भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 728

चौथा अध्याय ६८३ § § किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥ कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥ कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥ । उपदेश किया है, कि तू कर्म कर । परंतु इसपर यह शंका होती है, कि संन्यास- । मार्गवालोंका जो यह कथन है, कि "कर्मोंके छोड़नेसे अर्थात् अकर्मसेही मोक्ष । मिलता है।" उस कथनका बीज क्या है ? अतएव अब कर्म और अकर्मके । विवेचनका आरंभ करके आगे तेईसवें श्लोकमें सिद्धान्त करते हैं, कि अकर्म । कुछ कर्मत्याग नहीं है; निष्काम कर्मकोही अकर्म कहना चाहिये ।] (१६) इस विषयमें बड़े बड़े विद्वानोंकोभी भ्रम हो जाता है, कि कौन कर्म है और कौन अकर्म ? (अतएव) वैसा कर्म तुझे बतलाता हूँ, कि जिसे जान लेनेसे तू पापसे मुक्त होगा। । ['अकर्म' नञ् समास है और व्याकरणकी रीतिसे उसके अ = नञ् शब्दके । 'अभाव' अथवा 'अप्राशस्त्य' ये दोनों अर्थ हो सकते हैं; और यह नहीं कह । सकते, कि इस स्थलपर ये दोनोंभी अर्थ विवक्षित न होंगे, परंतु अगले श्लोकमें । 'विकर्म' नामसे कर्मका एक और तीसरा भेद किया है। अतएव इस श्लोकमें । अकर्म शब्दसे विशेषतः वही कर्मत्याग उद्दिष्ट है, जिसे संन्यास-मार्गवाले । लोग "कर्मका स्वरूपतः त्याग" कहते हैं। संन्यास-मार्गवाले कहते हैं, कि । "सब कर्म छोड़ दो"; परंतु १८ वें श्लोककी टिप्पणीसे दीख पड़ेगा, कि इस । बातको दिखलानेके लियेही यह विवेचन किया गया है, कि कर्मको सर्वथा त्याग । देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, संन्यास-मार्गवालोंका कर्मत्याग सच्चा 'अकर्म' । नहीं है, अकर्मका मर्म कुछ औरही है।] (१७) कर्मकी गति गहन है; (अतएव) यह जान लेना चाहिये, कि कर्म क्या है, और यह समझना चाहिये, कि विकर्म (विपरीत कर्म) क्या है; और यहभी ज्ञात कर लेना चाहिये, कि अकर्म (कर्म न करना) क्या है? (१८) कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म जिसे दीख पड़ता है, वह पुरुष सब मनुष्योंमें ज्ञानी है; और वही युक्त अर्थात् योगयुक्त एवं समस्त कर्म करनेवाला है। । [इस श्लोकमें और अगले पाँच श्लोकोंमें अकर्म एवं विकर्मका । स्पष्टीकरण किया गया है, और इसमें जो कुछ कमी रह गई है, उसे आगे