भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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६६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४ § § सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ २५ ॥ न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६ ॥ ( २४ ) यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सारे लोक उत्सन्न अर्थात् नष्ट हो जावेंगे, मैं संकरकर्ता होऊँगा और इन प्रजाजनोंका मेरे हाथसे नाश होगा । । [ भगवानने अपना उदाहरण देकर इस श्लोकमें भली भाँति स्पष्ट कर । दिखला दिया है, कि लोकसंग्रह कुछ पाखंड नहीं है । इसी प्रकार हमने ऊपर १७ । से १९ वे श्लोकका जो यह अर्थ किया है, कि ज्ञान प्राप्त हो जानेपर ज्ञाताका । कुछ कर्तव्य भलेही न रह गया हो; फिरभी निष्काम बुद्धिसे सारे कर्म उसे करते । रहना चाहिये, वहभी स्वयं भगवानके इस दृष्टान्तसे पूर्णतया सिद्ध हो जाता है । । यदि ऐसा न हो, तो यहही दृष्टान्त निरर्थक हो जायगा ( गीतार. प्र. ११, । पृ. ३२४-३२५ ) । सांख्य-मार्ग और कर्म-मार्गमें यह बड़ा भारी भेद है, कि । सांख्यमार्गके ज्ञानी पुरुष सारे कर्म छोड़ बैठते हैं, फिर चाहे इस कर्मत्यागसे । यज्ञचक्र डूब जाय और जगतका कुछभी हुआ करे - उन्हें उसकी परवाह नहीं । होती; और कर्ममार्गके ज्ञानी पुरुष; स्वयं अपने लिये आवश्यक न भी हो, तोभी । लोकसंग्रहको महत्त्वपूर्ण आवश्यक साध्य समझकर, तदर्थ अपने धर्मके अनुसार, । अपने सारे काम किया करते हैं ( गीतारहस्य प्र. ११, पृ. ३५५-३५८ ) । । यह बतला दिया गया, कि स्वयं भगवान क्या करते हैं । अब ज्ञानियों और । अज्ञानियोंके कर्मोंका भेद दिखलाकर बतलाते हैं, कि अज्ञानियोंको सुधारनेके । लिये ज्ञाताका आवश्यक कर्तव्य क्या है :- ] ( २५ ) हे अर्जुन ! ( इसलिये ) लोकसंग्रह करनेकी इच्छा रखनेवाले ज्ञानी पुरुषकोभी आसक्ति छोड़कर उसी प्रकार बर्तना चाहिये, जिस प्रकार कि ( व्यावहारिक ) कर्मोंमें आसक्त अज्ञानी लोग बर्ताव करते हैं । ( २६ ) कर्ममें आसक्त अज्ञानियोंकी बुद्धिमें ज्ञानी पुरुष भेद-भाव उत्पन्न न करे; ( आप स्वयं ) युक्त अर्थात् योगयुक्त हो कर सभी काम करे; और लोगोंसे खुशीसे करावे । । [ इस श्लोकका अर्थ यह है, कि अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भेदभाव उत्पन्न न । करें; और आगे चल कर २९ वें श्लोकमेंभी यही बात फिरसे कही गई है । परंतु । इसका मतलब यह नहीं है, कि लोगोंको अज्ञानमें बनाये रखे । २५ वें श्लोकमें