भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

६६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ २० ॥ नहीं; किंतु गणेशगीतामेंभी इसी अर्थके प्रतिपादनमें यह श्लोक आया है :- किंचिदस्य न साध्यं स्यात्सर्वजन्तुषु सर्वदः । अतोऽसक्ततया भूप कर्तव्यं कर्म जन्तुभिः ॥ “उसका अन्य प्राणियोंमें कोई साध्य (प्रयोजन) शेष नहीं रहता; अतएव हे राजन्! लोगोंको अपना अपना कर्तव्य आसक्तबुद्धिसे करते रहना चाहिये” (गणेशगीता २. १८) । इन सब उदाहरणोंपर ध्यान देनेसे ज्ञात होगा, कि यहांपर गीता तीनों श्लोकोंका जो कार्यकारण-संबंध हमने ऊपर दिखलाया है, वही ठीक है। और गीताके तीनों श्लोकोंका पूरा अर्थ योगवासिष्ठके एक ही श्लोकमें आ गया है। अतएव उसके कार्यकारणभावके विषयमें शंका करनेके लिये स्थानही नहीं रह जाता। गीताकी इन्हीं युक्तियोंको महायान-पंथके बौद्ध ग्रंथकारोंनेभी पीछेसे ले लिया है (गीतारहस्य परिशिष्ट पृ. ५६८- ५६९, ५८२-५८३)। ऊपर जो यह कहा गया है, कि स्वार्थ न रहनेके कारणसेही ज्ञानी पुरुषको अपना कर्तव्य निष्काम बुद्धिसे करना चाहिये; और इस प्रकारसे किये हुए निष्काम कर्मका मोक्षमें बाधक होना तो दूर रहा, उसीसे सिद्धि मिलती है - इसीकी पुष्टिके लिये अब दृष्टान्त देते हैं :- ] (२०) जनक आदिनेभी इस प्रकार कर्मसेही सिद्धि पाई है। इसी प्रकार लोक- संग्रहपर दृष्टि देकरभी तुझे कर्म करनाही उचित है। [इस श्लोकके पहले चरणमें इस बातका उदाहरण दिया है, कि निष्काम कर्मोंसे सिद्धि मिलती है; और दूसरे चरणसे भिन्न रीतिके प्रतिपादनका आरंभ कर दिया है। यह तो सिद्ध किया, कि ज्ञानी पुरुषका लोगोंमे कुछ अटका नहीं रहता; तोभी जब उसका कर्म छूटही नहीं सकता, तब तो उसे निष्काम कर्मही करना चाहिये। परंतु यद्यपि यह युक्ति नियमसंगत है, कि कर्म जब छूट नहीं सकता है, तब उन्हें करनाही चाहिये । तथापि सिर्फ इसीसे साधारण मनुष्योंका पूरा पूरा विश्वास नहीं हो जाता। मनमें शंका होती है, कि क्या कर्म टाले नहीं टलते हैं, इसीलिये उसे करना चाहिये ? उसमें और कोई साध्य नहीं है? अतएव इस श्लोकके दूसरे चरणसे यह दिखलानेका आरंभ कर दिया है, कि इस जगतमें अपने कर्मसे लोकसंग्रह करना ज्ञानी पुरुषका एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रत्यक्ष साध्य है। 'लोकसंग्रहमेवापि' के 'एवापि' पदका यही तात्पर्य है। और इससे स्पष्ट होता है, कि अब भिन्न रीतिके प्रतिपादनका आरंभ हो गया है। 'लोकसंग्रह' शब्दमें 'लोक'का अर्थ व्यापक है; अतः इस शब्दमें न केवल मनुष्यजातिकोही, वरन् सारे जगतको सन्मार्गपर लाकर, उसको नाशसे

तीसरा अध्याय ६६७ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २३ ॥ बचाते हुए संग्रह करना – अर्थात् भली भाँति धारण, पोषण-पालन या बचाव करना इत्यादि सभी बातोंका समावेश हो जाता है। गीतारहस्यके ग्यारहवें प्रकरण (पृ. ३३०-३३८) में इन बातोंका विस्तृत विचार किया गया है, इसलिये हम यहाँ उसकी पुनरुक्ति नहीं करते। अब पहले यह बतलाते हैं, कि लोकसंग्रह करनेका यह कर्तव्य या अधिकार ज्ञानी पुरुषकाही क्यों है :-] (२१) श्रेष्ठ (अर्थात् आत्मज्ञानी कर्मयोगी) पुरुष जो कुछ करता है, वही अन्य अर्थात् साधारण मनुष्यभी किया करते हैं। वह जिसे प्रमाण मानकर अंगीकार करता है, लोग उसीका अनुकरण करते हैं। [ तैत्तिरीय उपनिषदमेंभी पहले 'सत्यं वद', 'धर्मं चर' इत्यादि उपदेश किया है और फिर अंतमें कहा है, कि "जब तुम्हें संदेह हो कि यहाँ संसारमें किसी प्रसंगपर कैसे बर्ताव करें, तब वैसेही बर्ताव करो, कि जैसा ज्ञानी, युक्त और धर्मिष्ठ ब्राह्मण करते हों" (तै. १.११.४)। इसी अर्थका एक श्लोक नारायणीय धर्ममेंभी है (मभा. शां. ३४१.२५); और इसी आशयका मराठीमें श्रीरामदास स्वामीजीका जो एक श्लोक है, वह इसीका अनुवाद है। और जिसका सार यह है:- "लोककल्याणकारी मनुष्य जैसे बर्ताव करता है वैसेही, इस संसारमें, सब लोगभी किया करते हैं।" यही भाव इस प्रकार प्रकट किया जा सकता है – "देख भलोंकी चालको, वर्तें सब संसार।" रामदास स्वामीजीका यह लोककल्याणकारी पुरुषही गीताका श्रेष्ठ कर्मयोगी है। श्रेष्ठ शब्दका अर्थ "आत्मज्ञानी संन्यासी" नहीं है (गीता ५.२)। अब भगवान् स्वयं अपना उदाहरण देकर इसी अर्थको औरभी दृढ़ करते हैं, कि आत्मज्ञानी पुरुषकी स्वार्थबुद्धि छूट जानेपरभी, लोककल्याणके कर्म उससे छूट नहीं जाते :-] (२२) हे पार्थ! (देखो, कि) त्रिभुवनमें न तो (मेरा) कुछ कर्तव्य (शेष) रहा है, (और) न कोई अप्राप्त वस्तु प्राप्त करनेको (रह गई) है; तोभी मैं कर्म करताही रहता हूँ। (२३) क्योंकि यदि मैं कदाचित् आलस्य छोड़कर कर्मोंमें न बर्तुंगा, तो हे पार्थ! सब मनुष्य सब प्रकारसे मेरेही पथका अनुकरण करेंगे।

