भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 725

६८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८ ॥ § § जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥ वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ १० ॥ (८) साधुओंकी संरक्षाके निमित्त और दुष्टोंका नाश करनेके लिये, युग-युगमें धर्मसंस्थापनाके अर्थ मैं जन्म लिया करता हूँ । [ इन दोनों श्लोकोंमें 'धर्म' शब्दका अर्थ केवल पारलौकिक वैदिक धर्म नहीं है; किंतु चारों वर्णोंके धर्म, न्याय और नीति प्रभृति बातोंकाभी उसमें मुख्यतासे समावेश होता है । इस श्लोकका तात्पर्य यह है, कि जगत्में जब अन्याय, अनीति, दुष्टता और अंधाधुंधी मचकर साधुओंको कष्ट होने लगता है और जब दुष्टोंका दबदबा बढ़ जाता है, तब अपने निर्माण किये हुए जगत्की सुस्थितिको स्थिर रखकर, उसका कल्याण करनेके लिये तेजस्वी और पराक्रमी पुरुषके रूपसे (गीता १०. ४१) अवतार लेकर भगवान् समाजकी बिगड़ी हुई व्यवस्थाको फिर ठीक कर दिया करते हैं । इस रीतिसे अवतार ले कर भगवान् जो काम करते हैं, उसीको 'लोकसंग्रह' भी कहते हैं; और पिछले अध्यायमें कह दिया गया है, कि यही काम अपनी शक्ति और अधिकारके अनुसार आत्मज्ञानी पुरुषोंकोभी करना चाहिये (गीता ३. २०) । यह बतला दिया गया, कि परमेश्वर कब और किसलिये अवतार लेता है । अब यह बतलाते हैं, कि इस तत्त्वको परख कर जो पुरुष तदनुसार बर्ताव करते हैं, उनको कौनसी गति मिलती है :- ] (९) हे अर्जुन ! इस प्रकारके मेरे दिव्य जन्म और दिव्य कर्मके तत्त्वको जो जानता है, वह देह त्यागनेके पश्चात् फिर जन्म न लेकर मुझमें आ मिलता है । (१०) प्रीति, भय और क्रोधसे छूटे हुए, मत्परायण और मेरे आश्रयमें आये हुए अनेक लोग (इस प्रकार) ज्ञानरूप तपसे शुद्ध होकर मेरे स्वरूपमें आकर मिल गये हैं। [ भगवानके दिव्य जन्मको समझनेके लिये यह जानना पड़ता है, कि अव्यक्त परमेश्वर मायासे सगुण कैसे होता है; और इसके जान लेनेसे अध्यात्मज्ञान हो जाता है; एवं दिव्य कर्मको जान लेनेपर कर्म करकेभी अलिप्त रहनेका, अर्थात् निष्काम कर्मके तत्त्वका, ज्ञान हो जाता है । सारांश, परमेश्वरके दिव्य जन्म और दिव्य कर्मको पूरा पूरा जान लेनेपर, अध्यात्मज्ञान और कर्मयोग