श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अठारहवें अध्यायमें कर्मत्याग, कर्म और कर्ताके विविध भेद-वर्णनमें पूरा कर दिया है ( गीता १८. ७-९; १८. २३-२५; १८. २६-२८) । यहाँ संक्षेपमें स्पष्टतापूर्वक यह बतला देना आवश्यक है, कि दोनों स्थलोंके कर्म-विवेचनसे कर्म, अकर्म और विकर्मके संबंधमें गीताके सिद्धान्त क्या हैं; क्योंकि, टीकाकारोने इस संबंधमें बड़ी गड़बड़ कर दी है। संन्यास-मार्गवालोंको सब कर्मोंका स्वरूपतः त्याग इष्ट है, इसलिये वे गीताके 'अकर्म' पदका अर्थ खींचातानीसे अपने मार्गकी ओर लाना चाहते हैं; मीमांसकोंको यज्ञयाग आदि काम्य कर्म इष्ट हैं, इसलिये उनके अतिरिक्त और सभी कर्म उन्हें 'विकर्म' जँचते हैं। इसके सिवा मीमांसकोंके नित्यनैमित्तिक आदि कर्मभेदभी उसीमें आ जाते हैं; और फिर धर्मशास्त्री उसीमें अपनी ढाई चावलकी खिचडी पकानेकी इच्छा रखते हैं। सारांश, चारों ओरसे ऐसी खींचातानी होनेके कारण, अंतमें यह जान लेना कठिन हो जाता है, कि गीता 'अकर्म' किसे कहती है और 'विकर्म' किसे ? अतएव पहलेसेही इस बातपर ध्यान दिये रहना चाहिये, कि गीतामें जिस तात्त्विक दृष्टिसे इस प्रश्नका विचार किया गया है, वह दृष्टि निष्काम कर्म करनेवाले कर्मयोगीकी है; काम्य-कर्म करनेवाले मीमांसकोंकी या कर्म छोड़नेवाले संन्यासमार्गियोंकी नहीं है। गीताकी इस दृष्टिको स्वीकार कर लेने पर तो यही कहना पड़ता है, कि 'कर्म-शून्यता' के अर्थमें 'अकर्म' इस जगतमें कहींभी नहीं रह सकता अथवा कोईभी मनुष्य कभी कर्म- शून्य नहीं हो सकता ( गीता ३.५; १८.११); क्योंकि सोना, उठना, बैठना और कम-से-कम जीवित रहना तो किसीकाभी छूट नहीं जाता। और यदि कर्म- शून्य होना संभव नहीं है, तो निश्चय करना पड़ता है, कि अकर्म कहें किसे ? इसके लिये गीताका यह उत्तर है, कि कर्मको निरी क्रिया न समझकर उससे आगे होनेवाले शुभ-अशुभ आदि परिणामोंका विचार करके, कर्मका कर्मत्व या अकर्मत्व निश्चित करो। यदि सृष्टिके मानेही कर्म है, तो मनुष्य जबतक सृष्टिमें है, तब तक उससे कर्म नहीं छूटता। अतः कर्म और अकर्मका जो विचार करना हो, वह इसी दृष्टिसे करना चाहिये, कि मनुष्यको वह कर्म कहाँ तक बद्ध करेगा। करने परभी जो कर्म हमें बद्ध नहीं करता, उसके विषयमें कहना चाहिये, कि उसका कर्मत्व अथवा बंधकत्व नष्ट हो गया; और यदि किसीभी कर्मका बंधकत्व अर्थात् कर्मत्व इस प्रकार नष्ट हो गया हो, तो फिर वह कर्म 'अकर्म' ही हुआ। अकर्मका प्रचलित सांसारिक अर्थ कर्मशून्यता है सही, परंतु शास्त्रीय दृष्टिसे विचार करनेपर उसका यहाँ मेल नहीं मिलता। क्योंकि हम देखते हैं, कि चुपचाप बैठना अर्थात् कर्म न करनाभी कई बार कर्मही हो जाता है। उदाहरणार्थ, अपने माँ-बापको कोई मारता-पीटता हो, तो उसको न रोक- कर चुप्पी साधे बैठे रहना, उस समय यदि व्यावहारिक दृष्टिसे अकर्म अर्थात् कर्म-शून्यता हो तोभी वह कर्मही, - संभवतः विकर्म - है; और कर्मविपाककी