६६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४ § § सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ २५ ॥ न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६ ॥ ( २४ ) यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सारे लोक उत्सन्न अर्थात् नष्ट हो जावेंगे, मैं संकरकर्ता होऊँगा और इन प्रजाजनोंका मेरे हाथसे नाश होगा । । [ भगवानने अपना उदाहरण देकर इस श्लोकमें भली भाँति स्पष्ट कर । दिखला दिया है, कि लोकसंग्रह कुछ पाखंड नहीं है । इसी प्रकार हमने ऊपर १७ । से १९ वे श्लोकका जो यह अर्थ किया है, कि ज्ञान प्राप्त हो जानेपर ज्ञाताका । कुछ कर्तव्य भलेही न रह गया हो; फिरभी निष्काम बुद्धिसे सारे कर्म उसे करते । रहना चाहिये, वहभी स्वयं भगवानके इस दृष्टान्तसे पूर्णतया सिद्ध हो जाता है । । यदि ऐसा न हो, तो यहही दृष्टान्त निरर्थक हो जायगा ( गीतार. प्र. ११, । पृ. ३२४-३२५ ) । सांख्य-मार्ग और कर्म-मार्गमें यह बड़ा भारी भेद है, कि । सांख्यमार्गके ज्ञानी पुरुष सारे कर्म छोड़ बैठते हैं, फिर चाहे इस कर्मत्यागसे । यज्ञचक्र डूब जाय और जगतका कुछभी हुआ करे - उन्हें उसकी परवाह नहीं । होती; और कर्ममार्गके ज्ञानी पुरुष; स्वयं अपने लिये आवश्यक न भी हो, तोभी । लोकसंग्रहको महत्त्वपूर्ण आवश्यक साध्य समझकर, तदर्थ अपने धर्मके अनुसार, । अपने सारे काम किया करते हैं ( गीतारहस्य प्र. ११, पृ. ३५५-३५८ ) । । यह बतला दिया गया, कि स्वयं भगवान क्या करते हैं । अब ज्ञानियों और । अज्ञानियोंके कर्मोंका भेद दिखलाकर बतलाते हैं, कि अज्ञानियोंको सुधारनेके । लिये ज्ञाताका आवश्यक कर्तव्य क्या है :- ] ( २५ ) हे अर्जुन ! ( इसलिये ) लोकसंग्रह करनेकी इच्छा रखनेवाले ज्ञानी पुरुषकोभी आसक्ति छोड़कर उसी प्रकार बर्तना चाहिये, जिस प्रकार कि ( व्यावहारिक ) कर्मोंमें आसक्त अज्ञानी लोग बर्ताव करते हैं । ( २६ ) कर्ममें आसक्त अज्ञानियोंकी बुद्धिमें ज्ञानी पुरुष भेद-भाव उत्पन्न न करे; ( आप स्वयं ) युक्त अर्थात् योगयुक्त हो कर सभी काम करे; और लोगोंसे खुशीसे करावे । । [ इस श्लोकका अर्थ यह है, कि अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भेदभाव उत्पन्न न । करें; और आगे चल कर २९ वें श्लोकमेंभी यही बात फिरसे कही गई है । परंतु । इसका मतलब यह नहीं है, कि लोगोंको अज्ञानमें बनाये रखे । २५ वें श्लोकमें

कहा है; कि ज्ञानी पुरुषको लोकसंग्रह करना चाहिये । लोकसंग्रहका अर्थही लोगोंको चतुर बनाना है । परंतु इसपर कोई शंका करे, कि जो लोकसंग्रहही करना हो, तो फिर यह आवश्यक नहीं, कि उसके लिये ज्ञानी पुरुष स्वयं कर्म करे; लोगोंको समझा देने – ज्ञानका उपदेश कर देने – सेही काम चल जाता है । इसका भगवान् यह उत्तर देते हैं, कि जिनको सदाचरणका दृढ़ अभ्यास हो नहीं गया है, ( और साधारण लोग ऐसेही होते हैं ) . उनको यदि केवल मुँहसे उपदेश किया जाय – सिर्फ ज्ञान बतला दिया जाय – तो वे अपने अनुचित बर्तावके समर्थनमेंही उस ब्रह्मज्ञानका दुरुपयोग किया करते हैं; और उलटे वे ऐसी व्यर्थ बातें कहते-सुनते सदैव देखे जाते हैं, कि “ अमुक ज्ञानी पुरुष तो ऐसे कहता है । ” इसी प्रकार यदि ज्ञानी पुरुष कर्मोंको सर्वथा छोड़ बैठे, तो अज्ञानी लोगोंको निरुद्योगी बननेके लिये वह एक उदाहरणही बन जाता है । लोगोंका इस प्रकार बातूनी, अथवा निरुद्योगी हो जानाही चालाक बुद्धिभेद है; और लोगोंकी बुद्धिमें इस प्रकारसे भेद-भाव उत्पन्न कर देना ज्ञाता पुरुषको उचित नहीं है । अतएव गीतामें यह सिद्धान्त किया है, कि जो पुरुष ज्ञानी हो जाय, वह लोकसंग्रहके लिये, अर्थात् लोगोंको चतुर और सदाचरणी बनानेके लिये, स्वयं संसारमें रहकर निष्काम कर्म अर्थात् सदाचरणका प्रत्यक्ष आदर्श लोगोंको दिखलावे; और तदनुसार उनमें आचरण करावे – यही जगत्में उसका बड़ा महत्त्वपूर्ण काम है ( गी. र. प्र. १२, पृ. ४०३-४०४ ) । किंतु गीताके इस अभिप्रायको समझे-बूझे बिना कुछ टीकाकार इस श्लोकका यों विपरीत अर्थ किया करते हैं, कि “ ज्ञानी पुरुषको अज्ञानियोंके समानही कर्म करनेका स्वाँग इसलिये करना चाहिये, जिससे कि अज्ञानी लोग नादान बने रह करही अपने कर्म करते रहें !” मानो दंभाचरण सिखलाने अथवा लोगोंको अज्ञानी बने रहने देकर जानवरोंके समान उनमें कर्म करा लेनेके लियेही गीता प्रवृत्त हुई है ! जिनका यह दृढ़ निश्चय है; कि ज्ञानी पुरुष कर्म न करे; संभव है, कि उन्हें लोकसंग्रह एक ढोंग-सा प्रतीत हो; परंतु गीताका वास्तविक अभिप्राय ऐसा नहीं है । भगवान् कहते हैं. कि ज्ञानी पुरुषके कामोंमेंसे लोकसंग्रह एक महत्त्वपूर्ण काम है; और ज्ञानी पुरुषभी अपने उत्तम आदर्शके द्वारा लोगोंको सुधारनेके लिये – नादान बनाये रखनेके लिये नहीं – कर्मही किया करे ( गीतारहस्य प्र. ११, १२ ) । अब यह शंका हो सकती है, कि यदि आत्मज्ञानी पुरुष इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये सांसारिक कर्म करने लगे तो वहभी अज्ञानीही बन जायगा, अतएव स्पष्ट कर बतलाते हैं, कि यद्यपि ज्ञानी और अज्ञानी, दोनोंभी संसारी बन जाय, तथापि उन दोनोंके बर्तावमें भेद क्या है और ज्ञानवानसे अज्ञानीको किस बातकी शिक्षा लेनी चाहिये :- ]

६७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ २७ ॥ तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥ प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ २९ ॥ § § मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३० ॥ ( २७ ) प्रकृतिके ( सत्त्व-रज-तम ) गुणोंसे सब प्रकार कर्म हुआ करते हैं; पर अहंकारसे मोहित ( अज्ञानी पुरुष ) समझता है, कि मैं कर्ता हूँ; ( २८ ) परंतु हे महाबाहु अर्जुन ! “ गुण और कर्म ये दोनोंभी मुझसे भिन्न हैं ” इस तत्त्वको जानने- वाला ( ज्ञानी पुरुष ), यह समझ कर उनमें आसक्त नहीं होता, कि गुणोंका यह आपसमें खेल हो रहा है। ( २९ ) प्रकृतिके गुणोंसे बहके हुए लोग गुण और कर्मोंमेंही आसक्त रहते हैं; इन असर्वज्ञ और मंद जनोंको सर्वज्ञ पुरुष ( अपने कर्मत्यागसे किसी अनुचित मार्गमें लगा कर ) बिचला न दे । । [ यहाँ २६ वें श्लोकके अर्थकाही अनुवाद किया गया है। इस श्लोकमें । जो ये सिद्धान्त हैं, कि प्रकृति भिन्न है और आत्मा भिन्न है; प्रकृति अथवा । मायाही सब कुछ करती है, आत्मा कुछ करता-धरता नहीं है; जो इस तत्त्वको । जान लेता है, वही बुद्ध अथवा ज्ञानी हो जाता है, उसे कर्मका बंधन नहीं होता; । इत्यादि - वे मूलमें कापिल-सांख्यशास्त्रके हैं; और गीतारहस्यके ७ वें प्रकरण । ( पृ. १६५-१६७ ) में उनका पूर्ण विवेचन किया गया है, उसे देखिये । २८ वें । श्लोकका कुछ लोग यों अर्थ करते हैं, कि गुण याने इंद्रियाँ गुणोंमें याने विषयोंमें । बर्तती हैं। यह अर्थ कुछ अशुद्ध नहीं है; क्योंकि सांख्यशास्त्रके अनुसार ग्यारह । इंद्रियाँ और शब्द-स्पर्श आदि पाँच विषय मूल प्रकृतिके २३ गुणोंमेंसेही गुण हैं। । परंतु इसकी अपेक्षा प्रकृतिके समस्त अर्थात् चौबीस गुणोंको लक्ष्य करकेही यह । “ गुणा गुणेषु वर्तन्ते ” सिद्धान्त स्थिर किया गया है ( गीता १३. १९-२२; । १४. २३ )। हमने उसका शब्दशः और व्यापक रीतिसे अनुवाद किया है। । भगवानने यह बतलाया है, कि ज्ञानी और अज्ञानी एकही कर्म करें, तोभी उसमें । बुद्धिकी दृष्टिसे इस प्रकार बहुत बड़ा भेद रहता है ( गीतारहस्य प्र. ११, । पृ. ३१२, ३३० ) अब इस पूरे विवेचनके सार-रूपसे यह उपदेश करते हैं :- ] ( ३० ) ( इसलिये हे अर्जुन ! ) मुझमें अध्यात्म बुद्धिसे सब कर्मोंका संन्यास

