भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 715

६७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ २७ ॥ तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥ प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ २९ ॥ § § मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३० ॥ ( २७ ) प्रकृतिके ( सत्त्व-रज-तम ) गुणोंसे सब प्रकार कर्म हुआ करते हैं; पर अहंकारसे मोहित ( अज्ञानी पुरुष ) समझता है, कि मैं कर्ता हूँ; ( २८ ) परंतु हे महाबाहु अर्जुन ! “ गुण और कर्म ये दोनोंभी मुझसे भिन्न हैं ” इस तत्त्वको जानने- वाला ( ज्ञानी पुरुष ), यह समझ कर उनमें आसक्त नहीं होता, कि गुणोंका यह आपसमें खेल हो रहा है। ( २९ ) प्रकृतिके गुणोंसे बहके हुए लोग गुण और कर्मोंमेंही आसक्त रहते हैं; इन असर्वज्ञ और मंद जनोंको सर्वज्ञ पुरुष ( अपने कर्मत्यागसे किसी अनुचित मार्गमें लगा कर ) बिचला न दे । । [ यहाँ २६ वें श्लोकके अर्थकाही अनुवाद किया गया है। इस श्लोकमें । जो ये सिद्धान्त हैं, कि प्रकृति भिन्न है और आत्मा भिन्न है; प्रकृति अथवा । मायाही सब कुछ करती है, आत्मा कुछ करता-धरता नहीं है; जो इस तत्त्वको । जान लेता है, वही बुद्ध अथवा ज्ञानी हो जाता है, उसे कर्मका बंधन नहीं होता; । इत्यादि - वे मूलमें कापिल-सांख्यशास्त्रके हैं; और गीतारहस्यके ७ वें प्रकरण । ( पृ. १६५-१६७ ) में उनका पूर्ण विवेचन किया गया है, उसे देखिये । २८ वें । श्लोकका कुछ लोग यों अर्थ करते हैं, कि गुण याने इंद्रियाँ गुणोंमें याने विषयोंमें । बर्तती हैं। यह अर्थ कुछ अशुद्ध नहीं है; क्योंकि सांख्यशास्त्रके अनुसार ग्यारह । इंद्रियाँ और शब्द-स्पर्श आदि पाँच विषय मूल प्रकृतिके २३ गुणोंमेंसेही गुण हैं। । परंतु इसकी अपेक्षा प्रकृतिके समस्त अर्थात् चौबीस गुणोंको लक्ष्य करकेही यह । “ गुणा गुणेषु वर्तन्ते ” सिद्धान्त स्थिर किया गया है ( गीता १३. १९-२२; । १४. २३ )। हमने उसका शब्दशः और व्यापक रीतिसे अनुवाद किया है। । भगवानने यह बतलाया है, कि ज्ञानी और अज्ञानी एकही कर्म करें, तोभी उसमें । बुद्धिकी दृष्टिसे इस प्रकार बहुत बड़ा भेद रहता है ( गीतारहस्य प्र. ११, । पृ. ३१२, ३३० ) अब इस पूरे विवेचनके सार-रूपसे यह उपदेश करते हैं :- ] ( ३० ) ( इसलिये हे अर्जुन ! ) मुझमें अध्यात्म बुद्धिसे सब कर्मोंका संन्यास