श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 716, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ६७१ § § ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥ § § सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥ अर्थात् अर्पण करके और ( फलकी ) आशा एवं ममता छोड़ कर तू निश्चित हो करके युद्ध कर ! | [ अब यह बतलाते हैं, कि इस उपदेशके अनुसार बर्ताव करनेसे क्या | फल मिलता है और बर्ताव न करनेसे कैसी गति होती है :- ] ( ३१ ) जो श्रद्धावान् ( पुरुष ) दोषोंको न खोजकर मेरे इस मतके अनुसार नित्य बर्ताव करते हैं, वेभी कर्मसे अर्थात् कर्मबंधनसे मुक्त हो जाते हैं। ( ३२ ) परंतु जो दोष-दृष्टिसे शंकाएँ करके मेरे इस मतके अनुसार नहीं बर्तते, उन सर्वज्ञान- विमूढ अर्थात् पक्के मूर्ख अविवेकियोंको नष्ट हुए समझ । | [ निष्काम बुद्धिसे समस्त कर्म करनेके लिये कहनेवाले कर्मयोगकी | श्रेयस्करताके संबंधमें ऊपर अन्वयव्यतिरेकसे जो फलश्रुति बतलाई गई है, उससे | पूर्णतया व्यक्त हो जाता है, कि गीतामें कौनसा विषय प्रतिपाद्य है। इसी कर्म- | योग-निरूपणकी पूर्तिके हेतु भगवान् प्रकृतिकी प्रबलताका और फिर उसे रोकनेके | लिये इंद्रियनिग्रहका वर्णन करते हैं :- ] ( ३३ ) ज्ञानी पुरुषभी अपनी प्रकृतिके अनुसार बर्तता है। सभी प्राणी ( अपनी अपनी ) प्रकृतिके अनुसार रहते हैं, अर्थात् ( वहाँ ) निग्रह जबर्दस्ती क्या करेगी ? ( ३४ ) इंद्रिय और उसके ( शब्द-स्पर्श आदि ) विषयोंमें प्रीति एवं द्वेष ( दोनों ) व्यवस्थित हैं - अर्थात् स्वभावतः निश्चित हैं। इस प्रीति और द्वेषके वशमें न जाना चाहिये; ( क्योंकि ) वे मनुष्यके शत्रु हैं। | [ तैंतीसवें श्लोकके 'निग्रह' शब्दका अर्थ 'निरा संयमन' नहीं है; किंतु | उसका अर्थ 'जबर्दस्ती' अथवा 'हठ' है। इंद्रियोंका योग्य संयमन तो गीताको इष्ट | है; किंतु यहाँपर कहना यह है, कि हठसे या जबर्दस्तीसे इंद्रियोंकी स्वाभाविक | वृत्तियोंकोभी एकदम मार डालना संभव नहीं है। उदाहरण लीजिये; जबतक | देह है, तबतक भूख-प्यास आदि धर्म, प्रकृतिसिद्ध होनेके कारण, छूट नहीं सकते;