श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 717, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें६७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ । मनुष्य कितनाही ज्ञानी क्यों न हो; भूख लगतेही भिक्षा माँगनेके लिये तो उसे ! बाहर निकलनाही पड़ता है; इसलिये चतुर पुरुषका यही कर्तव्य है, कि जबर्दस्तीसे । इंद्रियोंको बिलकुलही मार डालनेका वृथा हठ न करें; और योग्य संयमके द्वारा । उन्हें अपने वशमें करके उनकी स्वभावसिद्ध वृत्तियोंका लोकसंग्रहार्थ उपयोग । किया करे - यही इस श्लोकका भावार्थ है । इसी प्रकार ३४ वें श्लोकके 'व्यवस्थित' । पदसे प्रकट होता है, कि सुख और दुःख, ये दोनों विकार स्वतंत्र हैं, एक दूसरेका । अभाव नहीं है ( गीतारहस्य प्र. ४, पृ. १००, ११५ ) । प्रकृति अर्थात् सृष्टिके । अखंडित व्यापारमें कई बार हमें ऐसी बातेंभी करनी पड़ती हैं, कि जो हमें स्वयं । पसंद नही ( गीता १८. ५९ ); और यदि नहीं करते हैं, तो निर्वाह नहीं होता । । ऐसे समय ज्ञानी पुरुष इन कर्मोंको निरिच्छ-बुद्धिसे केवल कर्तव्य समझकर । करता जाता है और उनके पापपुण्यसे अलिप्त रहता है; और अज्ञानी उन्हींमें । आसक्ति रखकर दुःख पाता है; भाम कविके वर्णनानुसार बुद्धिकी दृष्टिसे यही । इन दोनोंमें बड़ा भारी भेद है। परंतु अब एक और शंका होती है, कि यद्यपि यह । सिद्ध हो गया, कि इंद्रियोंको जबर्दस्ती मारकर कर्मत्याग न करे; किंतु निःसंग- । बुद्धिसे सभी काम करता जावे; परंतु यदि ज्ञानी पुरुष युद्धके समान हिंसात्मक । घोर कर्म करनेकी अपेक्षा खेती, व्यापार या भिक्षा माँगना आदि निरुपद्रवी और । सौम्य कर्म करे, तो क्या अधिक प्रशस्त नहीं है ? भगवान् इसका यह उत्तर । देते है :- ] ( ३५ ) पराये धर्मका आचरण सुखसे करते बने, तोभी उसकी अपेक्षा अपना धर्म अर्थात् चातुर्वर्ण्यविहित कर्मही अधिक श्रेयस्कर है; ( फिर चाहे ) वह विगुण अर्थात् सदोष भलेही हो । स्वधर्मके अनुसार ( वर्तनेमें ) मृत्यु हो जावे, तोभी उसमें कल्याण है, (परंतु) परधर्म भयंकर होता है ! । [ स्वधर्मका अर्थ, वह व्यवसाय है, कि जो स्मृतिकारोंकी चातुर्वर्ण्य- । व्यवस्थाके अनुसार प्रत्येक मनुष्यको शास्त्रद्वारा नियत कर दिया गया है; । स्वधर्मका अर्थ मोक्ष-धर्म नहीं है। सब लोगोंके कल्याणके लिये ही गुण-कर्मके । विभागसे चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाको ( गीता १८. ४१ ) शास्त्रकारोंने प्रवृत्त कर दिया । है, अतएव भगवान् कहते हैं कि ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि, ज्ञानी हो जानेपरभी, । अपना अपना व्यवसाय करते रहें, इसीमें उनका और समाजका कल्याण है । और इस व्यवस्थामें बार बार गड़बड़ करना योग्य नही है ( गीतार. प्र. ११, । पृ. ३३६; प्र. १५, पृ. ४९६) । "तेलीका काम तंबोली करे, दैव न मारे आप