भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 720

तीसरा अध्याय ६७५ इस प्रकार (जो) बुद्धिमे परे है, उसको पहचानकर और अपने आपको रोक करके दुरासाध्य कामरूपी शत्रुको तू मार डाल। | [ कामरूपी आसक्तिको छोड़ कर स्वधर्मके अनुसार लोकसंग्रहार्थ समस्त | कर्म करनेके लिये इंद्रियोंपर अपनी सत्ता होनी चाहिये; बस, यहाँ इतनाही | इंद्रियनिग्रह विवक्षित है। यह अर्थ नहीं है, कि इंद्रियोंको जबर्दस्तीसे एकदम | मार करके सारे कर्म छोड़ दे (गीतार. प्र. ५, पृ. ११५)। गीतारहस्यमें | (परि. पृ. ५२८) दिखलाया है, कि “इंद्रियाणि पराण्याहुः०” इत्यादि ४२ वाँ | श्लोक कठोपनिषदका है; और उसी उपनिषदके अन्य चार-पांच श्लोकभी गीतामें | लिये गये हैं। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारका यह तात्पर्य है, कि बाह्य पदार्थोंके सस्कार | ग्रहण करना इंद्रियोंका काम है, मनका काम इनकी व्यवस्था करना है; और | फिर बुद्धि इनको अलग अलग छाँटती है, एवं आत्मा इन सबसे परे है तथा इन | सबसे भिन्न है। इस विषयका विस्तारपूर्वक विचार गीतारहस्यके छठे प्रकरणके | अंतमें (पृ. १३२-१४९) किया गया है। - कर्मविपाकके ऐसे गूढ़ प्रश्नोंका | विचार, गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृ. २८०-२८७) किया गया है, कि | अपनी इच्छा न रहनेपरभी मनुष्य काम-क्रोध आदि प्रवृत्तिधर्मोंके कारण कोई | काम करनेमें क्योंकर प्रवृत्त हो जाता है; और आत्मस्वतंत्रताके कारण इंद्रिय- | निग्रहरूप साधनके द्वारा इससेभी छुटकारा पानेका मार्ग कैसे मिल जाता है; | इसलिये यहाँ उसकी पुनरुक्ति नहीं की जाती है। गीताके छठे अध्यायमे यह | विचार किया गया है, कि इंद्रियनिग्रह कैसे करना चाहिये।] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए-अर्थात् कहे हुए-उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त हुआ।