म जन्तुभिः ॥ “उसका अन्य प्राणियोंमें कोई साध्य (प्रयोजन) शेष नहीं रहता; अतएव हे राजन्! लोगोंको अपना अपना कर्तव्य आसक्तबुद्धिसे करते रहना चाहिये” (गणेशगीता २. १८) । इन सब उदाहरणोंपर ध्यान देनेसे ज्ञात होगा, कि यहांपर गीता तीनों श्लोकोंका जो कार्यकारण-संबंध हमने ऊपर दिखलाया है, वही ठीक है। और गीताके तीनों श्लोकोंका पूरा अर्थ योगवासिष्ठके एक ही श्लोकमें आ गया है। अतएव उसके कार्यकारणभावके विषयमें शंका करनेके लिये स्थानही नहीं रह जाता। गीताकी इन्हीं युक्तियोंको महायान-पंथके बौद्ध ग्रंथकारोंनेभी पीछेसे ले लिया है (गीतारहस्य परिशिष्ट पृ. ५६८- ५६९, ५८२-५८३)। ऊपर जो यह कहा गया है, कि स्वार्थ न रहनेके कारणसेही ज्ञानी पुरुषको अपना कर्तव्य निष्काम बुद्धिसे करना चाहिये; और इस प्रकारसे किये हुए निष्काम कर्मका मोक्षमें बाधक होना तो दूर रहा, उसीसे सिद्धि मिलती है - इसीकी पुष्टिके लिये अब दृष्टान्त देते हैं :- ] (२०) जनक आदिनेभी इस प्रकार कर्मसेही सिद्धि पाई है। इसी प्रकार लोक- संग्रहपर दृष्टि देकरभी तुझे कर्म करनाही उचित है। [इस श्लोकके पहले चरणमें इस बातका उदाहरण दिया है, कि निष्काम कर्मोंसे सिद्धि मिलती है; और दूसरे चरणसे भिन्न रीतिके प्रतिपादनका आरंभ कर दिया है। यह तो सिद्ध किया, कि ज्ञानी पुरुषका लोगोंमे कुछ अटका नहीं रहता; तोभी जब उसका कर्म छूटही नहीं सकता, तब तो उसे निष्काम कर्मही करना चाहिये। परंतु यद्यपि यह युक्ति नियमसंगत है, कि कर्म जब छूट नहीं सकता है, तब उन्हें करनाही चाहिये । तथापि सिर्फ इसीसे साधारण मनुष्योंका पूरा पूरा विश्वास नहीं हो जाता। मनमें शंका होती है, कि क्या कर्म टाले नहीं टलते हैं, इसीलिये उसे करना चाहिये ? उसमें और कोई साध्य नहीं है? अतएव इस श्लोकके दूसरे चरणसे यह दिखलानेका आरंभ कर दिया है, कि इस जगतमें अपने कर्मसे लोकसंग्रह करना ज्ञानी पुरुषका एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रत्यक्ष साध्य है। 'लोकसंग्रहमेवापि' के 'एवापि' पदका यही तात्पर्य है। और इससे स्पष्ट होता है, कि अब भिन्न रीतिके प्रतिपादनका आरंभ हो गया है। 'लोकसंग्रह' शब्दमें 'लोक'का अर्थ व्यापक है; अतः इस शब्दमें न केवल मनुष्यजातिकोही, वरन् सारे जगतको सन्मार्गपर लाकर, उसको नाशसे

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 711, कुल 956 में से · BharatKosha