श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चतुर्थोऽध्यायः। श्रीभगवानुवाच। इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥ एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥ २ ॥ स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥ चौथा अध्याय [कर्म किसीके छूटते नहीं हैं, इसलिये बुद्धि निष्काम हो जानेपरभी कर्म करनाही चाहिये; कर्मके मानेही यज्ञयाग आदि कर्म हैं; पर मीमांसकोंके ये कर्म स्वर्गप्रद हैं, अतएव एक प्रकारसे बंधक हैं; इस कारण इन्हें आसक्ति छोड़ करके करना चाहिये। ज्ञानसे स्वार्थबुद्धि छूट जावे, तोभी कर्म छूटते नहीं हैं, अतएव ज्ञाताकोभी निष्काम कर्म करनेही चाहिये; लोकसंग्रहके लिये वे आवश्यक हैं; इत्यादि प्रकारसे अब तक कर्मयोगका जो विवेचन किया गया, उसीको इस अध्यायमे दृढ़ किया है। कहीं यह शंका न हो, कि आयुष्य बितानेका यह मार्ग अर्थात् निष्ठा अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये नई बतलाई गई है; एतदर्थ इस मार्गकी प्राचीन गुरुपरंपरा पहले बतलाते हैं:-] श्रीभगवानने कहा :- (१) अव्यय अर्थात् कभीभी क्षीण न होनेवाला अथवा त्रिकालमेंभी अबाधित और नित्य यह (कर्म-) योग (-मार्ग) मैने विवस्वान् अर्थात् सूर्यको बतलाया था; विवस्वानने (अपने पुत्र) मनुको और मनुने (अपने पुत्र) इक्ष्वाकुको बतलाया। (२) ऐसी परंपरासे प्राप्त हुए इसको (योग) राजर्षियोंने जाना। परंतु हे शत्रुतापन (अर्जुन)! दीर्घकालके अनन्तर वही योग इस लोकमें नष्ट हो गया। (३) (सब रहस्योंमेंसे) उत्तम रहस्य समझकर उस पुरातन योगको, (कर्मयोगमार्ग) मैने तुझे आज इसलिये बतला दिया, कि तू मेरा भक्त और सखा है। [गीतारहस्यके तीसरे प्रकरणमे (पृ. ५६-६५) हमने सिद्ध किया है, कि इन तीनों श्लोकोंमें 'योग' शब्दसे, आयु बितानेके उन दोनों मार्गोंमेंसे -