श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ६७९ श्रीभगवानुवाच । बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥ ५ ॥ अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ६ ॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ७ ॥ श्रीभगवानने कहा :- ( ५ ) हे अर्जुन ! मेरे और तेरे अनेक जन्म हो चुके हैं । उन सबको मैं जानता हूँ; (और ) हे परंतप ! तू नहीं जानता ( यही भेद है )। ( ६ ) मैं ( सब ) प्राणियोंका स्वामी और जन्मविरहित हूँ और, यद्यपि मेरे आत्मस्वरूपमें कभीभी व्यय अर्थात् विकार नहीं होता, तथापि अपनीही प्रकृतिमें अधिष्ठित होकर मैं अपनी मायासे जन्म लिया करता हूँ। | [इस श्लोकके अध्यात्मज्ञानमें कापिल-सांख्य और वेदान्त, इन दोनों | मतोंकाही मेलकर दिया गया है। सांख्य-मतवालोंका कथन है, कि प्रकृति आप-ही | सृष्टि निर्माण करती है। परंतु वेदांती लोग प्रकृतिको परमेश्वरकाही एक स्वरूप | समझकर यह मानते हैं, कि प्रकृतिमें परमेश्वरके अधिष्ठित होनेपर प्रकृतिसे | व्यक्त-सृष्टि निर्मित होती है। अपने अव्यक्त स्वरूपसे सारे जगतको निर्माण | करनेकी परमेश्वरकी इस अचिंत्य शक्तिकोही गीतामें 'माया' कहा है; और | इसी प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषदमेंभी ऐसा वर्णन है :- “ मायां तु प्रकृतिं विद्या- । न्मायिनं तु महेश्वरम् । " अर्थात् प्रकृतिही माया है; और उस मायाका अधिपति | परमेश्वर है ( श्वे. ४. १० ); और " अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् " - इससे | मायाका अधिपति सृष्टि उत्पन्न करता है ( श्वे. ४.१० ) । प्रकृतिको माया | क्यों कहते हैं, इस मायाका स्वरूप क्या है, और इस कथनका क्या अर्थ है, कि | मायासे सृष्टि उत्पन्न होती है ? - इत्यादि प्रश्नोंका अधिक विवरण गीतारहस्यके | ९ वें प्रकरणमें दिया गया है। यह बतला दिया, कि अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त | कैसे होता है अर्थात् कर्म उपजा हुआ-सा कैसे दीख पड़ता है; अब इस बातका | स्पष्टीकरण करते हैं, कि वह ऐसा कब और किसलिये करता है :- ] ( ७ ) हे भारत ! जब-जब धर्मकी ग्लानि होती है और अधर्मकी प्रबलता फैल जाती है, तब-तब मैं स्वयं ही जन्म ( अवतार ) लिया करता हूँ।