श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ६८१ § § ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥ काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥ । इन दोनोंकीभी पूरी पहचान हो जाती है; और मोक्षकी प्राप्तिके लिये इसीकी । आवश्यकता होनेके कारण ऐसे मनुष्यको अंतमें भगवत्प्राप्ति हुए बिना नहीं । रहती। अर्थात् भगवान्के दिव्य जन्म और दिव्य कर्म जान लेनेमें सब कुछ आ । गया; फिर अध्यात्मज्ञान अथवा निष्काम कर्मयोग, इन दोनोंकाभी अलग अलग । अध्ययन नहीं करना पड़ता। अतएव वक्तव्य यह है, कि भगवानके जन्म और । कृत्यका विचार करो; एवं उसके तत्त्वको परखकर बर्ताव करो; भगवत्प्राप्ति । होनेके लिये दूसरा कोई साधन अपेक्षित नहीं है। भगवान्की यही सच्ची । उपासना है। अब इसकी अपेक्षा नीचेके दर्जेकी उपासनाओंके फल और उपयोग । बतलाते हैं :- ] (११) जो मुझे जिस प्रकारसे भजते हैं, उन्हें मैं उसी प्रकारके फल देता हूँ। हे पार्थ! किसीभी ओरसे हो, मनुष्य मेरेही मार्गमें आ मिलते हैं। । [ "मम वर्त्मानुवर्तन्ते " इत्यादि उत्तरार्ध पहले (गी. ३. २३) कुछ । निराले अर्थमें आया है; और इससे ध्यानमें आवेगा, कि गीतामें पूर्वापर संदर्भके । अनुसार अर्थ कैसे बदल जाता है; यद्यपि यह सच है, कि किसीभी मार्गसे जानेपर । मनुष्य परमेश्वरकीही ओर जाता है; तोभी यह जानना चाहिये, कि अनेक । लोग अनेक मार्गोंसे क्यों जाते हैं? अब इसका कारण बतलाते हैं :- ] (१२) (कर्मबंधनके नाशकी नहीं, केवल) कर्मफलकी इच्छा करनेवाले लोग इस लोकमें देवताओंकी पूजा इसलिये किया करते हैं, कि (ये) कर्मफल (इस) मनुष्यलोकमें शीघ्रही मिल जाते हैं। । [यही विचार सातवें अध्याय में (गीता ७. २१, २२) फिर आये हैं, । परमेश्वरकी आराधनाका सच्चा फल है मोक्ष, परंतु वह तभी प्राप्त होता है, । कि जब कालांतरसे एवं दीर्घ और एकान्त उपासनासे कर्मबंधका पूर्ण नाश हो । जाता है; परंतु इतने दूरदर्शी और दीर्घ-उद्योगी पुरुष बहुतही थोड़े होते हैं। । इस श्लोकका भावार्थ यह है कि बहुतेरोंको अपने उद्योग अर्थात् कर्मसे इसी । लोकमें कुछ-न-कुछ प्राप्त करना होता है, और ऐसेही लोग देवताओंकी पूजा । किया करते हैं (गीतार. प्र. १३, पृ. ४०८)। गीताका यहभी कथन है, कि । पर्यायसे यहभी तो परमेश्वरकाही पूजन होता है; और बढ़ते बढ़ते इस योगका । पर्यवसान निष्काम भक्तिमें होकर अंतमें मोक्ष प्राप्त हो जाता है (गीता