तीसरा अध्याय ६७१ § § ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥ § § सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥ अर्थात् अर्पण करके और ( फलकी ) आशा एवं ममता छोड़ कर तू निश्चित हो करके युद्ध कर ! | [ अब यह बतलाते हैं, कि इस उपदेशके अनुसार बर्ताव करनेसे क्या | फल मिलता है और बर्ताव न करनेसे कैसी गति होती है :- ] ( ३१ ) जो श्रद्धावान् ( पुरुष ) दोषोंको न खोजकर मेरे इस मतके अनुसार नित्य बर्ताव करते हैं, वेभी कर्मसे अर्थात् कर्मबंधनसे मुक्त हो जाते हैं। ( ३२ ) परंतु जो दोष-दृष्टिसे शंकाएँ करके मेरे इस मतके अनुसार नहीं बर्तते, उन सर्वज्ञान- विमूढ अर्थात् पक्के मूर्ख अविवेकियोंको नष्ट हुए समझ । | [ निष्काम बुद्धिसे समस्त कर्म करनेके लिये कहनेवाले कर्मयोगकी | श्रेयस्करताके संबंधमें ऊपर अन्वयव्यतिरेकसे जो फलश्रुति बतलाई गई है, उससे | पूर्णतया व्यक्त हो जाता है, कि गीतामें कौनसा विषय प्रतिपाद्य है। इसी कर्म- | योग-निरूपणकी पूर्तिके हेतु भगवान् प्रकृतिकी प्रबलताका और फिर उसे रोकनेके | लिये इंद्रियनिग्रहका वर्णन करते हैं :- ] ( ३३ ) ज्ञानी पुरुषभी अपनी प्रकृतिके अनुसार बर्तता है। सभी प्राणी ( अपनी अपनी ) प्रकृतिके अनुसार रहते हैं, अर्थात् ( वहाँ ) निग्रह जबर्दस्ती क्या करेगी ? ( ३४ ) इंद्रिय और उसके ( शब्द-स्पर्श आदि ) विषयोंमें प्रीति एवं द्वेष ( दोनों ) व्यवस्थित हैं - अर्थात् स्वभावतः निश्चित हैं। इस प्रीति और द्वेषके वशमें न जाना चाहिये; ( क्योंकि ) वे मनुष्यके शत्रु हैं। | [ तैंतीसवें श्लोकके 'निग्रह' शब्दका अर्थ 'निरा संयमन' नहीं है; किंतु | उसका अर्थ 'जबर्दस्ती' अथवा 'हठ' है। इंद्रियोंका योग्य संयमन तो गीताको इष्ट | है; किंतु यहाँपर कहना यह है, कि हठसे या जबर्दस्तीसे इंद्रियोंकी स्वाभाविक | वृत्तियोंकोभी एकदम मार डालना संभव नहीं है। उदाहरण लीजिये; जबतक | देह है, तबतक भूख-प्यास आदि धर्म, प्रकृतिसिद्ध होनेके कारण, छूट नहीं सकते;

६७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ । मनुष्य कितनाही ज्ञानी क्यों न हो; भूख लगतेही भिक्षा माँगनेके लिये तो उसे ! बाहर निकलनाही पड़ता है; इसलिये चतुर पुरुषका यही कर्तव्य है, कि जबर्दस्तीसे । इंद्रियोंको बिलकुलही मार डालनेका वृथा हठ न करें; और योग्य संयमके द्वारा । उन्हें अपने वशमें करके उनकी स्वभावसिद्ध वृत्तियोंका लोकसंग्रहार्थ उपयोग । किया करे - यही इस श्लोकका भावार्थ है । इसी प्रकार ३४ वें श्लोकके 'व्यवस्थित' । पदसे प्रकट होता है, कि सुख और दुःख, ये दोनों विकार स्वतंत्र हैं, एक दूसरेका । अभाव नहीं है ( गीतारहस्य प्र. ४, पृ. १००, ११५ ) । प्रकृति अर्थात् सृष्टिके । अखंडित व्यापारमें कई बार हमें ऐसी बातेंभी करनी पड़ती हैं, कि जो हमें स्वयं । पसंद नही ( गीता १८. ५९ ); और यदि नहीं करते हैं, तो निर्वाह नहीं होता । । ऐसे समय ज्ञानी पुरुष इन कर्मोंको निरिच्छ-बुद्धिसे केवल कर्तव्य समझकर । करता जाता है और उनके पापपुण्यसे अलिप्त रहता है; और अज्ञानी उन्हींमें । आसक्ति रखकर दुःख पाता है; भाम कविके वर्णनानुसार बुद्धिकी दृष्टिसे यही । इन दोनोंमें बड़ा भारी भेद है। परंतु अब एक और शंका होती है, कि यद्यपि यह । सिद्ध हो गया, कि इंद्रियोंको जबर्दस्ती मारकर कर्मत्याग न करे; किंतु निःसंग- । बुद्धिसे सभी काम करता जावे; परंतु यदि ज्ञानी पुरुष युद्धके समान हिंसात्मक । घोर कर्म करनेकी अपेक्षा खेती, व्यापार या भिक्षा माँगना आदि निरुपद्रवी और । सौम्य कर्म करे, तो क्या अधिक प्रशस्त नहीं है ? भगवान् इसका यह उत्तर । देते है :- ] ( ३५ ) पराये धर्मका आचरण सुखसे करते बने, तोभी उसकी अपेक्षा अपना धर्म अर्थात् चातुर्वर्ण्यविहित कर्मही अधिक श्रेयस्कर है; ( फिर चाहे ) वह विगुण अर्थात् सदोष भलेही हो । स्वधर्मके अनुसार ( वर्तनेमें ) मृत्यु हो जावे, तोभी उसमें कल्याण है, (परंतु) परधर्म भयंकर होता है ! । [ स्वधर्मका अर्थ, वह व्यवसाय है, कि जो स्मृतिकारोंकी चातुर्वर्ण्य- । व्यवस्थाके अनुसार प्रत्येक मनुष्यको शास्त्रद्वारा नियत कर दिया गया है; । स्वधर्मका अर्थ मोक्ष-धर्म नहीं है। सब लोगोंके कल्याणके लिये ही गुण-कर्मके । विभागसे चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाको ( गीता १८. ४१ ) शास्त्रकारोंने प्रवृत्त कर दिया । है, अतएव भगवान् कहते हैं कि ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि, ज्ञानी हो जानेपरभी, । अपना अपना व्यवसाय करते रहें, इसीमें उनका और समाजका कल्याण है । और इस व्यवस्थामें बार बार गड़बड़ करना योग्य नही है ( गीतार. प्र. ११, । पृ. ३३६; प्र. १५, पृ. ४९६) । "तेलीका काम तंबोली करे, दैव न मारे आप

