भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 723

६७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अर्जुन उवाच । § § अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ ४ ॥ । कीही भागवतधर्मकी परंपरा गीतामें वर्णित है, विस्तारभयसे अधिक वर्णन । नहीं किया है। यह भागवत धर्मही योग या कर्मयोग है; और मनुको कर्मयोगके । उपदेश किये जानेकी यह कथा न केवल गीतामेंही है; प्रत्युत भागवत-पुराण- । मेंभी (भाग. ८. २४. ५५) इस कथाका उल्लेख है और मत्स्य-पुराणके ५२ वें । अध्यायमें मनुको उपदिष्ट कर्मयोगका महत्त्वभी बतलाया गया है। परंतु इनमेंसे । कोईभी वर्णन नारायणीयोपाख्यानमें किये गये वर्णनके समान पूर्ण नहीं है। । विवस्वान् - मनु - इक्ष्वाकुकी यह परंपरा सांख्य-मार्गको बिलकुलही उपयुक्त । नहीं होती; और सांख्य एवं योग, इन दोनोंके अतिरिक्त तीसरी निष्ठा गीतामें । वर्णितही नहीं है। इस बातपर ध्यान देनेसे दूसरी रीतिसेभी सिद्ध होता है, कि ! यह परंपरा कर्मयोगकीही है ( गीता २. ३९ ) । परंतु सांख्य और योग, इन । दोनों निष्ठाओंकी परंपरा यद्यपि एक न हो तोभी कर्मयोग अर्थात् भागवत । धर्मके निरूपणमेंही सांख्य या संन्यास-निष्ठाके निरूपणका पर्यायमें समावेश हो । जाता है ( गीतारहस्य प्र. १४, पृ. ४६९ ) । इस कारण वैशंपायनने कहा है, । कि भगवद्गीतामें यति-धर्म अर्थात् संन्यास-धर्मभी वर्णित है। मनुस्मृतिमें चार । आश्रम-धर्मोंका जो वर्णन है, उसके छठे अध्यायमें पहले यति अर्थात् संन्यास । आश्रमका धर्म कह चुकनेपर विकल्पसे 'वेदसंन्यासियोंका कर्मयोग' इस नामसे । गीता या भागवत धर्मके कर्मयोगका वर्णन है; और स्पष्ट कहा है कि । "निःस्पृहतासे अपना कार्य करते रहनेसेही अंतमें परम सिद्धि मिलती है" । (मनु. ६. ९६); इससे स्पष्ट दीख पड़ता है, कि कर्मयोग मनुकोभी ग्राह्य था। । इसी प्रकार अन्य स्मृतिकारोंकोभी यह मान्य था; और इस विषयके अनेक । प्रमाण गीतारहस्यके ११ वें प्रकरणके अंतमें ( पृ. ३६२-३६७ ) दिये गये हैं। । अब अर्जुनको इस परंपरापर यह शंका है, कि -- ] अर्जुनने कहा :- (४) तुम्हारा जन्म तो अभी हुआ है; और विवस्वानका इससे बहुत पहले हो चुका है; ( ऐसी दशामें ) मैं यह कैसे जानूँ, कि तुमने ( यह योग ) पहले बतलाया था ? । [ अर्जुनके इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् अपने अवतारोंके कार्योंका । वर्णनकर आसक्तिविरहित कर्मयोग या भागवत धर्मकाही अब फिर समर्थन ! करते हैं, " कि इस प्रकार मैंभी कर्मोंको करता आ रहा हूँ" :- ]