भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 727, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 727

६८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥ न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥ | ७.१९)। पहले कह चुके हैं, कि धर्मकी संस्थापना करनेके लिये परमेश्वर | अवतार लेता है, अब संक्षेपमें बतलाते हैं, कि धर्मकी संस्थापना करनेके लिये | क्या करना पड़ता है :- ] (१३) (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इस प्रकार) चारों वर्णोंकी व्यवस्था गुण और कर्मके भेदके अनुसार मैंनेही निर्माण की है। इसे तू ध्यानमें रख, कि मैं उसका कर्ताभी हूँ; और अकर्ता अर्थात् उसे न करनेवाला अव्यय (मेंही) हूँ। | [ अर्थ यह है, कि परमेश्वर कर्ता भलेही हो; पर अगले श्लोकके वर्णना- | नुसार वह सदैव निःसंग है, इस कारण अकर्ता ही है (गीता ५.१४)। | परमेश्वरके स्वरूपके "सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्" ऐसे दूसरेभी | विरोधाभासात्मक वर्णन आगे हैं (गीता १३.१४)। चातुर्वर्ण्यके गुण और | भेदका निरूपण आगे अठारहवें अध्यायमें (गी. १८.४१-४९) किया गया है। | अब भगवानने "करके न करनेवाला" ऐसा जो अपना वर्णन किया है, उसका | मर्म बतलाते हैं :- ] (१४) मुझे कर्मका लेप अर्थात् बाधा नहीं होती; (क्योंकि) कर्मके फलमें मेरी इच्छा नहीं हैं – जो मुझे इस प्रकार जानता है, उसे कर्मकी बाधा नहीं होती। | [ ऊपर नवम श्लोकमें जो दो बातें कही हैं, कि मेरे 'जन्म' और 'कर्म'को | जो जानता है, वह मुक्त हो जाता है, उन्हींमेंसे कर्मके तत्त्वका स्पष्टीकरण | इस श्लोकमें किया है। 'जानता' है शब्दसे यहाँ "जान कर तदनुसार बर्तने | लगता है" इतना अर्थ विवक्षित है। भावार्थ यह है, कि भगवानको उनके | कर्मकी बाधा नहीं होती, इसका यह कारण है, कि वे फलाशा रखकर कामही | नहीं करते; और इसे जान कर तदनुसार जो बर्तता है, उसको कर्मोंका बंधन | नहीं होता। अब इस श्लोकके सिद्धान्तकोही प्रत्यक्ष उदाहरणसे दृढ़ करते हैं :- ] (१५) इसे जान कर प्राचीन समयके मुमुक्षु लोगोंनेभी कर्म किया था; इसलिये पूर्वके लोगोंके किये हुए अति प्राचीन कर्मही तू कर। | [ इस प्रकार मोक्ष और कर्मका विरोध नही है, अतएव अर्जुनको निश्चित

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 727, कुल 956 में से · BharatKosha