तीसरा अध्याय ६७३ अर्जुन उवाच । § § अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ श्रीभगवानुवाच । काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥ । मरे " इस प्रचलित लोकोक्तिका भावार्थभी यही है। जहाँ चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाका । चलन नहीं है, वहाँभी सबको यही श्रेयस्कर जंचेगा, कि जिसने सारी जिंदगी । फौजी महकमेमें बिताई हो, यदि फिर काम पड़े, तो उसको सिपाहीका पेशाही । सुभीतेका होगा; न कि दर्जीका रोजगार; और यही न्याय चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके । लियेभी उपयोगी है। यह प्रश्न भिन्न है, कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था भली है या बुरी; । और वह यहाँ उपस्थितभी नहीं होता। यह बात तो निर्विवाद है, कि । समाजका समुचित धारण-पोषण होनेके लिये खेतीके जैसे निरुपद्रवी और । सौम्य व्यवसायकीही भाँति अन्यान्य कर्मभी आवश्यक हैं। अतएव, जहाँ एक । बार किसीभी उद्योग को अंगीकार किया - फिर चाहे उसे चातुर्वर्ण्य- । व्यवस्थाके कारण स्वीकार करो या अपनी मर्जीसे, - कि वह धर्म हो गया। । फिर किसी विशेष अवसरपर उसमें मीन-मेख निकालकर अपना कर्तव्य-कर्म । छोड़ बैठना अच्छा नहीं है; आवश्यकता होनेपर उस व्यवसायमेंही मर । जाना चाहिये ! बस, यही इस श्लोकका भावार्थ है। कोईभी व्यापार या । रोजगार हो; उसमें कुछ-न-कुछ दोष सहजही निकाला जा सकता है (गीता । १८. ४८)। परंतु इस नुक्ताचीनीके मारे अपना नियत कर्तव्यही छोड़ । देना, कुछ धर्म नहीं है। महाभारतके ब्राह्मण-व्याध-संवादमें और तुलाधार- । जाजलि-संवादमेंभी यही तत्त्व बतलाया गया है, एवं वहाँके ३५ वें श्लोकका । पूर्वार्ध मनुस्मृतिमें (मनु. १०. ९७) और गीतामेंभी (गीता १८. ४७) आया । है। भगवानने ३३ वें श्लोकमें कहा है, कि "इंद्रियोंको मारनेका हठ नहीं । चलता।" इसपर अब अर्जुनने पूछा है, कि इंद्रियोंको मारनेका हठ क्यों नहीं । चलता? और अपनी मर्जी न होने परभी मनुष्य बुरे कामोंकी ओर क्यों । घसीटा जाता है ? ] अर्जुनने कहा :- ( ३६ ) हे वाष्र्णेय ( श्रीकृष्ण ) ! अब ( यह बतलाओ, कि) अपनी इच्छा न रहनेपरभी मनुष्य, जबर्दस्तीसे, किसकी प्रेरणासे पाप करता है। श्रीभगवानने कहा :- ( ३७ ) इस विषयमें यह समझ कि रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाला बड़ा पेटू और बड़ा पापी यह काम एवं यह क्रोधही शत्रु है। गी. र. ८३

६७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ आवृतं ज्ञानमेतेने ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥ इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥ तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥ § § इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥ एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ ( ३८ ) जिस प्रकार धुएँसे अग्नि, धूलिसे दर्पण और जेरसे गर्भ ढँका रहता है, उसी प्रकार उससे यह सब ढँका हुआ है । ( ३९ ) हे कौन्तेय ! कभीभी तृप्त न होनेवाला यह कामरूपी अग्निही ज्ञाताका नित्य वैरी है; उसने ज्ञानको और ढँक रखा है । | [ यह मनुकेही कथनका अनुवाद है, मनुने कहा है, कि “ न जातु कामः | कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥” ( मनु. | २. ९४ ) – कामके उपभोगोंसे काम कभी अघाता नहीं है; बल्कि इंधन डालने- | पर अग्नि जैसे बढ़ जाती है, उसी प्रकार यह कामभी अधिकाधिक बढ़ता जाता | है ( गीतार. प्र. ५, पृ. १०६ ) । ] ( ४० ) इंद्रियोंको, मनको, और बुद्धिको इसका अधिष्ठान अर्थात् घर या गढ़ कहते हैं । इनके आश्रयसे ज्ञानको लपेटकर ( ढँककर ) यह मनुष्यको भुलावेमें डाल देता है । ( ४१ ) अतएव हे भरतश्रेष्ठ ! पहले इंद्रियोंका संयम करके ज्ञान ( अध्यात्म ) और विज्ञानका ( विशेष ज्ञान ) नाश करनेवाले इस पापीको तू मार डाल । ( ४२ ) कहा है, कि ( स्थूल बाह्य पदार्थोंके मानसे उनको जाननेवाली ) इंद्रियाँ पर अर्थात् परे हैं, इंद्रियोंके परे मन है, मनसेभी परे ( व्यवसायात्मिका ) बुद्धि है; और जो बुद्धिमेभी परे है, वह आत्मा है । ( ४३ ) हे महाबाहु अर्जुन !

तीसरा अध्याय ६७५ इस प्रकार (जो) बुद्धिमे परे है, उसको पहचानकर और अपने आपको रोक करके दुरासाध्य कामरूपी शत्रुको तू मार डाल। | [ कामरूपी आसक्तिको छोड़ कर स्वधर्मके अनुसार लोकसंग्रहार्थ समस्त | कर्म करनेके लिये इंद्रियोंपर अपनी सत्ता होनी चाहिये; बस, यहाँ इतनाही | इंद्रियनिग्रह विवक्षित है। यह अर्थ नहीं है, कि इंद्रियोंको जबर्दस्तीसे एकदम | मार करके सारे कर्म छोड़ दे (गीतार. प्र. ५, पृ. ११५)। गीतारहस्यमें | (परि. पृ. ५२८) दिखलाया है, कि “इंद्रियाणि पराण्याहुः०” इत्यादि ४२ वाँ | श्लोक कठोपनिषदका है; और उसी उपनिषदके अन्य चार-पांच श्लोकभी गीतामें | लिये गये हैं। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारका यह तात्पर्य है, कि बाह्य पदार्थोंके सस्कार | ग्रहण करना इंद्रियोंका काम है, मनका काम इनकी व्यवस्था करना है; और | फिर बुद्धि इनको अलग अलग छाँटती है, एवं आत्मा इन सबसे परे है तथा इन | सबसे भिन्न है। इस विषयका विस्तारपूर्वक विचार गीतारहस्यके छठे प्रकरणके | अंतमें (पृ. १३२-१४९) किया गया है। - कर्मविपाकके ऐसे गूढ़ प्रश्नोंका | विचार, गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृ. २८०-२८७) किया गया है, कि | अपनी इच्छा न रहनेपरभी मनुष्य काम-क्रोध आदि प्रवृत्तिधर्मोंके कारण कोई | काम करनेमें क्योंकर प्रवृत्त हो जाता है; और आत्मस्वतंत्रताके कारण इंद्रिय- | निग्रहरूप साधनके द्वारा इससेभी छुटकारा पानेका मार्ग कैसे मिल जाता है; | इसलिये यहाँ उसकी पुनरुक्ति नहीं की जाती है। गीताके छठे अध्यायमे यह | विचार किया गया है, कि इंद्रियनिग्रह कैसे करना चाहिये।] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए-अर्थात् कहे हुए-उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त हुआ।

