श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 712, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ६६७ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २३ ॥ बचाते हुए संग्रह करना – अर्थात् भली भाँति धारण, पोषण-पालन या बचाव करना इत्यादि सभी बातोंका समावेश हो जाता है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (पृ. ३३०-३३८) में इन बातोंका विस्तृत विचार किया गया है, इसलिये हम यहाँ उसकी पुनरुक्ति नहीं करते। अब पहले यह बतलाते हैं, कि लोकसंग्रह करनेका यह कर्तव्य या अधिकार ज्ञानी पुरुषकाही क्यों है :-] (२१) श्रेष्ठ (अर्थात् आत्मज्ञानी कर्मयोगी) पुरुष जो कुछ करता है, वही अन्य अर्थात् साधारण मनुष्यभी किया करते हैं। वह जिसे प्रमाण मानकर अंगीकार करता है, लोग उसीका अनुकरण करते हैं। [ तैत्तिरीय उपनिषदमेंभी पहले 'सत्यं वद', 'धर्मं चर' इत्यादि उपदेश किया है और फिर अंतमें कहा है, कि "जब तुम्हें संदेह हो कि यहाँ संसारमें किसी प्रसंगपर कैसे बर्ताव करें, तब वैसेही बर्ताव करो, कि जैसा ज्ञानी, युक्त और धर्मिष्ठ ब्राह्मण करते हों" (तै. १.११.४)। इसी अर्थका एक श्लोक नारायणीय धर्ममेंभी है (मभा. शां. ३४१.२५); और इसी आशयका मराठीमें श्रीरामदास स्वामीजीका जो एक श्लोक है, वह इसीका अनुवाद है। और जिसका सार यह है:- "लोककल्याणकारी मनुष्य जैसे बर्ताव करता है वैसेही, इस संसारमें, सब लोगभी किया करते हैं।" यही भाव इस प्रकार प्रकट किया जा सकता है – "देख भलोंकी चालको, वर्तें सब संसार।" रामदास स्वामीजीका यह लोककल्याणकारी पुरुषही गीताका श्रेष्ठ कर्मयोगी है। श्रेष्ठ शब्दका अर्थ "आत्मज्ञानी संन्यासी" नहीं है (गीता ५.२)। अब भगवान् स्वयं अपना उदाहरण देकर इसी अर्थको औरभी दृढ़ करते हैं, कि आत्मज्ञानी पुरुषकी स्वार्थबुद्धि छूट जानेपरभी, लोककल्याणके कर्म उससे छूट नहीं जाते :-] (२२) हे पार्थ! (देखो, कि) त्रिभुवनमें न तो (मेरा) कुछ कर्तव्य (शेष) रहा है, (और) न कोई अप्राप्त वस्तु प्राप्त करनेको (रह गई) है; तोभी मैं कर्म करताही रहता हूँ। (२३) क्योंकि यदि मैं कदाचित् आलस्य छोड़कर कर्मोंमें न बर्तुंगा, तो हे पार्थ! सब मनुष्य सब प्रकारसे मेरेही पथका अनुकरण करेंगे।