श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ६७३ अर्जुन उवाच । § § अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ श्रीभगवानुवाच । काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥ । मरे " इस प्रचलित लोकोक्तिका भावार्थभी यही है। जहाँ चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाका । चलन नहीं है, वहाँभी सबको यही श्रेयस्कर जंचेगा, कि जिसने सारी जिंदगी । फौजी महकमेमें बिताई हो, यदि फिर काम पड़े, तो उसको सिपाहीका पेशाही । सुभीतेका होगा; न कि दर्जीका रोजगार; और यही न्याय चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके । लियेभी उपयोगी है। यह प्रश्न भिन्न है, कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था भली है या बुरी; । और वह यहाँ उपस्थितभी नहीं होता। यह बात तो निर्विवाद है, कि । समाजका समुचित धारण-पोषण होनेके लिये खेतीके जैसे निरुपद्रवी और । सौम्य व्यवसायकीही भाँति अन्यान्य कर्मभी आवश्यक हैं। अतएव, जहाँ एक । बार किसीभी उद्योग को अंगीकार किया - फिर चाहे उसे चातुर्वर्ण्य- । व्यवस्थाके कारण स्वीकार करो या अपनी मर्जीसे, - कि वह धर्म हो गया। । फिर किसी विशेष अवसरपर उसमें मीन-मेख निकालकर अपना कर्तव्य-कर्म । छोड़ बैठना अच्छा नहीं है; आवश्यकता होनेपर उस व्यवसायमेंही मर । जाना चाहिये ! बस, यही इस श्लोकका भावार्थ है। कोईभी व्यापार या । रोजगार हो; उसमें कुछ-न-कुछ दोष सहजही निकाला जा सकता है (गीता । १८. ४८)। परंतु इस नुक्ताचीनीके मारे अपना नियत कर्तव्यही छोड़ । देना, कुछ धर्म नहीं है। महाभारतके ब्राह्मण-व्याध-संवादमें और तुलाधार- । जाजलि-संवादमेंभी यही तत्त्व बतलाया गया है, एवं वहाँके ३५ वें श्लोकका । पूर्वार्ध मनुस्मृतिमें (मनु. १०. ९७) और गीतामेंभी (गीता १८. ४७) आया । है। भगवानने ३३ वें श्लोकमें कहा है, कि "इंद्रियोंको मारनेका हठ नहीं । चलता।" इसपर अब अर्जुनने पूछा है, कि इंद्रियोंको मारनेका हठ क्यों नहीं । चलता? और अपनी मर्जी न होने परभी मनुष्य बुरे कामोंकी ओर क्यों । घसीटा जाता है ? ] अर्जुनने कहा :- ( ३६ ) हे वाष्र्णेय ( श्रीकृष्ण ) ! अब ( यह बतलाओ, कि) अपनी इच्छा न रहनेपरभी मनुष्य, जबर्दस्तीसे, किसकी प्रेरणासे पाप करता है। श्रीभगवानने कहा :- ( ३७ ) इस विषयमें यह समझ कि रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाला बड़ा पेटू और बड़ा पापी यह काम एवं यह क्रोधही शत्रु है। गी. र. ८३