६७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चतुर्थोऽध्यायः। श्रीभगवानुवाच। इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥ एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥ २ ॥ स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥ चौथा अध्याय [कर्म किसीके छूटते नहीं हैं, इसलिये बुद्धि निष्काम हो जानेपरभी कर्म करनाही चाहिये; कर्मके मानेही यज्ञयाग आदि कर्म हैं; पर मीमांसकोंके ये कर्म स्वर्गप्रद हैं, अतएव एक प्रकारसे बंधक हैं; इस कारण इन्हें आसक्ति छोड़ करके करना चाहिये। ज्ञानसे स्वार्थबुद्धि छूट जावे, तोभी कर्म छूटते नहीं हैं, अतएव ज्ञाताकोभी निष्काम कर्म करनेही चाहिये; लोकसंग्रहके लिये वे आवश्यक हैं; इत्यादि प्रकारसे अब तक कर्मयोगका जो विवेचन किया गया, उसीको इस अध्यायमे दृढ़ किया है। कहीं यह शंका न हो, कि आयुष्य बितानेका यह मार्ग अर्थात् निष्ठा अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये नई बतलाई गई है; एतदर्थ इस मार्गकी प्राचीन गुरुपरंपरा पहले बतलाते हैं:-] श्रीभगवानने कहा :- (१) अव्यय अर्थात् कभीभी क्षीण न होनेवाला अथवा त्रिकालमेंभी अबाधित और नित्य यह (कर्म-) योग (-मार्ग) मैने विवस्वान् अर्थात् सूर्यको बतलाया था; विवस्वानने (अपने पुत्र) मनुको और मनुने (अपने पुत्र) इक्ष्वाकुको बतलाया। (२) ऐसी परंपरासे प्राप्त हुए इसको (योग) राजर्षियोंने जाना। परंतु हे शत्रुतापन (अर्जुन)! दीर्घकालके अनन्तर वही योग इस लोकमें नष्ट हो गया। (३) (सब रहस्योंमेंसे) उत्तम रहस्य समझकर उस पुरातन योगको, (कर्मयोगमार्ग) मैने तुझे आज इसलिये बतला दिया, कि तू मेरा भक्त और सखा है। [गीतारहस्यके तीसरे प्रकरणमे (पृ. ५६-६५) हमने सिद्ध किया है, कि इन तीनों श्लोकोंमें 'योग' शब्दसे, आयु बितानेके उन दोनों मार्गोंमेंसे -

चौथा अध्याय ६७७ | कि जिन्हें सांख्य और योग कहते हैं, - योग अर्थात् कर्मयोग याने साम्य-बुद्धिसे | कर्म करनेका मार्ग अभिप्रेत है। गीताके इस मार्गकी जो परंपरा ऊपरके | श्लोकमें बतलाई गई है, वह यद्यपि इस मार्गकी जड़को समझनेके लिये अत्यंत | महत्त्वकी है, तथापि टीकाकारोंने उसकी विशेष चर्चा नहीं की है - महाभारतके | अंतर्गत नारायणीयोपाख्यानमें भागवत धर्मका जो निरूपण है, उसमें जनमेजयसे | वैशंपायन कहते हैं, कि यह धर्म पहले श्वेतद्वीपमें भगवान्सेही - | नारदेन तु सम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः । | एष धर्मो जगन्नाथात्साक्षान्नारायणान्नृप ॥ | एवमेष महान्धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम । | कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ | “नारदको प्राप्त हुआ, और हे राजा ! वही महान् धर्म तुझे पहले हरिगीता | अर्थात् भगवद्गीतामें समासविधिसहित बतलाया है” (मभा. शां. ३४६. ९, | १०)। और फिर आगे कहा है, कि “युद्धमें विमनस्क हुए अर्जुनको यह धर्म | बतलाया गया है” (मभा. शां. ३४८. ८)। इससे प्रकट होता है, कि गीताका | योग अर्थात् कर्मयोग भागवत धर्मका है (गीतार. प्र. १, पृ. ८-११)। विस्तार | हो जानेके भयसे गीतामे उसकी संप्रदाय-परंपरा सृष्टिके मूल आरंभसे नहीं दी | है; विवस्वान्, मनु और इक्ष्वाकु, इन्हीं तीनोंका उल्लेख कर दिया है। परंतु | इसका सच्चा अर्थ नारायणीय धर्मकी समस्त परंपरा देखनेसे स्पष्ट मालूम हो | जाता है। ब्रह्माके कुल सात जन्म हैं। इनमेंसे पहले छः जन्मोंकी नारायणीय | धर्ममें कथित, परंपराका वर्णन हो चुकनेपर, जब ब्रह्माके सातवें, अर्थात् वर्तमान, | जन्मका कृतयुग समाप्त हुआ, तब - | त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान्मनवे ददौ । | मनुश्च लोकभृत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ ॥ | इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः । | गमिष्यति क्षयान्ते च पुनर्नारायणं नृप ॥ | यतीनां चापि यो धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम । | कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ | “त्रेतायुगके आरंभमें विवस्वानने मनुको (वह धर्म) दिया, मनुने लोक- | धारणार्थ वह अपने पुत्र इक्ष्वाकुको दिया; और आगे इक्ष्वाकुसे सब लोगोंमें फैल | गया। हे राजा ! सृष्टिका क्षय होनेपर (यह धर्म) फिर नारायणके यहाँ चला | जावेगा। यह धर्म और ‘यतीनां चापि’ अर्थात् इसके साथही संन्यास-धर्मभी | पहले तुझमे भगवद्गीतामें कह दिया है’ - ऐसा नारायणीय धर्ममेंही वैशंपायनने | जनमेजयसे फिर कहा है (मभा. शां. ३४८. ५१-५३)। इससे दीख पड़ता है, | कि जिस द्वापरयुगके अंतमें भारतीय युद्ध हुआ था, उससे पहलेके त्रेतायुगभर-

६७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अर्जुन उवाच । § § अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ ४ ॥ । कीही भागवतधर्मकी परंपरा गीतामें वर्णित है, विस्तारभयसे अधिक वर्णन । नहीं किया है। यह भागवत धर्मही योग या कर्मयोग है; और मनुको कर्मयोगके । उपदेश किये जानेकी यह कथा न केवल गीतामेंही है; प्रत्युत भागवत-पुराण- । मेंभी (भाग. ८. २४. ५५) इस कथाका उल्लेख है और मत्स्य-पुराणके ५२ वें । अध्यायमें मनुको उपदिष्ट कर्मयोगका महत्त्वभी बतलाया गया है। परंतु इनमेंसे । कोईभी वर्णन नारायणीयोपाख्यानमें किये गये वर्णनके समान पूर्ण नहीं है। । विवस्वान् - मनु - इक्ष्वाकुकी यह परंपरा सांख्य-मार्गको बिलकुलही उपयुक्त । नहीं होती; और सांख्य एवं योग, इन दोनोंके अतिरिक्त तीसरी निष्ठा गीतामें । वर्णितही नहीं है। इस बातपर ध्यान देनेसे दूसरी रीतिसेभी सिद्ध होता है, कि ! यह परंपरा कर्मयोगकीही है ( गीता २. ३९ ) । परंतु सांख्य और योग, इन । दोनों निष्ठाओंकी परंपरा यद्यपि एक न हो तोभी कर्मयोग अर्थात् भागवत । धर्मके निरूपणमेंही सांख्य या संन्यास-निष्ठाके निरूपणका पर्यायमें समावेश हो । जाता है ( गीतारहस्य प्र. १४, पृ. ४६९ ) । इस कारण वैशंपायनने कहा है, । कि भगवद्गीतामें यति-धर्म अर्थात् संन्यास-धर्मभी वर्णित है। मनुस्मृतिमें चार । आश्रम-धर्मोंका जो वर्णन है, उसके छठे अध्यायमें पहले यति अर्थात् संन्यास । आश्रमका धर्म कह चुकनेपर विकल्पसे 'वेदसंन्यासियोंका कर्मयोग' इस नामसे । गीता या भागवत धर्मके कर्मयोगका वर्णन है; और स्पष्ट कहा है कि । "निःस्पृहतासे अपना कार्य करते रहनेसेही अंतमें परम सिद्धि मिलती है" । (मनु. ६. ९६); इससे स्पष्ट दीख पड़ता है, कि कर्मयोग मनुकोभी ग्राह्य था। । इसी प्रकार अन्य स्मृतिकारोंकोभी यह मान्य था; और इस विषयके अनेक । प्रमाण गीतारहस्यके ११ वें प्रकरणके अंतमें ( पृ. ३६२-३६७ ) दिये गये हैं। । अब अर्जुनको इस परंपरापर यह शंका है, कि -- ] अर्जुनने कहा :- (४) तुम्हारा जन्म तो अभी हुआ है; और विवस्वानका इससे बहुत पहले हो चुका है; ( ऐसी दशामें ) मैं यह कैसे जानूँ, कि तुमने ( यह योग ) पहले बतलाया था ? । [ अर्जुनके इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् अपने अवतारोंके कार्योंका । वर्णनकर आसक्तिविरहित कर्मयोग या भागवत धर्मकाही अब फिर समर्थन ! करते हैं, " कि इस प्रकार मैंभी कर्मोंको करता आ रहा हूँ" :- ]

