भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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६७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ आवृतं ज्ञानमेतेने ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥ इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥ तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥ § § इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥ एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ ( ३८ ) जिस प्रकार धुएँसे अग्नि, धूलिसे दर्पण और जेरसे गर्भ ढँका रहता है, उसी प्रकार उससे यह सब ढँका हुआ है । ( ३९ ) हे कौन्तेय ! कभीभी तृप्त न होनेवाला यह कामरूपी अग्निही ज्ञाताका नित्य वैरी है; उसने ज्ञानको और ढँक रखा है । | [ यह मनुकेही कथनका अनुवाद है, मनुने कहा है, कि “ न जातु कामः | कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥” ( मनु. | २. ९४ ) – कामके उपभोगोंसे काम कभी अघाता नहीं है; बल्कि इंधन डालने- | पर अग्नि जैसे बढ़ जाती है, उसी प्रकार यह कामभी अधिकाधिक बढ़ता जाता | है ( गीतार. प्र. ५, पृ. १०६ ) । ] ( ४० ) इंद्रियोंको, मनको, और बुद्धिको इसका अधिष्ठान अर्थात् घर या गढ़ कहते हैं । इनके आश्रयसे ज्ञानको लपेटकर ( ढँककर ) यह मनुष्यको भुलावेमें डाल देता है । ( ४१ ) अतएव हे भरतश्रेष्ठ ! पहले इंद्रियोंका संयम करके ज्ञान ( अध्यात्म ) और विज्ञानका ( विशेष ज्ञान ) नाश करनेवाले इस पापीको तू मार डाल । ( ४२ ) कहा है, कि ( स्थूल बाह्य पदार्थोंके मानसे उनको जाननेवाली ) इंद्रियाँ पर अर्थात् परे हैं, इंद्रियोंके परे मन है, मनसेभी परे ( व्यवसायात्मिका ) बुद्धि है; और जो बुद्धिमेभी परे है, वह आत्मा है । ( ४३ ) हे महाबाहु अर्जुन !