श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहा है; कि ज्ञानी पुरुषको लोकसंग्रह करना चाहिये । लोकसंग्रहका अर्थही लोगोंको चतुर बनाना है । परंतु इसपर कोई शंका करे, कि जो लोकसंग्रहही करना हो, तो फिर यह आवश्यक नहीं, कि उसके लिये ज्ञानी पुरुष स्वयं कर्म करे; लोगोंको समझा देने – ज्ञानका उपदेश कर देने – सेही काम चल जाता है । इसका भगवान् यह उत्तर देते हैं, कि जिनको सदाचरणका दृढ़ अभ्यास हो नहीं गया है, ( और साधारण लोग ऐसेही होते हैं ) . उनको यदि केवल मुँहसे उपदेश किया जाय – सिर्फ ज्ञान बतला दिया जाय – तो वे अपने अनुचित बर्तावके समर्थनमेंही उस ब्रह्मज्ञानका दुरुपयोग किया करते हैं; और उलटे वे ऐसी व्यर्थ बातें कहते-सुनते सदैव देखे जाते हैं, कि “ अमुक ज्ञानी पुरुष तो ऐसे कहता है । ” इसी प्रकार यदि ज्ञानी पुरुष कर्मोंको सर्वथा छोड़ बैठे, तो अज्ञानी लोगोंको निरुद्योगी बननेके लिये वह एक उदाहरणही बन जाता है । लोगोंका इस प्रकार बातूनी, अथवा निरुद्योगी हो जानाही चालाक बुद्धिभेद है; और लोगोंकी बुद्धिमें इस प्रकारसे भेद-भाव उत्पन्न कर देना ज्ञाता पुरुषको उचित नहीं है । अतएव गीतामें यह सिद्धान्त किया है, कि जो पुरुष ज्ञानी हो जाय, वह लोकसंग्रहके लिये, अर्थात् लोगोंको चतुर और सदाचरणी बनानेके लिये, स्वयं संसारमें रहकर निष्काम कर्म अर्थात् सदाचरणका प्रत्यक्ष आदर्श लोगोंको दिखलावे; और तदनुसार उनमें आचरण करावे – यही जगत्में उसका बड़ा महत्त्वपूर्ण काम है ( गी. र. प्र. १२, पृ. ४०३-४०४ ) । किंतु गीताके इस अभिप्रायको समझे-बूझे बिना कुछ टीकाकार इस श्लोकका यों विपरीत अर्थ किया करते हैं, कि “ ज्ञानी पुरुषको अज्ञानियोंके समानही कर्म करनेका स्वाँग इसलिये करना चाहिये, जिससे कि अज्ञानी लोग नादान बने रह करही अपने कर्म करते रहें !” मानो दंभाचरण सिखलाने अथवा लोगोंको अज्ञानी बने रहने देकर जानवरोंके समान उनमें कर्म करा लेनेके लियेही गीता प्रवृत्त हुई है ! जिनका यह दृढ़ निश्चय है; कि ज्ञानी पुरुष कर्म न करे; संभव है, कि उन्हें लोकसंग्रह एक ढोंग-सा प्रतीत हो; परंतु गीताका वास्तविक अभिप्राय ऐसा नहीं है । भगवान् कहते हैं. कि ज्ञानी पुरुषके कामोंमेंसे लोकसंग्रह एक महत्त्वपूर्ण काम है; और ज्ञानी पुरुषभी अपने उत्तम आदर्शके द्वारा लोगोंको सुधारनेके लिये – नादान बनाये रखनेके लिये नहीं – कर्मही किया करे ( गीतारहस्य प्र. ११, १२ ) । अब यह शंका हो सकती है, कि यदि आत्मज्ञानी पुरुष इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये सांसारिक कर्म करने लगे तो वहभी अज्ञानीही बन जायगा, अतएव स्पष्ट कर बतलाते हैं, कि यद्यपि ज्ञानी और अज्ञानी, दोनोंभी संसारी बन जाय, तथापि उन दोनोंके बर्तावमें भेद क्या है और ज्ञानवानसे अज्ञानीको किस बातकी शिक्षा लेनी चाहिये :- ]