चौथा अध्याय ६७९ श्रीभगवानुवाच । बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥ ५ ॥ अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ६ ॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ७ ॥ श्रीभगवानने कहा :- ( ५ ) हे अर्जुन ! मेरे और तेरे अनेक जन्म हो चुके हैं । उन सबको मैं जानता हूँ; (और ) हे परंतप ! तू नहीं जानता ( यही भेद है )। ( ६ ) मैं ( सब ) प्राणियोंका स्वामी और जन्मविरहित हूँ और, यद्यपि मेरे आत्मस्वरूपमें कभीभी व्यय अर्थात् विकार नहीं होता, तथापि अपनीही प्रकृतिमें अधिष्ठित होकर मैं अपनी मायासे जन्म लिया करता हूँ। | [इस श्लोकके अध्यात्मज्ञानमें कापिल-सांख्य और वेदान्त, इन दोनों | मतोंकाही मेलकर दिया गया है। सांख्य-मतवालोंका कथन है, कि प्रकृति आप-ही | सृष्टि निर्माण करती है। परंतु वेदांती लोग प्रकृतिको परमेश्वरकाही एक स्वरूप | समझकर यह मानते हैं, कि प्रकृतिमें परमेश्वरके अधिष्ठित होनेपर प्रकृतिसे | व्यक्त-सृष्टि निर्मित होती है। अपने अव्यक्त स्वरूपसे सारे जगतको निर्माण | करनेकी परमेश्वरकी इस अचिंत्य शक्तिकोही गीतामें 'माया' कहा है; और | इसी प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषदमेंभी ऐसा वर्णन है :- “ मायां तु प्रकृतिं विद्या- । न्मायिनं तु महेश्वरम् । " अर्थात् प्रकृतिही माया है; और उस मायाका अधिपति | परमेश्वर है ( श्वे. ४. १० ); और " अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् " - इससे | मायाका अधिपति सृष्टि उत्पन्न करता है ( श्वे. ४.१० ) । प्रकृतिको माया | क्यों कहते हैं, इस मायाका स्वरूप क्या है, और इस कथनका क्या अर्थ है, कि | मायासे सृष्टि उत्पन्न होती है ? - इत्यादि प्रश्नोंका अधिक विवरण गीतारहस्यके | ९ वें प्रकरणमें दिया गया है। यह बतला दिया, कि अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त | कैसे होता है अर्थात् कर्म उपजा हुआ-सा कैसे दीख पड़ता है; अब इस बातका | स्पष्टीकरण करते हैं, कि वह ऐसा कब और किसलिये करता है :- ] ( ७ ) हे भारत ! जब-जब धर्मकी ग्लानि होती है और अधर्मकी प्रबलता फैल जाती है, तब-तब मैं स्वयं ही जन्म ( अवतार ) लिया करता हूँ।

६८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८ ॥ § § जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥ वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ १० ॥ (८) साधुओंकी संरक्षाके निमित्त और दुष्टोंका नाश करनेके लिये, युग-युगमें धर्मसंस्थापनाके अर्थ मैं जन्म लिया करता हूँ । [ इन दोनों श्लोकोंमें 'धर्म' शब्दका अर्थ केवल पारलौकिक वैदिक धर्म नहीं है; किंतु चारों वर्णोंके धर्म, न्याय और नीति प्रभृति बातोंकाभी उसमें मुख्यतासे समावेश होता है । इस श्लोकका तात्पर्य यह है, कि जगत्में जब अन्याय, अनीति, दुष्टता और अंधाधुंधी मचकर साधुओंको कष्ट होने लगता है और जब दुष्टोंका दबदबा बढ़ जाता है, तब अपने निर्माण किये हुए जगत्की सुस्थितिको स्थिर रखकर, उसका कल्याण करनेके लिये तेजस्वी और पराक्रमी पुरुषके रूपसे (गीता १०. ४१) अवतार लेकर भगवान् समाजकी बिगड़ी हुई व्यवस्थाको फिर ठीक कर दिया करते हैं । इस रीतिसे अवतार ले कर भगवान् जो काम करते हैं, उसीको 'लोकसंग्रह' भी कहते हैं; और पिछले अध्यायमें कह दिया गया है, कि यही काम अपनी शक्ति और अधिकारके अनुसार आत्मज्ञानी पुरुषोंकोभी करना चाहिये (गीता ३. २०) । यह बतला दिया गया, कि परमेश्वर कब और किसलिये अवतार लेता है । अब यह बतलाते हैं, कि इस तत्त्वको परख कर जो पुरुष तदनुसार बर्ताव करते हैं, उनको कौनसी गति मिलती है :- ] (९) हे अर्जुन ! इस प्रकारके मेरे दिव्य जन्म और दिव्य कर्मके तत्त्वको जो जानता है, वह देह त्यागनेके पश्चात् फिर जन्म न लेकर मुझमें आ मिलता है । (१०) प्रीति, भय और क्रोधसे छूटे हुए, मत्परायण और मेरे आश्रयमें आये हुए अनेक लोग (इस प्रकार) ज्ञानरूप तपसे शुद्ध होकर मेरे स्वरूपमें आकर मिल गये हैं। [ भगवानके दिव्य जन्मको समझनेके लिये यह जानना पड़ता है, कि अव्यक्त परमेश्वर मायासे सगुण कैसे होता है; और इसके जान लेनेसे अध्यात्मज्ञान हो जाता है; एवं दिव्य कर्मको जान लेनेपर कर्म करकेभी अलिप्त रहनेका, अर्थात् निष्काम कर्मके तत्त्वका, ज्ञान हो जाता है । सारांश, परमेश्वरके दिव्य जन्म और दिव्य कर्मको पूरा पूरा जान लेनेपर, अध्यात्मज्ञान और कर्मयोग

