भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 722, कुल 956 में से

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पृष्ठ 722

चौथा अध्याय ६७७ | कि जिन्हें सांख्य और योग कहते हैं, - योग अर्थात् कर्मयोग याने साम्य-बुद्धिसे | कर्म करनेका मार्ग अभिप्रेत है। गीताके इस मार्गकी जो परंपरा ऊपरके | श्लोकमें बतलाई गई है, वह यद्यपि इस मार्गकी जड़को समझनेके लिये अत्यंत | महत्त्वकी है, तथापि टीकाकारोंने उसकी विशेष चर्चा नहीं की है - महाभारतके | अंतर्गत नारायणीयोपाख्यानमें भागवत धर्मका जो निरूपण है, उसमें जनमेजयसे | वैशंपायन कहते हैं, कि यह धर्म पहले श्वेतद्वीपमें भगवान्सेही - | नारदेन तु सम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः । | एष धर्मो जगन्नाथात्साक्षान्नारायणान्नृप ॥ | एवमेष महान्धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम । | कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ | “नारदको प्राप्त हुआ, और हे राजा ! वही महान् धर्म तुझे पहले हरिगीता | अर्थात् भगवद्गीतामें समासविधिसहित बतलाया है” (मभा. शां. ३४६. ९, | १०)। और फिर आगे कहा है, कि “युद्धमें विमनस्क हुए अर्जुनको यह धर्म | बतलाया गया है” (मभा. शां. ३४८. ८)। इससे प्रकट होता है, कि गीताका | योग अर्थात् कर्मयोग भागवत धर्मका है (गीतार. प्र. १, पृ. ८-११)। विस्तार | हो जानेके भयसे गीतामे उसकी संप्रदाय-परंपरा सृष्टिके मूल आरंभसे नहीं दी | है; विवस्वान्, मनु और इक्ष्वाकु, इन्हीं तीनोंका उल्लेख कर दिया है। परंतु | इसका सच्चा अर्थ नारायणीय धर्मकी समस्त परंपरा देखनेसे स्पष्ट मालूम हो | जाता है। ब्रह्माके कुल सात जन्म हैं। इनमेंसे पहले छः जन्मोंकी नारायणीय | धर्ममें कथित, परंपराका वर्णन हो चुकनेपर, जब ब्रह्माके सातवें, अर्थात् वर्तमान, | जन्मका कृतयुग समाप्त हुआ, तब - | त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान्मनवे ददौ । | मनुश्च लोकभृत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ ॥ | इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः । | गमिष्यति क्षयान्ते च पुनर्नारायणं नृप ॥ | यतीनां चापि यो धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम । | कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ | “त्रेतायुगके आरंभमें विवस्वानने मनुको (वह धर्म) दिया, मनुने लोक- | धारणार्थ वह अपने पुत्र इक्ष्वाकुको दिया; और आगे इक्ष्वाकुसे सब लोगोंमें फैल | गया। हे राजा ! सृष्टिका क्षय होनेपर (यह धर्म) फिर नारायणके यहाँ चला | जावेगा। यह धर्म और ‘यतीनां चापि’ अर्थात् इसके साथही संन्यास-धर्मभी | पहले तुझमे भगवद्गीतामें कह दिया है’ - ऐसा नारायणीय धर्ममेंही वैशंपायनने | जनमेजयसे फिर कहा है (मभा. शां. ३४८. ५१-५३)। इससे दीख पड़ता है, | कि जिस द्वापरयुगके अंतमें भारतीय युद्ध हुआ था, उससे पहलेके त्रेतायुगभर-

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