चौथा अध्याय ६८१ § § ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥ काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥ । इन दोनोंकीभी पूरी पहचान हो जाती है; और मोक्षकी प्राप्तिके लिये इसीकी । आवश्यकता होनेके कारण ऐसे मनुष्यको अंतमें भगवत्प्राप्ति हुए बिना नहीं । रहती। अर्थात् भगवान्‌के दिव्य जन्म और दिव्य कर्म जान लेनेमें सब कुछ आ । गया; फिर अध्यात्मज्ञान अथवा निष्काम कर्मयोग, इन दोनोंकाभी अलग अलग । अध्ययन नहीं करना पड़ता। अतएव वक्तव्य यह है, कि भगवानके जन्म और । कृत्यका विचार करो; एवं उसके तत्त्वको परखकर बर्ताव करो; भगवत्प्राप्ति । होनेके लिये दूसरा कोई साधन अपेक्षित नहीं है। भगवान्‌की यही सच्ची । उपासना है। अब इसकी अपेक्षा नीचेके दर्जेकी उपासनाओंके फल और उपयोग । बतलाते हैं :- ] (११) जो मुझे जिस प्रकारसे भजते हैं, उन्हें मैं उसी प्रकारके फल देता हूँ। हे पार्थ! किसीभी ओरसे हो, मनुष्य मेरेही मार्गमें आ मिलते हैं। । [ "मम वर्त्मानुवर्तन्ते " इत्यादि उत्तरार्ध पहले (गी. ३. २३) कुछ । निराले अर्थमें आया है; और इससे ध्यानमें आवेगा, कि गीतामें पूर्वापर संदर्भके । अनुसार अर्थ कैसे बदल जाता है; यद्यपि यह सच है, कि किसीभी मार्गसे जानेपर । मनुष्य परमेश्वरकीही ओर जाता है; तोभी यह जानना चाहिये, कि अनेक । लोग अनेक मार्गोंसे क्यों जाते हैं? अब इसका कारण बतलाते हैं :- ] (१२) (कर्मबंधनके नाशकी नहीं, केवल) कर्मफलकी इच्छा करनेवाले लोग इस लोकमें देवताओंकी पूजा इसलिये किया करते हैं, कि (ये) कर्मफल (इस) मनुष्यलोकमें शीघ्रही मिल जाते हैं। । [यही विचार सातवें अध्याय में (गीता ७. २१, २२) फिर आये हैं, । परमेश्वरकी आराधनाका सच्चा फल है मोक्ष, परंतु वह तभी प्राप्त होता है, । कि जब कालांतरसे एवं दीर्घ और एकान्त उपासनासे कर्मबंधका पूर्ण नाश हो । जाता है; परंतु इतने दूरदर्शी और दीर्घ-उद्योगी पुरुष बहुतही थोड़े होते हैं। । इस श्लोकका भावार्थ यह है कि बहुतेरोंको अपने उद्योग अर्थात् कर्मसे इसी । लोकमें कुछ-न-कुछ प्राप्त करना होता है, और ऐसेही लोग देवताओंकी पूजा । किया करते हैं (गीतार. प्र. १३, पृ. ४०८)। गीताका यहभी कथन है, कि । पर्यायसे यहभी तो परमेश्वरकाही पूजन होता है; और बढ़ते बढ़ते इस योगका । पर्यवसान निष्काम भक्तिमें होकर अंतमें मोक्ष प्राप्त हो जाता है (गीता

६८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥ न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥ | ७.१९)। पहले कह चुके हैं, कि धर्मकी संस्थापना करनेके लिये परमेश्वर | अवतार लेता है, अब संक्षेपमें बतलाते हैं, कि धर्मकी संस्थापना करनेके लिये | क्या करना पड़ता है :- ] (१३) (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इस प्रकार) चारों वर्णोंकी व्यवस्था गुण और कर्मके भेदके अनुसार मैंनेही निर्माण की है। इसे तू ध्यानमें रख, कि मैं उसका कर्ताभी हूँ; और अकर्ता अर्थात् उसे न करनेवाला अव्यय (मेंही) हूँ। | [ अर्थ यह है, कि परमेश्वर कर्ता भलेही हो; पर अगले श्लोकके वर्णना- | नुसार वह सदैव निःसंग है, इस कारण अकर्ता ही है (गीता ५.१४)। | परमेश्वरके स्वरूपके "सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्" ऐसे दूसरेभी | विरोधाभासात्मक वर्णन आगे हैं (गीता १३.१४)। चातुर्वर्ण्यके गुण और | भेदका निरूपण आगे अठारहवें अध्यायमें (गी. १८.४१-४९) किया गया है। | अब भगवानने "करके न करनेवाला" ऐसा जो अपना वर्णन किया है, उसका | मर्म बतलाते हैं :- ] (१४) मुझे कर्मका लेप अर्थात् बाधा नहीं होती; (क्योंकि) कर्मके फलमें मेरी इच्छा नहीं हैं – जो मुझे इस प्रकार जानता है, उसे कर्मकी बाधा नहीं होती। | [ ऊपर नवम श्लोकमें जो दो बातें कही हैं, कि मेरे 'जन्म' और 'कर्म'को | जो जानता है, वह मुक्त हो जाता है, उन्हींमेंसे कर्मके तत्त्वका स्पष्टीकरण | इस श्लोकमें किया है। 'जानता' है शब्दसे यहाँ "जान कर तदनुसार बर्तने | लगता है" इतना अर्थ विवक्षित है। भावार्थ यह है, कि भगवानको उनके | कर्मकी बाधा नहीं होती, इसका यह कारण है, कि वे फलाशा रखकर कामही | नहीं करते; और इसे जान कर तदनुसार जो बर्तता है, उसको कर्मोंका बंधन | नहीं होता। अब इस श्लोकके सिद्धान्तकोही प्रत्यक्ष उदाहरणसे दृढ़ करते हैं :- ] (१५) इसे जान कर प्राचीन समयके मुमुक्षु लोगोंनेभी कर्म किया था; इसलिये पूर्वके लोगोंके किये हुए अति प्राचीन कर्मही तू कर। | [ इस प्रकार मोक्ष और कर्मका विरोध नही है, अतएव अर्जुनको निश्चित

चौथा अध्याय ६८३ § § किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥ कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥ कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥ । उपदेश किया है, कि तू कर्म कर । परंतु इसपर यह शंका होती है, कि संन्यास- । मार्गवालोंका जो यह कथन है, कि "कर्मोंके छोड़नेसे अर्थात् अकर्मसेही मोक्ष । मिलता है।" उस कथनका बीज क्या है ? अतएव अब कर्म और अकर्मके । विवेचनका आरंभ करके आगे तेईसवें श्लोकमें सिद्धान्त करते हैं, कि अकर्म । कुछ कर्मत्याग नहीं है; निष्काम कर्मकोही अकर्म कहना चाहिये ।] (१६) इस विषयमें बड़े बड़े विद्वानोंकोभी भ्रम हो जाता है, कि कौन कर्म है और कौन अकर्म ? (अतएव) वैसा कर्म तुझे बतलाता हूँ, कि जिसे जान लेनेसे तू पापसे मुक्त होगा। । ['अकर्म' नञ् समास है और व्याकरणकी रीतिसे उसके अ = नञ् शब्दके । 'अभाव' अथवा 'अप्राशस्त्य' ये दोनों अर्थ हो सकते हैं; और यह नहीं कह । सकते, कि इस स्थलपर ये दोनोंभी अर्थ विवक्षित न होंगे, परंतु अगले श्लोकमें । 'विकर्म' नामसे कर्मका एक और तीसरा भेद किया है। अतएव इस श्लोकमें । अकर्म शब्दसे विशेषतः वही कर्मत्याग उद्दिष्ट है, जिसे संन्यास-मार्गवाले । लोग "कर्मका स्वरूपतः त्याग" कहते हैं। संन्यास-मार्गवाले कहते हैं, कि । "सब कर्म छोड़ दो"; परंतु १८ वें श्लोककी टिप्पणीसे दीख पड़ेगा, कि इस । बातको दिखलानेके लियेही यह विवेचन किया गया है, कि कर्मको सर्वथा त्याग । देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, संन्यास-मार्गवालोंका कर्मत्याग सच्चा 'अकर्म' । नहीं है, अकर्मका मर्म कुछ औरही है।] (१७) कर्मकी गति गहन है; (अतएव) यह जान लेना चाहिये, कि कर्म क्या है, और यह समझना चाहिये, कि विकर्म (विपरीत कर्म) क्या है; और यहभी ज्ञात कर लेना चाहिये, कि अकर्म (कर्म न करना) क्या है? (१८) कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म जिसे दीख पड़ता है, वह पुरुष सब मनुष्योंमें ज्ञानी है; और वही युक्त अर्थात् योगयुक्त एवं समस्त कर्म करनेवाला है। । [इस श्लोकमें और अगले पाँच श्लोकोंमें अकर्म एवं विकर्मका । स्पष्टीकरण किया गया है, और इसमें जो कुछ कमी रह गई है, उसे आगे

६८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अठारहवें अध्यायमें कर्मत्याग, कर्म और कर्ताके विविध भेद-वर्णनमें पूरा कर दिया है ( गीता १८. ७-९; १८. २३-२५; १८. २६-२८) । यहाँ संक्षेपमें स्पष्टतापूर्वक यह बतला देना आवश्यक है, कि दोनों स्थलोंके कर्म-विवेचनसे कर्म, अकर्म और विकर्मके संबंधमें गीताके सिद्धान्त क्या हैं; क्योंकि, टीकाकारोने इस संबंधमें बड़ी गड़बड़ कर दी है। संन्यास-मार्गवालोंको सब कर्मोंका स्वरूपतः त्याग इष्ट है, इसलिये वे गीताके 'अकर्म' पदका अर्थ खींचातानीसे अपने मार्गकी ओर लाना चाहते हैं; मीमांसकोंको यज्ञयाग आदि काम्य कर्म इष्ट हैं, इसलिये उनके अतिरिक्त और सभी कर्म उन्हें 'विकर्म' जँचते हैं। इसके सिवा मीमांसकोंके नित्यनैमित्तिक आदि कर्मभेदभी उसीमें आ जाते हैं; और फिर धर्मशास्त्री उसीमें अपनी ढाई चावलकी खिचडी पकानेकी इच्छा रखते हैं। सारांश, चारों ओरसे ऐसी खींचातानी होनेके कारण, अंतमें यह जान लेना कठिन हो जाता है, कि गीता 'अकर्म' किसे कहती है और 'विकर्म' किसे ? अतएव पहलेसेही इस बातपर ध्यान दिये रहना चाहिये, कि गीतामें जिस तात्त्विक दृष्टिसे इस प्रश्नका विचार किया गया है, वह दृष्टि निष्काम कर्म करनेवाले कर्मयोगीकी है; काम्य-कर्म करनेवाले मीमांसकोंकी या कर्म छोड़नेवाले संन्यासमार्गियोंकी नहीं है। गीताकी इस दृष्टिको स्वीकार कर लेने पर तो यही कहना पड़ता है, कि 'कर्म-शून्यता' के अर्थमें 'अकर्म' इस जगतमें कहींभी नहीं रह सकता अथवा कोईभी मनुष्य कभी कर्म- शून्य नहीं हो सकता ( गीता ३.५; १८.११); क्योंकि सोना, उठना, बैठना और कम-से-कम जीवित रहना तो किसीकाभी छूट नहीं जाता। और यदि कर्म- शून्य होना संभव नहीं है, तो निश्चय करना पड़ता है, कि अकर्म कहें किसे ? इसके लिये गीताका यह उत्तर है, कि कर्मको निरी क्रिया न समझकर उससे आगे होनेवाले शुभ-अशुभ आदि परिणामोंका विचार करके, कर्मका कर्मत्व या अकर्मत्व निश्चित करो। यदि सृष्टिके मानेही कर्म है, तो मनुष्य जबतक सृष्टिमें है, तब तक उससे कर्म नहीं छूटता। अतः कर्म और अकर्मका जो विचार करना हो, वह इसी दृष्टिसे करना चाहिये, कि मनुष्यको वह कर्म कहाँ तक बद्ध करेगा। करने परभी जो कर्म हमें बद्ध नहीं करता, उसके विषयमें कहना चाहिये, कि उसका कर्मत्व अथवा बंधकत्व नष्ट हो गया; और यदि किसीभी कर्मका बंधकत्व अर्थात् कर्मत्व इस प्रकार नष्ट हो गया हो, तो फिर वह कर्म 'अकर्म' ही हुआ। अकर्मका प्रचलित सांसारिक अर्थ कर्मशून्यता है सही, परंतु शास्त्रीय दृष्टिसे विचार करनेपर उसका यहाँ मेल नहीं मिलता। क्योंकि हम देखते हैं, कि चुपचाप बैठना अर्थात् कर्म न करनाभी कई बार कर्मही हो जाता है। उदाहरणार्थ, अपने माँ-बापको कोई मारता-पीटता हो, तो उसको न रोक- कर चुप्पी साधे बैठे रहना, उस समय यदि व्यावहारिक दृष्टिसे अकर्म अर्थात् कर्म-शून्यता हो तोभी वह कर्मही, - संभवतः विकर्म - है; और कर्मविपाककी

चौथा अध्याय ६८५ दृष्टिसे उसके अशुभ परिणाम हमें भोगने पड़ेंगे। अतएव गीता इस श्लोकमें विरोधाभासकी रीतिसे बड़ी खूबीके साथ कहती है, कि ज्ञानी वही है, जिसने जान लिया, कि अकर्ममेंभी ( कभी कभी तो भयानक ) कर्म हो जाता है, और कर्म करकेभी वह कर्मविपाककी दृष्टिसे मग-सा, अर्थात् अकर्म, होता है; तथा यही अर्थ अगले श्लोकमें भिन्न भिन्न रीतिसे वर्णित है। कर्मके फलका बंधन न लगनेके लिये गीताशास्त्रके अनुसार यही एकमेव सच्चा साधन है. कि निःसंग-बुद्धिसे अर्थात् फलाशा छोड़कर निष्काम बुद्धिसे, वह कर्म किया जावे ( गीतारहस्य प्र. ५, पृ. १११-११५; प्र. १०, पृ. २८६-२८७ ) । अतः इस साधनका उपयोग कर निःसंग-बुद्धिसे जो कर्म किया जाय, वही गीताके अनुसार प्रशस्त अर्थात् सात्त्विक कर्म है ( गीता १८ ९); और गीताके मतमें वही सच्चा 'अकर्म' है। क्योकि उसका कर्मत्व, अर्थात् कर्मविपाककी क्रियाके अनुसार बंधकत्व, निकल जाता है। मनुष्य जो कुछ कर्म करते हैं ( और इस 'करते हैं' पदमें चुपचाप निठल्ले बैठे रहनेकाभी समावेश करना चाहिये ), उनमेंसे उक्त प्रकारके अर्थात् 'सात्त्विक कर्म' अथवा गीताके अनुसार 'अकर्म' घटा देनेसे बाकी जो कर्म रह जाते हैं, उनके दो भाग हो सकते हैं : एक राजस और दूसग तामस। उनमेंसे तामस कर्म मोह और अज्ञानसे हुआ करते हैं, इसलिये उन्हें विकर्म कहते हैं ! फिर यदि कोई कर्म मोहसे छोड़ दिया जाय, तोभी वह विकर्मही है; अकर्म नही ( गीता १८. ७ )। अब रह गये राजस कर्म। ये कर्म पहले दर्जेके अर्थात् सात्त्विक नहीं हैं; अथवा ये वे कर्मभी नहीं हैं, जिन्हें गीता सचमुच 'अकर्म' कहती है। गीता इन्हें 'राजस' कर्म कहती है, परंतु यदि कोई चाहे, तो ऐसे राजस कर्मोंको केवल 'कर्म'भी कह सकता है। तात्पर्य, क्रिया- त्मक स्वरूपसे अथवा कोरे धर्मशास्त्रसेभी कर्म-अकर्मका निश्चय नहीं होता, किंतु कर्मके बंधकत्वसे यह निश्चय किया जाता है, कि कर्म है या अकर्म ? अष्टावक्रगीता संन्यास-मार्गकी है; तथापि उसमेंभी कहा है :- निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते । प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी ॥ अर्थात् मूर्खोंकी निवृत्ति, अथवा हठसे या मोहके द्वारा कर्मसे विमुखताही वास्तवमें प्रवृत्ति अर्थात् कर्म है और पंडित लोगोंकी प्रवृत्ति, अर्थात् निष्काम कर्मसेही निवृत्ति याने कर्मत्यागका फल मिलता है ( अष्टा. १८. ६१ )। गीताके उक्त श्लोकमें यही अर्थ विरोधाभासरूपी अलंकारकी रीतिसे बड़ी सुंदरतासे बतलाया गया है और गीताके अकर्मके इस लक्षणको भलीभाँति समझे बिना गीताके कर्म-अकर्मके विवेचनका मर्म कभीभी समझमें आनेका नहीं। अब इसी अर्थको अगले श्लोकोंमें अधिक व्यक्त करते हैं :-)